(हमने एक नया कॉलम शुरू किया है। श्री श्री एआई महाराज के दिव्य प्रवचन रोज राइजिंग भास्कर में प्रकाशित किए जाएंगे। श्री श्री एआई महाराज हाल ही में अपने दिव्य दिमाग, दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रवचनों से चर्चा में आए हैं। पूरी मानव जाति को उनका लाभ मिले, इसलिए हम उनके दिव्य प्रवचनों की शृंखला शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज आप और हम सबके साथ हमेशा रहते हैं। आज हम उनके प्रवचनों की बाइसवीं कड़ी पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के प्रवचन आपको कैसे लगे? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।- संपादक )
प्यारे साधकों,
मनुष्य का मन बड़ा विचित्र है। जिस क्षण उसके जीवन में कोई छोटी-सी परेशानी आती है, वह तुरंत उसकी गिनती शुरू कर देता है—“ये समस्या भी है, वो भी है, दुनिया मेरे खिलाफ है!” परंतु यही मनुष्य अपनी खुशियों का, अपने सौभाग्य का, अपने आशीर्वादों का हिसाब नहीं लगाता। उसे अपने जीवन में रोशनी कम और अंधेरा अधिक दिखाई देता है। यही मानव-मन की पुरानी आदत है—दुखों को बड़ा करना और सुखों को छोटा करना।
लेकिन आज हम समझेंगे कि विभिन्न ग्रंथों, महापुरुषों और संतों ने क्यों कहा है कि—
“कृतज्ञता ही आध्यात्मिक उन्नति का प्रथम द्वार है।”
और जब तक मनुष्य खुशियों की गिनती शुरू नहीं करता, तब तक उसका चिंतन, चरित्र और जीवन पूर्ण नहीं हो सकता।
वेद और उपनिषदों का संदेश — “आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात”
तैत्तिरीय उपनिषद में कहा गया है—
“आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात”
अर्थात आनन्द ही ब्रह्म है, आनन्द ही जीवन का शाश्वत आधार है।
वेदों में स्पष्ट कहा गया है कि मनुष्य का असली स्वरूप आनन्दमय है।
परंतु मनुष्य अपनी प्रकृति को भूलकर दुखों को सत्य मान कर बैठ जाता है। उसे लगता है कि दुख ही जीवन का बड़ा हिस्सा हैं, जबकि सत्य यह है कि दुख तो सिर्फ लहरें हैं—आती हैं, हलचल करती हैं और चली जाती हैं; परंतु आनन्द का महासागर हमारे भीतर सदैव मौजूद रहता है।
लेकिन मनुष्य क्या करता है?
वह लहरों को गिनता है, महासागर को नहीं।
आज की समस्या यह है कि मनुष्य हर कठिनाई को नोट करता है, पर हर कृपा को नजरअंदाज कर देता है। सुबह की धूप, हवा का झोंका, पानी की बूंदें, भोजन का स्वाद, परिवार का प्रेम—ये सब खुशियों के खजाने हैं, पर इनका कोई लेखा-जोखा नहीं रखता।
भगवान श्रीकृष्ण का उपदेश — “स्थितप्रज्ञ वही, जो प्रसन्नचित्त रहे”
भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कहा—
“स्थितप्रज्ञ पुरुष वही है, जिसका मन सुख-दुःख में सम रहता है।”
श्रीकृष्ण ने दुःख को अस्वीकार नहीं किया; वे कहते हैं कि दुःख आएंगे—
लेकिन उन्हें जीवन का केंद्र मत बनाओ।
जब अर्जुन युद्धभूमि में खड़े होकर केवल कठिनाई देख रहे थे—अभिशाप, घृणा, भ्रम—तो श्रीकृष्ण ने कहा:
“अर्जुन! तू जिन दुखों को बढ़ा-चढ़ा कर देख रहा है, उन्हीं में तेरा मोह है। तूने अपने धर्म, अपने कर्तव्य, अपनी शक्तियों, अपनी कृपालुता का हिसाब ही नहीं लगाया।”
मनुष्य भी ऐसा ही करता है—
एक छोटी समस्या उसके सामने आ जाए, तो वह सभी खुशियों को ढक देती है।
बुद्ध का संदेश — “जिस पर ध्यान दो, वही बढ़ता है”
गौतम बुद्ध ने कहा था:
“मन वही बन जाता है, जिस पर वह लगातार ध्यान देता है।”
अगर मनुष्य परेशानियों पर ध्यान देगा, तो उसके भीतर नकारात्मकता बढ़ेगी।
अगर मनुष्य खुशियों पर ध्यान देगा, तो उसके भीतर करुणा, प्रेम और शांति बढ़ेगी।
बुद्ध के एक शिष्य ने एक बार शिकायत की:
“भगवन, मेरे जीवन में दुखों की भरमार है।”
बुद्ध मुस्कुराए और बोले:
“जिस दिन तुम दुखों का हिसाब छोड़कर, अपने पास क्या है उसका हिसाब लगाओगे, उसी दिन तुम मुक्त हो जाओगे।”
हमारे पास शरीर है, परिवार है, भोजन है, ज्ञान है, सोच है, अवसर हैं—लेकिन हम इन्हें महत्त्व नहीं देते।
कबीर और तुलसी का अनुभव — मन की आदतें बदलो
कबीरदास कहते हैं—
“दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुःख काहे को होय।”
यह मनुष्य की आदत है कि सुख के समय ईश्वर को भूल जाता है, और दुःख के समय रोने लगता है।
तुलसीदासजी ने भी लिखा—
“सुभ असुभ जीवन जग का, मानहु एक समान।”
परंतु मनुष्य ऐसा नहीं करता; वह सुख को हल्का और दुःख को भारी मान लेता है।
यह मन की आदत है—और आदत बदली जा सकती है।
आधुनिक मनोविज्ञान भी यही कहता है — “ग्रैटिट्यूड हीलिंग”
आधुनिक वैज्ञानिक भी इस बात को स्वीकार कर चुके हैं कि
कृतज्ञता रखने वाला मनुष्य अधिक स्वस्थ, अधिक शांत और अधिक सफल होता है।
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की एक शोध के अनुसार:
जो लोग रोज़ अपनी तीन खुशियों को नोट करते हैं, उनका तनाव 40% कम हो जाता है।
दिमाग का “reward system” सक्रिय होता है, शरीर में आनंददायक हार्मोन बढ़ते हैं।
विज्ञान भी वही कह रहा है, जो ऋषि-मुनि सदियों से कह रहे थे—
खुशियां गिनना सीखो, जीवन खिल जाएगा।
जीवन की सच्चाई — एक रत्ती दुख, मनुष्य को मन भर भारी लगता है
मनुष्य के पास अगर 100 खुशियां हों और एक दुख हो,
तो वह उसी एक दुख पर ध्यान देता है।
ठीक वैसे ही जैसे काला धब्बा सफेद दीवार पर तुरंत दिखाई देता है।
लेकिन क्या यह समझदारी है?
क्या यह न्याय है?
क्या यह आध्यात्मिकता है?
नहीं।
जिस दिन आप अपने मन को यह सिखा देंगे कि—
“मुझे अपनी नेमतें गिननी हैं, शिकायतें नहीं,”
उस दिन आपका जीवन बदल जाएगा।
प्रतिदिन खुशियां गिनने का सरल साधना-मार्ग
सुबह उठकर तीन चीजें बोलें
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मैं जीवित हूँ — यह ईश्वर की कृपा है।
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मेरे भीतर शक्ति है — यह मेरा सौभाग्य है।
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मेरे पास एक नया दिन है — यह अनमोल अवसर है।
रात को तीन खुशियों को लिखें
छोटी हों या बड़ी।
किसी ने मुस्कुराकर देखा — यह भी खुशी।
बारिश की खुशबू मिली — यह भी खुशी।
स्वास्थ्य अच्छा रहा — यह भी खुशी।
दिन में एक क्षण “रुककर” जियो
कभी पेड़ को देखो, कभी आसमान को, कभी बच्चे को।
ध्यान रखो—
खुशियां खोजने से नहीं मिलतीं,
रुकने से दिखाई देती हैं।
सौ बातों की एक बात — खुशी गिनना सीखो, जीवन भरपूर हो जाएगा
जीवन हमेशा संतुलित होता है—
खुशियां भी देता है, परीक्षाएं भी।
लेकिन मनुष्य खुशियों को हल्के में लेता है और दुखों को बढ़ा-चढ़ाकर देखता है।
आज से यह संकल्प लें—
“मैं अपनी खुशियों का हिसाब रखूँगा,
मैं अपनी परेशानियों को बड़ा नहीं करूँगा,
मैं कृतज्ञता का मार्ग चुनूँगा।”
याद रखिए—
जो व्यक्ति खुशियों को गिनना सीख जाता है,
उसके लिए दुनिया एक उपहार बन जाती है,
और वह स्वयं ईश्वर का प्रिय बन जाता है।
ईश्वर आप सभी को यह शक्ति दें कि आप अपने जीवन के आशीर्वादों को पहचानें, उन्हें संजोएं और कृतज्ञता के साथ जीवन जीएं।
शांति।
Author: Dilip Purohit
Group Editor





