1968 में आई फिल्म “दो कलियां” में साहिर लुधियानवी का लिखा और लता मंगेश्कर का गाया गीत “बच्चे मन के सच्चे, सारे जग की आंख के तारे…” 1980 के दशक में जैसलमेर के गांव रामगढ़ में एक सरकारी स्कूल में एक मास्टरजी अक्सर बच्चों को सुनाया करते थे। जब भी कभी बच्चों में झगड़ा होता तो मास्टरजी ये गीत सुनाते और बच्चे भावुक होकर रोने लग जाते।
1980 के दशक में जब गांव में जात-पांत के झगड़े और राजनीति चरम पर पहुंच चुकी थी, तब कैसे इस गीत से प्रेरित होकर मास्टरजी ने गांव में सौहार्द कायम किया। प्रस्तुत है मुक्कमल रिपोर्ट एक कहानी के माध्यम से।
स्थान जैसलमेर का रामगढ़ गांव। 1980 का दशक। मास्टर अशोक (बदला हुआ नाम) गाना गा रहे हैं और बच्चे पीछे-पीछे गुनगुना रहे हैं-
बच्चे मन के सच्चे, सारे जग की आंख के तारे
ये वो नन्हे फूल हैं जो भगवान को लगते प्यारे
खुद रूठें, खुद मन जाएं, फिर हमजोली बन जाएं
झगड़ा जिसके साथ करें, अगले ही पल फिर बात करें
इनको किसी से बैर नहीं, इनके लिए कोई ग़ैर नहीं
इनका भोलापन मिलता है सबको बांह पसारे
इन्सां जब तक बच्चा है, तब तक समझो सच्चा है
ज्यों ज्यों उसकी उमर बढ़े, मन पर झूठ का मैल चढ़े
क्रोध बढ़े, नफ़रत घेरे, लालच की आदत घेरे
बचपन इन पापों से हटकर अपनी उमर गुज़ारे
तन कोमल मन सुन्दर है, बच्चे बड़ों से बेहतर हैं
इनमें छूत और छात नहीं, झूठी जात और पात नहीं
भाषा की तक़रार नहीं, मज़हब की दीवार नहीं
इनकी नज़रों में एक हैं मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारे
सूरज की रोशनी अभी-अभी खेतों के ऊपर फैली ही थी कि रामगढ़ का पुराना प्राथमिक स्कूल जाग उठा। दीवारों पर बने टेढ़े-मेढ़े चित्र, टूटी खिड़कियों से आती हवा, और मिट्टी से भरी कक्षाओं में बच्चों की आवाजें गूँजने लगीं।
इस स्कूल का सबसे बड़ा सहारा था—
मास्टर अशोक जिसे पूरा गांव “अशोक मास्टरजी” के नाम से जानता था। उनके बालों में सफेदी झलक रही थी, पर आंखों में बच्चों के लिए अब भी उतना ही प्रेम था जितना उनकी नौकरी के पहले दिन था। अशोक मास्टर का मानना था—
“जब तक मन बच्चा है, तब तक आदमी सच्चा है।” वे अक्सर बच्चों को गीत की दो पंक्तियाँ सुनाया करते—
“बच्चे मन के सच्चे,
सारे जग की आँख के तारे…”
कक्षा की छोटी-छोटी आंखें चमक उठतीं। उन बच्चों में दो खास चेहरे थे—
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रोशनी —(बदला हुआ नाम) एक छोटी, मासूम बच्ची जिसका पिता जैसलमेर में मजदूरी करते थे।
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अर्जुन — (बदला हुआ नाम) गांव के मौजिज ओर दबंग व्यक्ति का बेटा, चंचल और जिद्दी, पर दिल का साफ।
दोनों अलग दुनिया से थे, पर दोस्त एक-दूसरे के। एक दिन गांव में चुनाव आने वाले थे, और राजनीति का खेल शुरू हो चुका था।
मोहल्लों में फुसफुसाहटें बढ़ी थीं। मौजिज और दबंग रामलाल (बदला हुआ नाम) के समर्थक कहते—
“हमारे बच्चे हमारे साथ पढ़ें। गरीबों के बच्चों के साथ क्या ही मेल?”
दूसरी ओर कुछ लोग कहते—“स्कूल सबका है। दीवारें क्यों खड़ी की जाएँ?”
इन चर्चाओं की आहट बच्चों तक पहुंचने लगी। अर्जुन ने भी एक दिन रोशनी से दूरी बनानी शुरू कर दी। वह वही दोहराने लगा जो बड़ों से सुनता था—“तुम लोग अलग हो, हम अलग।” रोशनी समझ नहीं पाई—कल तक जो मेरा हाथ पकड़कर झूला झूलता था, वह आज आंखें क्यों चुरा रहा है? अशोक मास्टर को यह परिवर्तन चुभ रहा था। वे जानते थे— बच्चों के दिल में दीवारें बड़ो की वजह से खड़ी होती हैं। उसी शाम उन्होंने अपने पुराने रेडियो पर एक गीत बजाया—
“बच्चे मन के सच्चे…” गीत जैसे कमरे में हवा की तरह बहता हुआ दिलों को छू गया। मास्टरजी की आँखें भर आईं। उन्होंने सोचा— “अगर इन बच्चों का मन भी दूषित होने लगा, तो समाज का भविष्य कौन सँभालेगा?” यही सोचकर उन्होंने एक अनोखा प्रयोग करने का निर्णय लिया।
बच्चों काे अनोखे प्रोजेक्ट के बहाने बदलने की सोच :
अगले दिन मास्टरजी ने स्कूल में घोषणा की—“कल से हम ‘इंसानियत की कक्षा’ शुरू कर रहे हैं। हर बच्चा इसमें भाग लेगा।
पहला कार्य है—दो-दो बच्चों की जोड़ियाँ बनेंगी, और हर जोड़ी एक-दूसरे का पसंदीदा खेल, पसंदीदा खाना और दुख-सुख जानेगी।”रोशनी का नाम पढ़कर मास्टरजी ने कहा—“रोशनी… तुम्हारी जोड़ी अर्जुन के साथ।” अर्जुन चौंका, पर मास्टरजी की आँखों में एक सख्त पर प्रेम भरी चमक थी। वह इंकार न कर सका।
पहले दिन अर्जुन और रोशनी दोनों चुप बैठे रहे। न ही अर्जुन कुछ पूछता, न रोशनी कहती। एक मौन दीवार खड़ी थी।
दूसरे दिन मास्टरजी ने कहा—“आज हर जोड़ी अपना पसंदीदा खेल खेलकर दिखाएगी।” रोशनी ने दबे स्वर में कहा— “मुझे… पकड़म-पकड़ाई पसंद है।”
अर्जुन ने सिर झुकाकर कहा—
“मुझे भी…”
और खेल शुरू हुआ। रोशनी हँसे जा रही थी, अर्जुन भी हंस पड़ा। दोनों भूल गए किसका परिवार कौन-सा है। उनके पैरों में वही पुरानी दोस्ती लौट आई थी। इधर राजनीतिक वातावरण के कारण स्कूल में तनाव था। अर्जुन ने रोशनी से पूछा—
“तुम हर रोज अकेले क्यों आती हो?”
रोशनी बोली—
“पापा शहर में काम करते हैं।
मम्मी बीमार रहती हैं।
मैं खुद ही आती हूँ।” अर्जुन का चेहरा बदल गया। उसे अपनी गलती समझ आने लगी। अशोक मास्टर उनकी प्रगति देख रहे थे।
उन्होंने तीसरे दिन गीत सुनाया—
“झगड़ा जिसके साथ करें,
अगले ही पल फिर बात करें…”
और कहा—
“बच्चे इसलिए महान हैं क्योंकि वे मौके पर गुस्सा करते हैं,
पर दिल में नफरत नहीं रखते।”
अर्जुन के भीतर कुछ पिघलता जा रहा था।
एक घटना जिसने सब बदल दिया
एक शाम भारी बारिश आई। गाँव की नदी उफन गई और झोपड़ी वाला इलाका पानी में डूबने लगा। रोशनी की मां की तबीयत और बिगड़ गई। सारा गांव अफरा-तफरी में था। अर्जुन घर की खिड़की से बाहर देख रहा था। उसने रोशनी को अपनी मां को संभालते देखा—कीचड़ में, पानी में डूबते रास्तों पर। अंदर से कुछ टूट गया—“मैं इतना गलत कैसे हो सकता हूंं?” वह तुरंत छाता लेकर दौड़ा और रोशनी के पास पहुंचा—“चलो, मैं मदद करता हूं!” रोशनी चौंक गई, पर अगले ही पल उसकी आंखों में उम्मीद झलक उठी। इधर जब अर्जुन के पिता को पता चला तो वह भी अर्जुन को ढूंढते रोशनी की झोपड़ी पर पहुंच गए। अर्जुन की आंखों में मासूमियत देख और सेवा का जज्बा देख वे भी पिघल गए और सबकुछ भूलकर मदद करने लगे। अर्जुन और उसके पिता दोनों मिलकर रोशनी की मां को अस्पताल ले गए। मौजिज व्यक्ति रामलाल को अपनी गलती का अहसास हुआ।
अगले दिन पंचायत में भारी भीड़ थी। वाद-विवाद, जाति-धर्म की खींचतान…सभी बड़ों के विचार टकरा रहे थे। तभी अर्जुन ने आगे बढ़कर कहा—
“मैंने रोशनी की मदद इसलिए नहीं की कि वह किसी जाति की है। मैंने इसलिए की क्योंकि वह मेरी दोस्त है। और हम बच्चे,
जाति नहीं देखते, चेहरा नहीं देखते, दिल देखते हैं।” सभा में सन्नाटा छा गया। फिर रोशनी बोली—“हम बच्चों को मत सिखाइए कि कौन बड़ा है, कौन छोटा। हमें सिखाइए कि इंसान सिर्फ इंसान होता है।” मास्टरजी की आंखें भर आईं। तभी सभा में मास्टरजी ने भाषण दिया और उन्होंने गीत की पंक्तियां पढ़ीं—
“इनमें छूत और छात नहीं,
झूठी जात और पात नहीं…”
और कहा—
“जब बच्चा पैदा होता है,
वह मंदिर-मस्जिद नहीं जानता,
जाति नहीं जानता,
नफरत नहीं जानता।
वह तो बस खिलखिलाना जानता है।
अगर हम उसके मन में दीवारें भर दें,
तो दोष बच्चा नहीं—
हमारा है।”
सभा तालियों से गूंज उठी। तभी रामलाल ने कहा कि भाइयों हम गलत थे। बच्चे ईश्वर की देन है। बच्चों को बच्चे ही रहने दें। इनके भीतर जाति और धर्म का जहर भरना उचित नहीं। और स्कूल का माहौल बदल गया। फिर से स्कूल में गाया जाने लगा-
“बच्चे मन के सच्चे”
छोटे-छोटे बच्चों की मासूम हंसी हवा में घुल गई। अर्जुन और रोशनी फिर सबसे अच्छे दोस्त बन गए। बाकी बच्चे भी उनसे प्रेरित हुए।अर्जुन के पिता अक्सर रोशनी के घर आते, दवाइयों की मदद करते। गांव में ऊंच-नीच की दीवारें गिरने लगीं। लोगों में एक नई हवा चलने लगी—
“बच्चों जैसे बनो,
दिल में कोई भेद मत रखो।” इस कहानी को 45 साल बीत गए। वही पुराना स्कूल अब एक बड़ा मॉडल स्कूल बन चुका है।
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रोशनी खुद टीचर बनकर शहर में सेवाएं दे रही हैं।
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अर्जुन ने पिता की जगह गांव में राजनीति को कॅरिअर बना लिया है और खेती करता है।
मास्टर अशोक अब इस दुनिया में नहीं हैं पर स्कूल में अब किसी बच्चे से उसकी जाति या धर्म नहीं पूछा जाता।





