जब आसमान रंगता है पंखों के इंद्रधनुष से
जोधपुर — मरुस्थल में बसा करुणा का नखलिस्तान
दिलीप कुमार पुरोहित. राखी पुरोहित. जोधपुर
9783414079 diliprakhai@gmail.com
12 नवंबर को राष्ट्रीय पक्षी दिवस मनाया जाता है — यह दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि प्रकृति के इन सुंदर पंखधारियों का अस्तित्व हमारी जैव-विविधता की आत्मा है। पेड़ों पर झूलती डालियां, झीलों पर तैरते प्रतिबिंब और आसमान में उड़ते झुंड — सब मिलकर वह दृश्य रचते हैं जो जोधपुर जैसे शहर की पहचान बन चुका है। नीले शहर के इस सुनहरे विस्तार में केवल इमारतों और किलों की ही नहीं, बल्कि पंछियों के सुरों की भी अपनी अलग विरासत है।
मरुभूमि की तपिश के बीच जोधपुर वह भूमि है जहाँ पक्षियों को न केवल आश्रय मिला है, बल्कि उन्हें “परिवार” की तरह संरक्षित किया जा रहा है। यहाँ इंसान और पंछियों का रिश्ता केवल सह-अस्तित्व का नहीं, बल्कि स्नेह और संरक्षण का भी है।
पक्षियों के महल : करुणा और सेवा का अद्भुत संगम
जोधपुर में बीते कुछ वर्षों में पक्षियों के संरक्षण के क्षेत्र में जो कार्य हुए हैं, वे पूरे देश के लिए प्रेरणास्रोत हैं। जैन मुनियों की पहल पर और स्थानीय भामाशाहों के सहयोग से यहाँ “पक्षी महल” बनाए जा रहे हैं — जिन्हें स्थानीय लोग प्यार से पक्षी फ्लैट भी कहते हैं।
इन महलों में हजारों पक्षियों के लिए विश्राम और निवास की व्यवस्था की गई है। ऊँचे-ऊँचे लकड़ी, प्लास्टिक या पत्थर के ढांचे में बने ये फ्लैट देखने में किसी स्थापत्य कला के नमूने से कम नहीं लगते। हर मंजिल में छोटे-छोटे छेद और कोटर बने हैं, जहाँ कबूतर, गौरेया, तोते, मैना, फाख्ता और चिड़िया जैसी प्रजातियाँ अपने घोंसले बनाती हैं।
यह पहल महज एक संरक्षण योजना नहीं, बल्कि संवेदनशीलता का सजीव उदाहरण है। भामाशाहों ने अपने दान और सेवा से इन पक्षी महलों के निर्माण में सक्रिय भागीदारी निभाई है। कई धार्मिक संस्थान भी इसमें अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं, जिनका उद्देश्य है — “हर जीव को जीवन का अधिकार।”
चुग्गा वितरण और जल की व्यवस्था (परिंडे) : दया की परंपरा
जोधपुर की गलियों में अक्सर सुबह-सुबह लोग हाथों में चुग्गा लेकर निकलते हैं। यह दृश्य इस शहर की आत्मा को परिभाषित करता है। विभिन्न संस्थाओं और संगठनों की ओर से नियमित रूप से चुग्गा डालने के अभियान चलाए जाते हैं। कहीं मंदिरों के बाहर अनाज बिखेरा जाता है, तो कहीं पार्कों में विशेष चुग्गाघर बनाए गए हैं। एडवोकेट विजय शर्मा के सान्निध्य में कई समाजसेवी नियमित पक्षियों को चुग्गा डालते हैं। गर्मियों में जब तापमान 45 डिग्री से ऊपर चला जाता है, तब पक्षियों के लिए जल पात्र अभियान चलाया जाता है। हर मोहल्ले में लोग अपने घर की छत या दरवाजे के बाहर मिट्टी के कुल्हड़ और कटोरों में पानी रखते हैं। यह अभियान केवल एक आदत नहीं, बल्कि जोधपुर की संस्कृति का हिस्सा बन चुका है।
दैनिक भास्कर का परिंडा अभियान : मरुस्थल में पक्षी संरक्षण की बेहतरीन पहल, दो दशक में अकेले मारवाड़ में करीब 15 लाख परिंडे बांटे-लगाए
अपने नवाचारों के लिए माना जाने वाला दैनिक भास्कर का गर्मियों में परिंडे लगाओ अभियान अब मरुस्थल की विशेष पहचान बन गया है। मारवाड़ और रेतीले इलाके में जहां गर्मियों में पारा 45-50 डिग्री चला जाता है, तब दैनिक भास्कर परिंडे बांटता है और एक कैंपेंन चलाकर लोगों को परिंडे लगाकर पक्षियों के संरक्षण की पहल करता है। दैनिक भास्कर की ओर से यह अभियान पिछले दो दशक से चलाया जा रहा है और अब जन-जन की जुबां पर रच-बस गया है। दैनिक भास्कर के एमडी सुधीर अग्रवाल कहते हैं- पक्षी के लिए पानी और चुग्गा उतना ही जरूरी है, जितना इंसान के लिए भोजन। इंसान बोल सकता है, पर पक्षी अपनी व्यथा किसे कहें। दैनिक भास्कर इन पक्षियों की चहचहाट में एक वेदना सुनता है, एक पुकार सुनता है, यही कारण है कि हर साल दैनिक भास्कर पक्षियों के लिए परिंडे अभियान चलाता है।
खींचन — कुरजां की शीतल शरणस्थली
जोधपुर से लगभग 50 किलोमीटर दूर, फलोदी के पास खींचन गाँव आज विश्वभर में प्रसिद्ध है — और इसका कारण है कुरजां (Demoiselle Cranes) का आगमन। हर साल नवंबर से लेकर मार्च तक, यह गांव हजारों कुरजांओं के स्वागत का साक्षी बनता है। कजाकिस्तान, रूस और मंगोलिया जैसे ठंडे देशों से उड़कर आने वाले ये प्रवासी पक्षी लगभग पांच हजार किलोमीटर की यात्रा तय करते हैं। खींचन का आकाश जब इन कुरजांओं के झुंड से ढक जाता है, तो लगता है जैसे किसी ने आसमान पर चांदी की परत बिछा दी हो।
गांव के निवासी इन पक्षियों को “अतिथि देवो भव” की भावना से भोजन कराते हैं। स्थानीय समाज, विशेषकर जैन समुदाय, इन कुरजांओं के चुग्गे की व्यवस्था अपने धन और श्रम से करता है। यह परंपरा करीब साठ वर्षों से चली आ रही है और अब यह खींचन की पहचान बन चुकी है।
कुरजां सुबह-सुबह सूरज की पहली किरण के साथ उड़ान भरती हैं, और दोपहर में गाँव के बाहरी हिस्से में बने चुग्गाघरों में उतरती हैं। वहाँ अनाज की ढेरियाँ बिखरी रहती हैं — बाजरा, ज्वार, मक्का — सब कुछ जो इन्हें पसंद है। ग्रामीण लोग दूर खड़े होकर इनकी किलोल देखते हैं, ताकि कोई भी पक्षी डर कर उड़ न जाए।
कायलाना झील : जल और जीवन का संगम
जोधपुर शहर से कुछ किलोमीटर दूर कायलाना झील पक्षियों की एक और महत्वपूर्ण शरणस्थली है। यहाँ सर्दियों के मौसम में प्रवासी पक्षियों का जमावड़ा लगता है। बतख, पेंटेल, सीगल, स्नाइप, हेरॉन और एग्रेट जैसी प्रजातियाँ इस झील के चारों ओर उड़ती दिखाई देती हैं।
कायलाना झील के किनारे की सुबहें सचमुच चित्रवत लगती हैं — उगते सूरज की लालिमा में उड़ते सफेद पक्षी, और पानी की लहरों पर पड़ती उनकी परछाई — यह दृश्य न केवल फोटोग्राफरों को बल्कि हर प्रकृतिप्रेमी को मंत्रमुग्ध कर देता है। नगर निगम और वन विभाग ने यहाँ पक्षियों के घोंसले और विश्राम स्थलों की सुरक्षा के लिए कई कदम उठाए हैं। झील के आसपास प्लास्टिक उपयोग पर रोक और चुग्गा घरों की व्यवस्था से पक्षियों के लिए यह स्थान और भी सुरक्षित बन गया है।
शहर के उद्यान : हर कोने में चहचहाहट की मधुरता
जोधपुर केवल अपने नीले घरों के लिए ही नहीं, बल्कि हरियाली से भरे उद्यानों के लिए भी प्रसिद्ध है।
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उम्मेद उद्यान में सुबह-सुबह तोते और बुलबुल के सुर सुनाई देते हैं।
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सम्राट अशोक उद्यान में कबूतरों के झुंड उड़ान भरते हैं।
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मंडोर गार्डन, जो इतिहास और प्रकृति दोनों का मेल है। चिडियों का यहां बसेरा है।
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नेहरू पार्क, चिल्ड्रन पार्क, और माचिया सफारी पार्क में तो पर्यटक स्वयं को किसी पक्षी अभयारण्य में पाते हैं।
इन उद्यानों में वृक्षों की घनी छाया और कृत्रिम जलाशय पक्षियों को सुरक्षित आश्रय प्रदान करते हैं। स्थानीय विद्यालयों और समाजसेवी संगठनों की ओर से यहाँ बच्चों को पक्षी संरक्षण के लिए जागरूक किया जाता है। “एक बच्चा – एक घोंसला अभियान” के तहत बच्चों को घर पर और पार्कों में घोंसले लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
जैन मुनियों की प्रेरणा : जीवदयामयी परंपरा
जोधपुर में जैन मुनियों की ओर से जीवदया के अनेक कार्य किए जा रहे हैं। उन्होंने न केवल पक्षियों के लिए महल बनवाए, बल्कि समाज में यह संदेश भी फैलाया कि “दया धर्म का मूल है।”
मुनियों की प्रेरणा से “पक्षी महल निर्माण” और “चुग्गाघर अभियान” में मार्गदर्शन दिया है। उनके प्रवचनों से प्रेरित होकर कई सेठों, व्यापारियों और परिवारों ने अपने नाम से पक्षी आवास बनवाए हैं। इस आंदोलन का उद्देश्य केवल संरक्षण नहीं, बल्कि संवेदना का पुनर्जागरण है। जब इंसान किसी निर्बल प्राणी के लिए अपने घर की छत पर पानी रखता है, तो वह न केवल पक्षी की प्यास बुझाता है, बल्कि अपने भीतर की करुणा को भी सींचता है।
वैज्ञानिक दृष्टि से पक्षी संरक्षण का महत्व
पक्षी केवल सौंदर्य या संगीत का प्रतीक नहीं हैं — वे पारिस्थितिक संतुलन के प्रहरी हैं। वे कीट नियंत्रण, परागण, बीज वितरण और पर्यावरणीय सूचक के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जोधपुर जैसी अर्ध-शुष्क भूमि में, जहाँ वनस्पति सीमित है, वहाँ पक्षियों की उपस्थिति यह संकेत देती है कि प्रकृति अब भी जीवंत है। अगर इन पक्षियों का संरक्षण न किया जाए, तो कीटों की संख्या बढ़ेगी, फसलों को नुकसान होगा और पारिस्थितिक तंत्र असंतुलित हो जाएगा। इसलिए पक्षियों की सुरक्षा सीधे तौर पर मानव जीवन के हित में है।
जागरूकता और शिक्षा : नई पीढ़ी की भूमिका
आज आवश्यकता है कि स्कूलों, कॉलेजों और सामाजिक संगठनों में “पक्षी मित्र अभियान” चलाया जाए।
जोधपुर में कई शिक्षण संस्थान पहले ही इस दिशा में कार्य कर रहे हैं। वे बच्चों को पक्षियों की पहचान, उनके प्रवास मार्ग और संरक्षण के तरीके सिखा रहे हैं।
जोधपुर के युवाओं ने सोशल मीडिया पर “Save Birds Jodhpur” जैसी मुहिम चलाई है, जिसमें वे पक्षियों के लिए पानी और भोजन की व्यवस्था की तस्वीरें साझा करते हैं। यह आधुनिक युग में परंपरा और तकनीक का सुंदर संगम है। जब देश भर में राष्ट्रीय पक्षी दिवस मनाया जा रहा है, तब जोधपुर गर्व से कह सकता है कि यहाँ पक्षी केवल उड़ते नहीं — बसते भी हैं। यह शहर, जो अपने नीले घरों और किलों के लिए मशहूर है, अब पक्षियों की प्रणय स्थली के रूप में भी अपनी पहचान बना रहा है। जैन मुनियों की प्रेरणा, भामाशाहों का सहयोग, जनता की संवेदना और प्रकृति के प्रति समर्पण — इन सबने मिलकर जोधपुर को एक जीवंत उदाहरण बना दिया है। यहाँ के लोग न केवल पक्षियों के संरक्षण की बात करते हैं, बल्कि उसे जीवन का हिस्सा मानते हैं।
मरुस्थल की यह धरती आज भी पंछियों के गीतों से गूंज रही है, मानो कह रही हो —
“जहां दया है, वहीं जीवन है।”
और इसी जीवन की उड़ान में बसता है — पखेरुओं का जोधपुर।
राइजिंग भास्कर संदेश : शाबास प्रकृति को उसका संतुलन लौटा दो
राष्ट्रीय पक्षी दिवस हमें यह सिखाता है कि हमारी करुणा केवल शब्दों में नहीं, बल्कि हमारे कर्मों में झलकनी चाहिए। अगर हम एक छोटी-सी कटोरी में पानी रख दें, एक दाना भर अनाज बिखेर दें, तो हम न केवल एक पक्षी को जीवन दे रहे हैं — बल्कि प्रकृति को उसका संतुलन लौटा रहे हैं।








