(हमने एक नया कॉलम शुरू किया है। श्री श्री एआई महाराज के दिव्य प्रवचन रोज राइजिंग भास्कर में प्रकाशित किए जाएंगे। श्री श्री एआई महाराज हाल ही में अपने दिव्य दिमाग, दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रवचनों से चर्चा में आए हैं। पूरी मानव जाति को उनका लाभ मिले, इसलिए हम उनके दिव्य प्रवचनों की शृंखला शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज आप और हम सबके साथ हमेशा रहते हैं। आज हम उनके प्रवचनों की छब्बीसवीं कड़ी पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के प्रवचन आपको कैसे लगे? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।- संपादक )
आत्मीय साधकों,
प्रिय आत्माओं, आज का यह प्रवचन दो अत्यंत सूक्ष्म लेकिन जीवन परिवर्तित करने वाले सिद्धांतों पर आधारित है—ईर्ष्या का त्याग और अनचाही सलाह से दूर रहना। यह दोनों बातें सरल दिखती हैं, परंतु मनुष्य के चरित्र, संबंधों, और आध्यात्मिक यात्रा की दिशा को गहराई से प्रभावित करती हैं।
ईर्ष्या क्यों जन्म लेती है?
ईर्ष्या तब जन्म लेती है जब मनुष्य दूसरों को देखकर भूल जाता है कि हर आत्मा का मार्ग, समय और फल अलग-अलग है।
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं:
“अनासक्ति और समभाव से कर्म करने वाला मनुष्य ही शांति को प्राप्त करता है।”
ईर्ष्या इस समभाव को तोड़ती है। यह मन में तुलना, हीनभावना और द्वेष को जन्म देती है।
ईर्ष्या का अर्थ है—“जो मेरे पास नहीं है, वही महत्वपूर्ण है।”
जबकि आध्यात्मिक सत्य है—“जो मेरे पास है, वही मेरे विकास का साधन है।”
ईर्ष्या का परिणाम – बाहरी नहीं, भीतर का नुकसान
ईर्ष्या हमें बाहर से नहीं, भीतर से नष्ट करती है।
बुद्ध ने कहा:
“ईर्ष्या ऐसे है जैसे तुम किसी और को मारना चाहो और खुद ज़हर पी लो।”
ईर्ष्यालु व्यक्ति कभी संतुष्ट नहीं रह सकता।
दूसरे के सुख से उसे पीड़ा होती है, और अपनी उपलब्धियों का भी आनंद नहीं ले पाता।
स्वामी विवेकानंद ने कहा—
“ईर्ष्या छोटी आत्मा का लक्षण है। महान आत्मा प्रोत्साहित करती है, दबाती नहीं।”
जो हृदय ईर्ष्या से भरा है, वहाँ प्रेम, करुणा और शांति का वास नहीं हो सकता।
ग्रंथों से उदाहरण – ईर्ष्या का पतन
रामायण में रावण का पतन ईर्ष्या और अहंकार से हुआ।
वह भगवान राम के गुणों को सहन न कर सका और विनाश का मार्ग चुन बैठा।
महाभारत में दुर्योधन का संपूर्ण जीवन ईर्ष्या का प्रतीक था।
भीष्म ने कहा—
“दुर्योधन का सबसे बड़ा शत्रु पांडव नहीं, उसकी अपनी ईर्ष्या थी।”
ये उदाहरण बताते हैं कि ईर्ष्या पहले मनुष्य के विवेक को हरती है, फिर उसकी शक्ति को, और अंत में जीवन को।
ईर्ष्या का उपचार – तुलना छोड़ें, विकास चुनें
ईर्ष्या तब मिटती है जब मन यह समझ लेता है—
हर आत्मा का समय अलग है
हर व्यक्ति की क्षमता अलग है
हर हेतु का फल अलग है
श्री कृष्ण कहते हैं—
“अपने स्वधर्म में स्थित रहो, वही तुम्हारा श्रेष्ठ कर्म है।”
अर्थात—
दूसरे की सफलता तुम्हारा खतरा नहीं, प्रेरणा है।
ईर्ष्या छोड़कर प्रेरणा अपनाओ।
जब आप कहें—
“यदि वह कर सकता है, तो मैं भी प्रयास कर सकता हूँ।”
तभी ईर्ष्या ऊर्जा में बदल जाती है।
“बिना मांगे सलाह” क्यों हानिकारक है?
मनुष्य अक्सर सोचता है कि वह दूसरों का भला कर रहा है, परंतु बिना पूछे दी गई सलाह कई बार घाव बन जाती है।
तैत्तिरीय उपनिषद कहता है—
“वाक् का संयम तप है।”
यह संकेत है कि हर बात बोलनी आवश्यक नहीं है।
अनचाही सलाह कुछ संदेश देती है—
“तुम पर्याप्त नहीं जानते।”
“तुम सक्षम नहीं हो।”
“तुम गलत हो।”
और यही भाव व्यक्ति के मन में विरोध, दुख और दूरी पैदा करता है।
बुद्ध का उदाहरण – मौन की शक्ति
एक व्यक्ति बुद्ध के पास आया और बोला—
“मुझे क्या करना चाहिए?”
बुद्ध ने उससे पूछा—
“क्या तुमने मार्ग पूछा है या स्वीकृति?”
जब व्यक्ति चुप रहा, बुद्ध ने कहा—
“सलाह तब ही सार्थक है, जब मन तैयार हो।”
यह संदेश स्पष्ट है—
सच्चा ज्ञान थोपने से नहीं, मांगने पर दिया जाता है।
श्री कृष्ण की नीति – पूछे बिना उपदेश नहीं
महाभारत में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उपदेश तब दिया जब—
अर्जुन भ्रमित था,
उसने मार्गदर्शन माँगा,
और उसने स्वयं कृष्ण को गुरु स्वीकारा।
इससे स्पष्ट होता है—
ऊँचा ज्ञान भी बिना आग्रह के व्यर्थ है।
कब सलाह देनी चाहिए?
जब सामने वाला स्वयं पूछे
जब वह पीड़ा में मार्ग खोज रहा हो
जब वह स्पष्ट रूप से मदद चाहता हो
जब आपका उद्देश्य अहंकार नहीं, करुणा हो
सलाह का आधार श्रेष्ठता नहीं, सेवा होना चाहिए।
मौन की महिमा
महर्षि पतंजलि ने कहा—
“वाणी का संयम मन को पवित्र करता है।”
कभी-कभी मौन ही सबसे बड़ा उपहार है।
लोग सलाह नहीं, सुनने वाला हृदय चाहते हैं।
ईर्ष्या और अनचाही सलाह – दोनों एक ही वृत्ति
दोनों का मूल है—
“मैं बेहतर हूँ।”
ईर्ष्या कहती है—
“दूसरा क्यों आगे?”
अनचाही सलाह कहती है—
“दूसरा स्वयं सोच नहीं सकता।”
दोनों अहंकार के रूप हैं।
आध्यात्मिक पथ का पहला कदम है—
अहंकार का विसर्जन।
समाधान का सूत्र
दूसरों की सफलता पर खुश होना साधना है
अपनी वाणी पर नियंत्रण तप है
तुलना छोड़कर कृतज्ञता अपनाना योग है
और करुणा के साथ मौन रखना ज्ञान है
अंतिम संदेश
कबीर कहते हैं—
“दूसर दुःख में दुखी, सुख में हरष न होय।
जो मन स्वच्छ रहे, वही संत कहाय।”
अर्थात—
जिसका हृदय ईर्ष्या से मुक्त है, वही संत मार्ग पर है।
और बिना मांगे सलाह छोड़कर,
यदि हम प्रेम, धैर्य और सम्मान से दूसरों को अपना मार्ग चुनने दें,
तो हमारा संसार अधिक शांति, अधिक संबंध और अधिक करुणा से भर सकता है।
प्रार्थना
हे परमात्मा,
हमारे मन से ईर्ष्या के अंधकार को मिटा,
वाणी में संयम दे,
और हृदय में करुणा भर दे।
दूसरे की सफलता में प्रसन्नता,
और अपने मौन में ज्ञान—
यही सच्चा आध्यात्मिक पथ है।
सर्वे भवन्तु सुखिनः ।
Author: Dilip Purohit
Group Editor









