मोहन जी के बहाने गांव-अपनों के बारे में चिंतन…
-हरसहाय हर्ष मीणा, जोधपुर-
मैं सुबह टहल रहा था, तो सामने मोटरसाइकिल पर मोहन जी आते दिखाई दिए। जैसे ही पास आए तो मैंने हाथ उठाकर, “मोहन जी.. मोहन जी…” मैंने आवाज लगाई। मोहन जी का ध्यान सामने सड़क पर था, मेरी आवाज सुनकर रुके। “और मोहन जी कैसे हो, क्या हाल हैं” मैने उनकी तरफ बढते हुए बोला।
“अरे साहबड़ा.. साहबड़ा कांई हाल पूछो हो और मैं कांई हाल बताऊं। अब क्यां का हाल?, कैसा हाल? अब केय है?” मोहन जी जो हमारे विभागीय ड्राइवर हैं कुछ साल पहले मैरे साथ कुछ दिन ड्यूटी रही थी उनकी, अच्छे इंसान हैं और मेरी तरह थोड़े भावुक भी। मैने कहा “अरे मोहन जी इतने दुखी-दुखी से क्यों बोल रहे हो?” “साहबड़ा थे हाल पूछो हो, अब केड़ा हाल, सब मतलबी रिश्ते हैं, सब एक दूसरे को तोड़ने और काटने में लगे हैं गांव जांवें तो काका बडा (चाचा ताऊ) मुहं से नहीं बोलते हैं, भाई से भाई नहीं बोलता, और गांव तो अब खाली नाम के गांव रह गए हैं कोई किसी को देखकर खुश नहीं होता।
गांव तो अब जाने का मन ही नहीं करता, लोग खुश होने की बजाय दुखी होते हैं एक दूसरों की मदद की बजाय लोग गिराने में लगे हैं। अब किस्सा गांव साहबड़ा, यह कोई जीवन है, यह कोई जीने में जीना है” मोहन जी दुखी और आक्रोशित से मन से मारवाड़ी और हिंदी मिली-जुली सी भाषा में एक ही साथ में मन की पीड़ा को कहते चले गए। मैं एक बार तो सोच में पड़ गया कि मोहन जी इतने दुखी कैसे हैं आज? और दुखी से मन से सोहन जी ने गाड़ी आगे बढ़ा दी। मैं भी हल्के-हल्के कदमों से आगे बढ़ने लगा लेकिन मोहन जी की बात मेरे मन मस्तिष्क को झकझोर गई। फिर मैं भी थोड़ी देर के लिए मेरे अंर्तमन के साथ अपने गांव में पहुंच गया और मनन किया कि मोहन जी बात तो सच ही कह रहे हैं। आज हाल तो यही है गाँवों का। परिवार का, पडोसियों का अब वह प्यार प्रेम कहां है जो 10-20 साल पहले हुआ करता था। पहले जब कोई नौकरी करने वाला या बाहर रहने वाला गांव जाता था तो चाचा ताऊ, बाबा दादा,यार दोस्त, पड़ोसी खुश होकर बात करते थे। हाल-चाल पूछते थे। चाय-नाश्ता, खाना पीना सब पूछते थे, पास बैठाते थे, हंसी ठिठोली होती थी और आज कोई किसी से बात नहीं करता, कोई किसी से ऐंठ रखता है, तो कोई किसी से द्वेष भाव रखता है। सब खुद तक व खुद के परिवार तक सीमित हो गए हैं, अगर कोई बाहर किसी से जुड़ा हुआ भी है तो कोई खास मकसद से या मतलब से जुड़ा हुआ है। मैंने मनन किया कि मोहन जी सच कह रहें हैं। मैंने मन ही मन खुद से कहा कि “बात सच्ची है पर अच्छी नहीं।”









