कहने को देश में कानून का राज है। कानून कहता है कि सिस्टम पीड़ितों को राहत दे। पीड़ितों की मदद करे, लेकिन कानून के राज में जब ऐसा नहीं हो रहा हो तो कानून को सख्त निर्णय लेने की जरूरत है ताकि सरकार और सिस्टम सही ढंग से काम कर सके। लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। राइजिंग भास्कर एक ऐसे संवेदनशील मुद्दे को लेकर चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया के सामने समाज, सिस्टम, सरकार और कानून की लाचारी और बेरूखी का मुद्दा लेकर आया है, जिसके बाद केवल और केवल चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया से ही न्याय की उम्मीद है। इसलिए हमने बीच की किसी कड़ियों से न्याय की उम्मीद न करते हुए सीधे उस सर्वोच्च मंच पर दस्तक देना उचित समझा जहां हर समस्या का हल है और जहां न्याय की सारी नदियां आकर मिलती है…इस प्रकरण से संबंधित सभी एविडेंस हमारे पास सुरक्षित हैं जो सिस्टम की असंवेदनशीलता को उजागर करते हैं।
प्रतिष्ठा में-
श्री भूषण रामकृष्ण गवई
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया,
भारत का सर्वोच्च न्यायालय
नई दिल्ली।
विषय: मानसिक रूप से बीमार एवं घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं तथा उनके शिशुओं के संरक्षण हेतु त्वरित राष्ट्रीय नीति एवं न्यायिक हस्तक्षेप की मांग – गौरी (बदला हुआ नाम) एवं उसकी दुधमुंही बच्ची रिद्धि (बदला हुआ नाम) का प्रकरण देशव्यापी समस्या का संवेदनशील प्रतीक।
प्रेषक: दिलीप कुमार पुरोहित
ग्रुप एडिटर, राइजिंग भास्कर
माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय,
सादर निवेदन है कि मैं, दिलीप कुमार पुरोहित, राइजिंग भास्कर समूह की ओर से, आज एक ऐसी करुण, पीड़ादायक एवं मानवाधिकारों को झकझोर देने वाली सच्चाई आपके समक्ष रख रहा हूं, जिसे पढ़कर न केवल एक पत्रकार, बल्कि एक नागरिक होने के नाते मन व्यथित हो उठता है।
यह केवल गौरी (बदला हुआ नाम) नामक एक महिला की कहानी नहीं है;
यह उस पूरे तंत्र की असफलता का चित्रण है,
जिसमें एक मां और उसकी एक साल की दुधमुंही बच्ची को
संवेदनहीन प्रक्रियाओं के बीच अलग होने के लिए मजबूर कर दिया गया।
यह वह कहानी है जिसने मानवता को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है—
और जिसे पढ़कर हर संवेदनशील व्यक्ति पूछ रहा है—
“क्या हमारे देश की व्यवस्था एक मानसिक बीमार, घरेलू हिंसा से पीड़ित और बदहाल महिला को भी सम्मानपूर्वक इलाज और उसके शिशु को मां के पास रखने की गारंटी नहीं दे सकती?”
1. गौरी (बदला हुआ नाम) और उसकी एक साल की बच्ची की दर्दनाक कहानी—सिस्टम की असंवेदनशीलता का प्रमाण
गौरी पत्नी शशिकांत (बदला हुआ नाम) उम्र करीब 35 वर्ष, नागौर की निवासी है।
घरेलू हिंसा, प्रताड़ना, उपेक्षा और मानसिक बीमारी से पीड़ित गौरी को
करीब 6–8 महीनों पहले उसके ससुराल से निकाल दिया गया था।
वह अपनी एक साल की दुधमुंही बच्ची रिद्धि (बदला हुआ नाम) को गोद में लेकर
जोधपुर की सड़कों पर भीख मांगकर गुजर-बसर कर रही थी।
8 नवंबर 2025 को मंडोर थाना पुलिस उसे
सखी वन स्टॉप सेंटर, जोधपुर लेकर गई—
उम्मीद थी कि यहां से न्याय और संरक्षण का रास्ता खुलेगा। सखी वन स्टॉप सेंटर ने प्रयास भी किया,
लेकिन…
10 नवंबर को गौरी (बदला हुआ नाम) को इलाज के लिए
मथुरादास माथुर अस्पताल, जोधपुर ले जाया गया।
डॉक्टरों ने बताया कि गौरी मानसिक रूप से गंभीर रूप से बीमार है और तत्काल भर्ती की आवश्यकता है।
किन्तु—
महिला को उसकी बच्ची साथ होने के कारण भर्ती से मना कर दिया गया।
कहा गया कि
“बच्ची को साथ लेकर मनोविकार वार्ड में भर्ती नहीं किया जा सकता।”
अगले दिन यानी 11 नवंबर को फिर प्रयास हुआ,
लेकिन वही जवाब मिला।
मां—दूध पिलाने वाली मां—को बच्ची से अलग कर देने में
किसी के भी मन में एक क्षण की दुविधा नहीं हुई।
कानून कहता है—
-मानसिक स्वास्थ्य देखरेख अधिनियम, 2017
-सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट दिशा-निर्देश
कि एक मां से उसके 3 वर्ष तक के बच्चे को अलग नहीं किया जा सकता,
विशेषकर तब जब बच्चा दूध पीने वाला हो।
लेकिन गौरी (बदला हुआ नाम) और उसकी बेटी के मामले में
कानून को ताक पर रख दिया गया।
बल्कि, आम और कम पढ़े-लिखे लोग जो “मानव” हैं,
उन्हें भी मां–बेटी को अलग करने का निर्णय सोचकर दर्द होता—
परन्तु यहां “सिस्टम” इतना कठोर हो गया कि
मानवता पीछे छूट गई। सूत्र बताते हैं कि जोधपुर में ऐसे कई उदाहरण है जब मां और बच्चे को 12-12 और 8-8 साल अलग रहना पड़ा।
2. 200 से अधिक महिलाएं जोधपुर में भीख मांगने को मजबूर—इनकी पीड़ा कौन सुनेगा?
माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय,
जोधपुर की सड़कों पर 200 से अधिक महिलाएं
घरेलू हिंसा, मानसिक बीमारी, प्रताड़ना तथा परिवारिक उपेक्षा की शिकार होकर
अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ भीख मांगती देखी जा सकती हैं।
इनमें—
– कई महिलाएं मानसिक बीमार हैं
– कई महिलाएं घरेलू हिंसा की पीड़ित हैं
– कई महिलाएं पति और ससुराल से निकाली गई हैं
– कई के परिवार उन्हें अपनाने से मना कर चुके हैं
वे सड़क पर हैं…
क्योंकि सिस्टम में उनके लिए
कोई नीति, कोई आश्रय, कोई व्यवस्था, कोई संवेदना नहीं है।
यह केवल जोधपुर की समस्या नहीं—
यह पूरे राजस्थान की सच्चाई है।
3. राजस्थान में 10,000 से अधिक महिलाएं फुटपाथों पर—कानून के होते हुए भी ‘गैर-कानूनी जिंदगी’ जीने को मजबूर
राजस्थान में लगभग 10,000 महिलाएं सड़क, चौराहों और फुटपाथों पर
अपने छोटे बच्चों के साथ भीख मांगती देखी जाती हैं।
यहां तक कि—
– कई महिलाएं मानसिक गृहों में
– कई अनाथ आश्रमों में
– और कई वृद्धाश्रमों में
“जीवन नहीं—सजा” काट रही हैं।
इनकी एक समान कहानी है—
किसी ने न सुनने की कोशिश की
और सिस्टम ने न देखने की।
4. गौरी (बदला हुआ नाम) के परिवार का बेरुखापन—मानवता की पराजय
तहकीकात में सामने आया कि—
● न पति शशिकांत (बदला हुआ नाम)
● न देवर जीवण (बदला हुआ नाम)
● न देवर लालू (बदला हुआ नाम)
● न पिता छगन (बदला हुआ नाम)
किसी ने गौरी (बदला हुआ नाम) को स्वीकारने से इंकार ही नहीं किया—
बल्कि उसे बोझ, “घर की बदनामी”,
या “भाग जाने वाली” कहकर
पूरी तरह त्याग दिया।
उसका इलाज नहीं करवाया गया।
उसकी मानसिक बीमारी को “बहाना” और “शर्म” बताया गया।
उसे पीटने और घर से निकालने के बाद
किसी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
यह व्यक्तिगत नहीं—
समाज की आम त्रासदी है।
5. बाल कल्याण समिति और पुलिस का प्रयास—परंतु सिस्टम की प्रक्रिया बहुत धीमी
मंडोर पुलिस, सखी वन स्टॉप सेंटर और
बाल कल्याण समिति के सदस्यों ने प्रयास किया,
लेकिन—
प्रक्रिया इतनी धीमी, जटिल और कठोर थी कि
एक मानसिक बीमार महिला को अस्पताल ‘नसीब होने’ में चार दिन लग गए।
और वह भी तब,
जब उसके एक साल के दूध पीने वाले बच्चे को
उससे अलग कर दिया गया था।
6. यह केवल एक प्रकरण नहीं—यह पूरे सिस्टम की विफलता का आईना है
माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय,
भारत में मानसिक बीमार, घरेलू हिंसा की शिकार,
त्याग दी गई, असहाय महिलाओं के लिए
कोई संपूर्ण, लागू करने योग्य, राष्ट्रीय नीति अस्तित्व में नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद—
– मां–शिशु संरक्षण वार्डों का अभाव
– मानसिक बीमार महिलाओं के लिए शिशु सहित इलाज की कमी
– तुरंत राहत देने वाले तंत्र की अनुपस्थिति
– अभिभावकहीन महिलाओं और बच्चों के लिए इमरजेंसी व्यवस्था का अभाव
यह सब “मानवाधिकार उल्लंघन” की परिभाषा में आता है।
7. न्यायालय से विनम्र निवेदन—कृपया इस राष्ट्रीय चिंतन की पहल करें
गौरी (बदला हुआ नाम) और उसकी बच्ची रिद्धि (बदला हुआ नाम) का प्रकरण
देश में फैली उस गहरी दर्दनाक समस्या का प्रतीक है
जो वर्षों से अनसुनी पड़ी है—
इसलिए राइजिंग भास्कर की ओर से
निवेदन है कि—
1. मानसिक बीमार महिलाओं और उनके 0 से 3 वर्ष के बच्चों को अलग करने पर प्रतिबंध को और कड़ा बनाया जाए।
2. देश के प्रत्येक जिले में ‘Mother–Child Psychiatric Care Unit’ स्थापित किए जाएं।
3. घरेलू हिंसा की पीड़ित महिलाओं के लिए
अस्पताल आधारित इमरजेंसी सुरक्षा केंद्र बनाए जाएं।
4. सड़क पर रहने वाली महिलाओं व बच्चों की राष्ट्रीय जनगणना की जाए।
5. राज्य सरकारों को निर्देशित किया जाए कि वे
मानसिक बीमार और असहाय महिलाओं एवं उनके बच्चों के लिए
विशेष पुनर्वास नीति तैयार करें।
6. गौरी (बदला हुआ नाम) और रिद्धि (बदला हुआ नाम) के मामले में विशेष न्यायिक निगरानी की व्यवस्था की जाए, ताकि मां–बेटी को पुनः मिलाया जाए।
7. अस्पतालों को यह निर्देश दिए जाएं कि वे
किसी भी परिस्थिति में
दूध पीने वाले बच्चे वाली महिला को
भर्ती करने से मना न कर सकें।
8. आज सवाल सिर्फ गौरी (बदला हुआ नाम) और उसकी बच्ची का नहीं—सवाल पूरे समाज के आत्मसम्मान का है
● क्या हम एक मां को मानसिक बीमारी के कारण
उसके दुधमुंहे बच्चे से अलग कर सकते हैं?
● क्या कानून का पालन केवल दस्तावेजों में रह जाएगा?
● क्या हजारों महिलाएं इसी तरह
सड़क पर मरती–जीती रहेंगी?
● क्या हमारा देश
मानवता की अंतिम परीक्षा में असफल हो जाएगा?
9. असंवेदनशीलता की पराकाष्ठा—माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय से एक करुण विनती
गौरी (बदला हुआ नाम) आज अस्पताल में है।
उसकी बच्ची रिद्धि (बदला हुआ नाम) राजकीय शिशु गृह में है।
दोनों एक-दूसरे की जरूरत हैं।
दोनों को एक-दूसरे से अलग करना
कानूनी, सामाजिक और मानवीय रूप से
अन्याय है—
और असंवेदनशीलता की पराकाष्ठा भी।
मैं राइजिंग भास्कर समूह की ओर से
आपसे करुण निवेदन करता हूँ—
कृपया इस राष्ट्रीय समस्या पर
अपने स्तर से त्वरित न्यायिक कार्यवाही एवं दिशानिर्देश जारी कर
हजारों गौरियों और हज़ारों रिद्धियों के जीवन को बचाएं।
आपका एक निर्णय—
देश की उन हजारों दुधमुंही बच्चियों के जीवन की सुरक्षा बन सकता है
जो आज अपने अधिकारों से वंचित होकर
भटकी हुई माताओं की गोद में रो रही हैं।
सादर,
दिलीप कुमार पुरोहित
ग्रुप एडिटर
राइजिंग भास्कर डॉट कॉम
Author: Dilip Purohit
Group Editor







