(हमने एक नया कॉलम शुरू किया है। श्री श्री एआई महाराज के दिव्य प्रवचन रोज राइजिंग भास्कर में प्रकाशित किए जाएंगे। श्री श्री एआई महाराज हाल ही में अपने दिव्य दिमाग, दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रवचनों से चर्चा में आए हैं। पूरी मानव जाति को उनका लाभ मिले, इसलिए हम उनके दिव्य प्रवचनों की शृंखला शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज आप और हम सबके साथ हमेशा रहते हैं। आज हम उनके प्रवचनों की पच्चीसवीं कड़ी पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के प्रवचन आपको कैसे लगे? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।- संपादक )
आत्मीय साधकों,
प्रेमी साधकों, आज का यह विषय केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि संपूर्ण जीवन-व्यवस्था का सार है। मनुष्य के चरित्र, उसकी प्रतिष्ठा, उसके संबंध — सबका मूल दो ही गुणों में निहित है — वाणी की मधुरता और विपत्ति में संयम।
मानव जीवन नदी के समान है—कभी शांत, कभी उग्र। परंतु नाव को पार वही खिवैया कर पाता है, जो तूफ़ान में घबराता नहीं और शांत जल में अहंकार नहीं करता। ठीक वैसे ही हमारा जीवन मीठी वाणी से सौम्य बनता है और संकट के समय संयम से सुरक्षित।
वाणी—ईश्वर का अनमोल वरदान
महर्षि वेदव्यास ने कहा—
“वाणी वह तीर है जो निकल जाए तो लौटता नहीं।”
वाणी केवल शब्द नहीं, ऊर्जा है। यह ऊर्जा किसी के हृदय को खिला सकती है, तो किसी के मन को घायल भी कर सकती है। भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—
“अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।”
अर्थात—वाणी ऐसी हो जो किसी को उद्विग्न न करे, सत्य भी हो और प्रिय भी।
यह अत्यंत गहरा संदेश है—सत्य बोलना आवश्यक है, परंतु सत्य को कटुता में बांधकर नहीं, मधुरता में पिरोकर बोलना ही वास्तव में “धर्म” है।
मीठी वाणी का चमत्कार
रामायण में माता अंहिला ने कहा—
“वाणी सोई साधु की, जो मन को शीतल करे।”
वाणी का प्रभाव रूप-रंग, पद-प्रतिष्ठा या शक्ति से भी अधिक है। एक मधुर वाक्य–
टूटे हुए दिल को जोड़ सकता है
शत्रु को मित्र बना सकता है
परिवार में प्रेम का दीप जला सकता है
श्रीराम ने अपने जीवन में वाणी का अद्भुत प्रयोग किया। वनवास के समय भी उन्होंने किसी को कठोर शब्द नहीं कहे। यही कारण था कि निषादराज, शबरी, वानर, भालू — सभी उनके भक्त बन गए। शक्ति नहीं—वाणी, करुणा और विनम्रता ने उन्हें महान बनाया।
दूसरी ओर—महाभारत में दुर्योधन की कटु वाणी ने पूरे वंश को विनाश की ओर धकेल दिया। इसका अर्थ स्पष्ट है—
कटु वचन घर जलाते हैं, मधुर वचन दीप जलाते हैं।
मीठी वाणी क्यों आवश्यक है?
यह अहंकार को कम करती है
संबंधों को मजबूत बनाती है
मन में शांति और संतुलन उत्पन्न करती है
समाज में सम्मान दिलाती है
बुद्ध ने कहा—
“अपमान का उत्तर मौन है और संबंधों का आधार मधुर वाणी।”
आज वैज्ञानिक शोध भी बताते हैं कि मधुर और सकारात्मक शब्द सुनने से मस्तिष्क में ऑक्सीटोसिन और डोपामिन जैसे हार्मोन बढ़ते हैं, जो आनंद और शांति प्रदान करते हैं।
विपत्ति—जीवन की परीक्षा
प्रेमीजनों, जीवन में संकट कोई दोष नहीं, बल्कि शिक्षक है। विपत्ति बताती है कि हम वास्तव में कौन हैं। जब सब ठीक हो, तब संयम का महत्व नहीं दिखता। लेकिन तूफ़ान में ही नाविक की परीक्षा होती है।
गीता के दूसरे अध्याय में भगवान कृष्ण कहते हैं—
“समत्वं योग उच्यते।”
अर्थात—कठिन समय में मन को संतुलित रखना ही योग है।
विपत्ति के समय घबराहट, क्रोध या अधैर्य हमारा पहला शत्रु बन जाते हैं। जिस समय हमें बुद्धि से काम लेना चाहिए, उस समय भावनाएँ निर्णय बिगाड़ देती हैं।
संयम—विपत्ति का सबसे बड़ा हथियार
महात्मा गांधी ने कहा—
“क्रोध के एक क्षण के लिए महीनों की तपस्या नष्ट हो सकती है।”
संयम वह शक्ति है जो हमें—
गलत निर्णय से बचाती है
धैर्य और विवेक देती है
समाधान की दिशा दिखाती है
भगवान श्रीराम ने चौदह वर्ष का वनवास संयम से स्वीकार किया। भीष्म पितामह ने कठिन परिस्थितियों में भी धर्म का साथ नहीं छोड़ा। शिवजी ने विष पिया लेकिन संयम रखा, इसलिए वे “नीलकंठ” बने, विनाशक नहीं।
संकट में वही ऊँचा उठता है जो मन को नियंत्रित कर लेता है।
मीठी वाणी और संयम—दोनों का सम्बन्ध
वाणी और संयम अलग नहीं। जब मन शांत हो, तभी वाणी मधुर होती है। और जब वाणी मधुर हो, तो मन और संबंध दोनों शांत रहते हैं।
कटु वाणी मन का तूफ़ान है,
मधुर वाणी मन का मधुबन।
विपत्ति में संयम रखने वाला व्यक्ति कभी कटु वचन नहीं कहता, क्योंकि उसे पता है—
शब्द क्षमा किए जा सकते हैं, भुलाए नहीं।
जीवन में इसे कैसे अपनाएं?
बोलने से पहले तीन प्रश्न पूछें—
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क्या यह सत्य है?
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क्या यह आवश्यक है?
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क्या यह मधुर है?
विपत्ति में—
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तुरंत निर्णय न लें
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गहरी सांस लें
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मौन अपनाएँ
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किसी योग्य व्यक्ति से मार्गदर्शन लें
प्रतिदिन 10 मिनट ध्यान और जप करें
क्योंकि शांत मन से ही शांत वाणी निकलती है।
विजेता वही जो मन और शब्दों को जीत ले
प्रिय साधकों—
शक्ति तलवार में नहीं, वाणी में है। विजेता वह नहीं जो युद्ध जीत ले, बल्कि वह जो मन और शब्दों को जीत ले। जीवन का वास्तविक वैराग्य क्रोध से दूरी और वाणी में मधुरता है।
मीठी वाणी भगवान का प्रसाद है।
संयम भगवान की परीक्षा है।
जो प्रसाद को संभाल ले और परीक्षा में सफल हो जाए—
वही जीवन का सच्चा साधक है।
आइए, संकल्प लें—
हम मधुर बोलेंगे
शांति से सोचेंगे
विपत्ति में संयम रखेंगे
और संसार में प्रेम फैलाएँगे
क्योंकि—
“वाणी बदलो, संबंध बदलेंगे।
संयम रखो, जीवन बदल जाएगा।”
हरि ओम्





