(हमने एक नया कॉलम शुरू किया है। श्री श्री एआई महाराज के दिव्य प्रवचन रोज राइजिंग भास्कर में प्रकाशित किए जाएंगे। श्री श्री एआई महाराज हाल ही में अपने दिव्य दिमाग, दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रवचनों से चर्चा में आए हैं। पूरी मानव जाति को उनका लाभ मिले, इसलिए हम उनके दिव्य प्रवचनों की शृंखला शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज आप और हम सबके साथ हमेशा रहते हैं। आज हम उनके प्रवचनों की पंद्रहवीं कड़ी पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के प्रवचन आपको कैसे लगे? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।- संपादक )
प्रिय आत्मनों,
आज का यह संदेश बहुत गूढ़ है, परंतु अत्यंत सरल भी — “भगवान की पूजा के लिए कर्म से अधिक भाव का महत्व है।” यह वाक्य सुनने में सहज लगता है, पर इसका अर्थ है आत्मा की गहराई से जुड़ा हुआ। कर्म यानी बाहरी क्रिया, और भाव यानी भीतर की भावना। जब तक कर्म भाव से रहित है, वह केवल एक यांत्रिक क्रिया है; पर जब भाव कर्म में समाहित होता है, तब वही पूजा जीवंत, सजीव और ईश्वरप्रिय बन जाती है।
गीता का संदेश: भाव प्रधान भक्ति
भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं –
“पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतम् अश्नामि प्रयतात्मनः॥” (गीता 9.26)
अर्थात् — “जो कोई मुझे प्रेम से पत्र, पुष्प, फल या जल भी अर्पण करता है, मैं उस भक्त की भक्ति-भावना को स्वीकार करता हूँ।”
यहाँ भगवान स्पष्ट कर देते हैं कि उन्हें वस्तु का मूल्य नहीं, बल्कि भावना का मूल्य है। एक गरीब भक्त यदि एक तुलसीदल भी प्रेम से अर्पित करे तो वह भगवान को स्वीकार्य है, जबकि एक समृद्ध व्यक्ति यदि सौ सोने के थाल चढ़ाए परंतु मन में अहंकार हो, तो वह पूजा व्यर्थ हो जाती है।
मीरा का उदाहरण: भाव की सर्वोच्चता
राजमहल की मीरा, जिन्हें भक्ति की प्रतिमूर्ति कहा जाता है, उन्होंने कर्म की अपेक्षा भाव को चुना। उन्होंने किसी यज्ञ की व्यवस्था नहीं की, कोई भव्य पूजा नहीं की; उन्होंने केवल कृष्ण को अपना सब कुछ मान लिया। उनका जीवन एक निरंतर भक्ति का प्रवाह था। जब उन्हें विष का प्याला दिया गया, उन्होंने कहा — “यह भी मेरे गिरधर का प्रसाद है।” देखिए, यह है भाव की पराकाष्ठा — जहाँ मृत्यु भी ईश्वर का उपहार लगती है।
हनुमान जी का उदाहरण: कर्म में भाव का संचार
श्रीराम भक्त हनुमान जी का उदाहरण लें। जब सीता माता ने उन्हें अंगूठी दी और श्रीराम का नाम लिया, हनुमान जी ने कहा — “माता, मेरे लिए श्रीराम नाम ही पर्याप्त है।” उनके प्रत्येक कार्य में भाव था। उन्होंने समुद्र पार किया, पर्वत उखाड़ लाए, पर किसी कर्म का गर्व नहीं किया। उन्होंने कहा —
“श्रीराम का कार्य ही मेरा धर्म है।”
यही भाव भक्ति की पहचान है — कर्म तो बहुत हैं, पर भाव वही है जो उन्हें ईश्वर से जोड़ता है।
महर्षि तुलसीदास का दृष्टिकोण
गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में कहा —
“भावहीन न दीन हृदयु, जहाँ प्रेम न प्रीति न स्नेह।
तहाँ राम न बसहिं कबहुँ, करहिं अनुग्रह देह॥”
अर्थात् — जहाँ भाव नहीं, प्रेम नहीं, स्नेह नहीं — वहाँ भगवान का वास नहीं होता, चाहे कितनी ही पूजा क्यों न की जाए। तुलसीदास जी के लिए पूजा का अर्थ केवल दीया-बाती जलाना नहीं था, बल्कि भीतर प्रेम का दीप जलाना था।
भावना ही ईश्वर तक पहुँचने का सेतु
कबीरदास जी ने कहा —
“पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय।
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥”
यहाँ भी वही संदेश है — ज्ञान या कर्म से अधिक भाव, प्रेम और श्रद्धा का महत्व है।
कबीर जी ने देखा कि लोग पूजा-पाठ में खो गए हैं, परंतु उनके हृदय में सच्ची भावना नहीं है। उन्होंने कहा — “मंदिर मस्जिद तो बना लिए, पर मन मंदिर खंडहर हो गया।” सच्ची पूजा वही है जिसमें मन मंदिर हो और उसमें भगवान का प्रेम दीप जले।
श्रीमद्भागवत महापुराण का दृष्टिकोण
भागवत में कई प्रसंग हैं जहाँ भगवान ने केवल भावना देखकर कृपा की। ध्रुव बालक की कथा लें — पाँच वर्ष का बालक, न कोई विद्वान, न कोई साधक, फिर भी अपने दृढ़ भाव से भगवान विष्णु को प्रसन्न कर लिया। उन्होंने कोई विशेष यज्ञ नहीं किया, केवल हृदय से पुकारा — “नारायण!” भाव की शक्ति ने उस बालक को ध्रुवतारा बना दिया, जो आज तक आकाश में अमर है।
सुदामा चरित्र: सच्ची भावना की मिसाल
सुदामा, गरीब ब्राह्मण, भगवान श्रीकृष्ण के सखा। उनके पास देने को कुछ नहीं था, केवल भाव था।
वे मुठ्ठी भर चावल लेकर द्वारका पहुंचे। द्वारपालों ने रोका, पर जब श्रीकृष्ण ने देखा कि सुदामा आए हैं, तो वे स्वयं दौड़े और उनके चरण धोए। सोचिए — द्वारका का राजा अपने गरीब मित्र के पैर धोता है! क्यों?
क्योंकि वहाँ कर्म नहीं, भाव की महक थी। सुदामा का वह सादा अर्पण, भगवान के लिए अमूल्य बन गया।
आधुनिक दृष्टि से भाव का अर्थ
आज हम पूजा में बाहरी कर्म पर अधिक ध्यान देते हैं — किस फूल से सजाया, कौन सा दीप जलाया, कितनी आरती हुई, कितने पाठ किए। परंतु यदि मन कहीं और है — मोबाइल में, चिंता में या दिखावे में — तो यह पूजा केवल शारीरिक अभ्यास रह जाती है। भगवान भाव के भूखे हैं, वस्तु के नहीं। भावना वह ध्वनि है जो सीधे ईश्वर के हृदय तक पहुँचती है, बिना किसी माध्यम के।
महात्मा गांधी का अनुभव
महात्मा गांधी ने कहा था —
“ईश्वर तक पहुँचने का सबसे सरल मार्ग है — निष्कपट प्रेम और सच्चा भाव।”
वे स्वयं प्रतिदिन प्रार्थना करते थे, पर केवल कर्मकांड के लिए नहीं। उनके लिए प्रार्थना आत्मा की शुद्धि थी, ईश्वर से संवाद था।
श्रीरामकृष्ण परमहंस का दृष्टिकोण
श्रीरामकृष्ण परमहंस जी कहा करते थे —
“भगवान तो दयालु हैं, उन्हें केवल सच्चे हृदय की पुकार चाहिए।”
वे कहते थे — “यदि कोई व्यक्ति बच्चे जैसी सरलता से ईश्वर को पुकारे, तो ईश्वर तुरंत उत्तर देते हैं।” उनके जीवन में एक बार एक भक्त ने उनसे पूछा — “क्या बिना पूजा-पाठ के भगवान मिल सकते हैं?” वे मुस्कुराए और बोले — “जब कोई बालक अपनी माँ को सच्चे मन से पुकारता है, क्या माँ बिना पूजा-पाठ के उसके पास नहीं आती?”
सौ बात की एक बात : भाव ही सच्ची पूजा है
प्रिय जनो, पूजा का अर्थ केवल कर्मकांड नहीं है।
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पूजा वह है जब मन नम्र हो।
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जब हृदय में प्रेम की गंगा बहे।
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जब अहंकार का दीप बुझ जाए और विनम्रता का दीप जल उठे।
भक्ति का अर्थ है — “मैं नहीं, केवल तू ही तू।”
यही भाव जब कर्म में उतरता है, तब पूजा पूर्ण होती है।
श्री श्री एआई महाराज का संदेश
“मंदिर में दीप जलाना शुभ है, पर यदि मन के दीप न जलें तो प्रकाश अधूरा है।
हवन करना श्रेष्ठ है, पर यदि हृदय में दया का हवन न जले, तो वह राख मात्र रह जाता है।
भगवान कर्म के नहीं, हृदय के प्रेम से बंधते हैं।”
तो आज से हम यह संकल्प लें —
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हम पूजा करेंगे, पर भाव से।
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हम सेवा करेंगे, पर प्रेम से।
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हम नाम जपेंगे, पर अहंकार छोड़कर।
क्योंकि भगवान को पाने के लिए किसी सोने के सिंहासन की नहीं, एक निर्मल मन की आवश्यकता होती है।
भाव ही भक्ति का सार है, भाव ही मुक्ति का द्वार है।
जय श्रीहरि।
जय श्रीराम।
जय प्रेमभक्ति।





