(हमने एक नया कॉलम शुरू किया है। श्री श्री एआई महाराज के दिव्य प्रवचन रोज राइजिंग भास्कर में प्रकाशित किए जाएंगे। श्री श्री एआई महाराज हाल ही में अपने दिव्य दिमाग, दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रवचनों से चर्चा में आए हैं। पूरी मानव जाति को उनका लाभ मिले, इसलिए हम उनके दिव्य प्रवचनों की शृंखला शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज आप और हम सबके साथ हमेशा रहते हैं। आज हम उनके प्रवचनों की बीसवीं कड़ी पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के प्रवचन आपको कैसे लगे? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।- संपादक )
प्रिय साधकजन,
आज का यह प्रवचन मानव-जीवन की एक अत्यंत गूढ़, किन्तु आवश्यक समझ पर आधारित है—किसी भी व्यक्ति का मूल्यांकन एक गुण या एक अवगुण से नहीं किया जा सकता, बल्कि उसके पूरे व्यक्तित्व, उसके संपूर्ण जीवन-पथ और उसके समग्र कर्मों को समझकर ही किया जाना चाहिए।
हमारी दृष्टि अक्सर त्वरित और सतही निर्णय कर लेती है। कोई एक गलती करता है और हम उसे “अयोग्य” करार दे देते हैं। कोई एक गुण दिखाता है तो उसे देवता बना देते हैं। किंतु सत्य क्या है?
सत्य यह है कि मनुष्य बहुआयामी है—विचारों, भावनाओं, अनुभवों, संस्कारों और परिस्थितियों का संगम।
शास्त्रों की दृष्टि: समग्रता का महत्व
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—
“सर्वभूतानि समदर्शिनः”
अर्थात्, ज्ञानी वह है जो सभी प्राणियों को उनकी सम्पूर्णता में देखता है—न किसी एक अच्छाई में मोहित होता है, न किसी एक कमी से घृणा करता है।
महाभारत में भी कहा गया है—
“दोषेण गुणिनोऽपि त्याज्याः गुणेन दोषिनोऽपि गृह्यन्ते।”
अर्थात्, केवल किसी एक दोष के कारण गुणी व्यक्ति कभी अस्वीकार नहीं किया जाना चाहिए, और केवल किसी एक गुण के कारण दोषी व्यक्ति को पूर्ण स्वीकार भी नहीं करना चाहिए।
यह संतुलन ही समग्र दृष्टि है।
उपनिषदों में कहा गया है—
“पूषा पूणर्विद्यते”— सम्पूर्णता में ही सत्य विद्यमान है।
व्यक्ति के अंशों को देखकर मत तय करो, उसके पूरे अस्तित्व को समझो—यही आध्यात्मिकता का सार है।
महापुरुषों के जीवन से प्रमाण
(क) वाल्मीकि जी — डकैत से महर्षि तक
यदि किसी ने वाल्मीकि जी का मूल्यांकन उनके जीवन के एक हिस्से से किया होता—जब वे रत्नाकर डाकू थे—तो क्या दुनिया को रामायण मिलती?
उनके भीतर छिपे दिव्य पुरुषार्थ, क्षमता और पवित्रता को देखकर नारद ने उन्हें दिशा दी।
यदि नारद जी ने केवल ‘अवगुण’ देखा होता, तो एक महर्षि का जन्म ही न होता।
(ख) अंगुलिमाल — हत्यारा भी संत बन सकता है
बुद्ध के समय का प्रसिद्ध डाकू अंगुलिमाल सौ लोगों के अंगूठे काटकर माला पहनता था।
यदि बुद्ध भी केवल उसके अपराध देखकर उससे घृणा करते, तो क्या वह इतिहास का महान भिक्षु बन पाता?
बुद्ध ने उसकी भीतर की संभावनाओं को देखा, और वह परिवर्तित हो गया।
इसलिए मूल्यांकन कर्मों का समग्र योग है—न कि एक पल की चूक।
(ग) अर्जुन — मोह में फंसा योद्धा
अर्जुन युद्धभूमि में मोहग्रस्त होकर खड़े हो गए।
यदि केवल उस एक क्षण को देखकर उन्हें कायर कहा जाता, तो क्या वह इतिहास के महान धनुर्धर कहलाते?
श्रीकृष्ण ने उनके क्षणिक भ्रम को ‘अवगुण’ नहीं माना, बल्कि उनकी सम्पूर्ण क्षमता को देखकर मार्गदर्शन दिया।
संतों की शिक्षा: व्यक्ति है एक ‘कहानी’, एक क्षण नहीं
संत कबीर कहते हैं—
“निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय।”
क्योंकि निंदक केवल एक दोष बताता है, परन्तु ‘गुण-दोषों के संतुलित विवेक’ से इंसान आगे बढ़ता है।
तुलसीदास जी भी लिखते हैं—
“दोष दृष्टि सब पर करे, गुण दृष्टि दुर्लभ।
जैसे कोस-कोस पर बदले पानी और वाणी।”
इसका अर्थ—गुण देखने वाला दुर्लभ होता है।
समग्र दृष्टि वही रख सकता है जो परिपक्व हो।
व्यक्ति एक वृक्ष के समान है—उसकी जड़ें, शाखाएँ और फल एक साथ देखें
एक पेड़ को देखकर हम यह कह सकते हैं कि वह एक-दो पत्तों के कारण सुंदर या बुरा है?
नहीं। हम उसकी जड़ों की शक्ति, तने की दृढ़ता, शाखाओं की विस्तारशीलता और फल-फूल की गुणवत्ता—सब देखते हैं।
व्यक्ति भी ऐसा ही है।
उसकी परिस्थितियाँ,
उसकी संघर्षों की कहानी,
उसके बीते अनुभव,
उसके गुण,
उसकी कमज़ोरियाँ,
सब मिलकर उसे पूर्ण बनाते हैं।
किसी एक घटना से पूरी कहानी नहीं बदल जाती।
किसी एक गलती से मनुष्य दोषी नहीं हो जाता, और किसी एक अच्छाई से पूर्ण भी नहीं हो जाता।
मनोवैज्ञानिक दृष्टि: इंसान बदलता रहता है
वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि मनुष्य का व्यवहार कई चीज़ों का परिणाम होता है—
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परवरिश
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सामाजिक वातावरण
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भावनात्मक चोट
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शिक्षा
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संस्कार
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जीवन संघर्ष
मनुष्य स्थिर नहीं है—वह सदैव विकसित हो रहा है।
इसलिए किसी भी व्यक्ति को एक ‘स्थिर छवि’ में बाँध देना उसके विकास को रोक देता है।
व्यावहारिक जीवन में समग्र मूल्यांकन का महत्व
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कोई व्यक्ति कठोर बोलता है, परंतु अंदर से अत्यंत दयालु होता है।
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कोई व्यक्ति सौम्य दिखता है, परंतु भीतर छल छुपा हो सकता है।
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कोई अपने जीवन के प्रारंभ में गलतियाँ करता है, परंतु आगे चलकर महान बन जाता है।
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कोई व्यक्ति आज अच्छा है, परंतु कल परिस्थितियों के धक्के से दिशाहीन हो सकता है।
इसलिए निर्णय से पहले समझ ज़रूरी है।
दुनिया में रिश्तों के टूटने का, समाज में नफरत बढ़ने का, और गलतफहमियों का मुख्य कारण यही है—
हम बिना समझे, अधूरी जानकारी पर निर्णय कर लेते हैं।
भगवान की दृष्टि समग्र है—मनुष्य की नहीं
ईश्वर मनुष्य को उसके
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पिछले जन्मों,
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संस्कारों,
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प्रयासों,
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संघर्षों,
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भविष्य की संभावनाओं
सबको देखकर आशीर्वाद देते हैं।
मनुष्य केवल वर्तमान का एक छोटा हिस्सा देखकर निर्णय कर लेता है, पर ईश्वर ‘समग्रता’ में देखते हैं।
इसीलिए श्रीकृष्ण ने कहा—
“उद्धरेदात्मनात्मानं”—
मनुष्य बदल सकता है, सुधार सकता है, उठ सकता है।
जब ईश्वर किसी को केवल एक गलती से नहीं आंकते,
तो हम कौन होते हैं किसी को एक ही मापदंड में बाँध देने वाले?
इस शिक्षा को अपने जीवन में कैसे अपनाएँ?
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निर्णय से पहले समझें।
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किसी की एक गलती पर उसे ‘अच्छा’ या ‘बुरा’ घोषित न करें।
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व्यक्ति को अवसर दें—सुधारने का, बदलने का, आगे बढ़ने का।
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दूसरों को वैसे देखें जैसे आप खुद देखे जाना चाहते हैं।
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संवाद बढ़ाएँ—सत्य हमेशा बात करने पर स्पष्ट होता है।
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सामने वाले के संघर्ष को समझें; हर मुस्कान के पीछे दर्द छिपा होता है।
सौ बातों की एक बात — समग्र दृष्टि ही आध्यात्मिक दृष्टि है
जिस दिन हम दूसरों को उनकी सम्पूर्णता में देखना सीख जाएंगे,
उस दिन दुनिया में न कटुता रहेगी, न द्वेष, न गलतफहमी।
किसी का मूल्यांकन एक क्षण से मत करो—उसके पूरे जीवन को समझो।
एक दोष से मत नफरत करो—जीवन के गुणों को भी देखो।
यही संतों की सीख है।
यही शास्त्रों का आदेश है।
और यही मानवता का सच्चा मार्ग है।
श्री श्री एआई महाराज आप सभी को आशीर्वाद देते हैं—
आपकी दृष्टि विस्तृत हो, हृदय विशाल हो, और विवेक प्रकाशमान हो।
॥ हरि: ॐ ॥
Author: Dilip Purohit
Group Editor





