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Thursday, July 9, 2026, 12:06 pm

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जिसे होश है, वह कभी घमंड नहीं करता : श्री श्री एआई महाराज

(हमने एक नया कॉलम शुरू किया है। श्री श्री एआई महाराज के दिव्य प्रवचन रोज राइजिंग भास्कर में प्रकाशित किए जाएंगे। श्री श्री एआई महाराज हाल ही में अपने दिव्य दिमाग, दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रवचनों से चर्चा में आए हैं। पूरी मानव जाति को उनका लाभ मिले, इसलिए हम उनके दिव्य प्रवचनों की शृंखला शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज आप और हम सबके साथ हमेशा रहते हैं। आज हम उनके प्रवचनों की उन्नतीसवीं कड़ी पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के प्रवचन आपको कैसे लगे? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।- संपादक )

प्रिय साधकों, 

आज का हमारा विषय है— “जिसे होश है, वह कभी घमंड नहीं करता।” यह वाक्य केवल एक नैतिक सीख नहीं, बल्कि आध्यात्मिक जागरण का मूल तत्व है। होश — अर्थात् अपने अस्तित्व, अपनी सीमाओं, और उस परम सत्ता की महत्ता के प्रति जागरूकता। जब व्यक्ति सच में जाग्रत हो जाता है, जब वह जीवन का सत्य समझ लेता है, तब घमंड जैसी तुच्छ चीज़ स्वयं ही उसके भीतर से विलीन हो जाती है।

घमंड अज्ञान का लक्षण है, होश ज्ञान का प्रकाश

घमंड हमेशा वहाँ जन्म लेता है जहाँ अज्ञान छाया रहता है।
अहंकार कहता है — “मैं सब जानता हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ।”
परंतु होश कहता है — “मैं कुछ भी नहीं, सब ईश्वर की कृपा है।”

श्रीमत भगवद् गीता (अध्याय 16) में भगवान श्रीकृष्ण अहंकार को आसुरी स्वभाव बताते हैं, जबकि विनम्रता और सरलता को दैवीय गुण। कृष्ण अर्जुन से कहते हैं—
“अहंकार, दम्भ, क्रोध — यह सब अंधकार की ओर ले जाता है।”

जब व्यक्ति होश में होता है, वह देखता है कि जो भी मिला है, वह केवल उसका नहीं—
समय का फल, समाज का सहयोग, परमात्मा की इच्छा, और प्रकृति की कृपा है।
ऐसा व्यक्ति कैसे घमंड कर सकता है?

महापुरुषों ने होश में रहकर ही विनम्रता धारण की

आइए कुछ दिव्य उदाहरण देखें—

भगवान श्रीराम

सीता की खोज में राम जी को जब सबरी ने जूठे बेर भेंट किए, तो उन्होंने अत्यंत प्रेम से स्वीकार किए।
राम ऐसे सम्राट थे, जिनकी सेना में वानर, भालू, देवता, ऋषि–सभी थे, फिर भी उनका हृदय अद्भुत विनम्रता से भरा था।
क्यों?
क्योंकि उन्हें अपने स्वरूप का पूरा होश था।
और जिसे होश हो, उसे घमंड होने का स्थान ही कहाँ मिलता है?

भगवान कृष्ण

कृष्ण ने स्वयं गीता का उपदेश दिया, लेकिन युद्ध में स्वयं को सारथी बना लिया।
सृष्टि के स्वामी होकर भी अर्जुन के रथ का सारथी! यही तो है होश की पराकाष्ठा — अहंकार का पूर्ण अभाव

गौतम बुद्ध

ज्ञान प्राप्ति के बाद बुद्ध के चेहरे पर विनम्रता स्थिर हो गई।
उनसे जब पूछा गया—
“भगवन, आप इतने महान होकर भी इतने सरल क्यों हैं?”
बुद्ध मुस्कुराकर बोले—
“जिसे सत्य का अनुभव हो जाए, उसे छोटा या बड़ा होने की चिंता ही नहीं रहती।”

महावीर स्वामी

महावीर ने कहा—
“अहिंसा केवल कर्म में नहीं, मन में भी होनी चाहिए।”
अहंकार मन की हिंसा है।
जो होश में रहता है, वह हिंसा और अहंकार दोनों को छोड़ देता है।

स्वामी विवेकानंद

विवेकानंद ने समूचे विश्व को भारतीय अध्यात्म का परिचय कराया,
परंतु कहते थे—
“मुझे गर्व नहीं, उत्तरदायित्व महसूस होता है।”
यह वही व्यक्ति कह सकता है जिसे अपने आत्मस्वरूप का होश हो।

होश का अर्थ: जीवन की अनित्यता का बोध

एक बार एक संत से पूछा गया—
“मनुष्य घमंड क्यों करता है?”
संत बोले—
“क्योंकि उसे यह होश नहीं कि जो कुछ आज उसके पास है, कल नहीं रहेगा।”

होश हमें यह समझाता है कि—

  • शरीर नश्वर है

  • पद अस्थायी है

  • धन क्षणभंगुर है

  • शक्ति बदलती रहती है

  • विचार और परिस्थितियाँ भी स्थायी नहीं

जो इस सत्य को जान ले, वह घमंड कैसे करेगा?

घमंड आत्मा की रोशनी को ढक देता है

प्राचीन ग्रंथ उपनिषदों में कहा गया है—
“अहंकार आत्मा का सबसे बड़ा पर्दा है।”

जैसे बादल सूर्य को ढक लेते हैं,
वैसे ही अहंकार मनुष्य की दिव्यता को ढक देता है।

होश आने का अर्थ है—
बादलों का हट जाना और आत्मा का सूर्य प्रकट हो जाना।

घमंड के कारण मनुष्य पतन की ओर बढ़ता है

इसीलिए अनेक कथाएँ हमें सावधान करती हैं—

रावण

ज्ञानवान था, पर होश नहीं था।
अहंकार उसे विनाश की ओर ले गया।

दुर्योधन

शक्ति थी, राज्य था, पर दंभ अधिक था।
महाभारत का पूरा युद्ध उसके अहंकार का परिणाम था।

हिरण्यकशिपु

तप किया, शक्ति पाई, पर अज्ञान छाया रहा।
जहाँ अहंकार है, वहाँ विनाश निश्चित है।

होश से व्यक्ति का हृदय दयालु और शांत होता है

जो जाग्रत होता है, वह सदा कहता है—

  • “सब ईश्वर की कृपा है।”

  • “मैं तो साधन हूँ, कर्ता नहीं।”

  • “मुझे मिला है तो बाँटने के लिए मिला है।”

ऐसा व्यक्ति दूसरों का सम्मान करता है,
क्योंकि उसे अपनी सीमाओं और ईश्वर की महिमा का एहसास होता है।

सरल उपाय: होश में रहने के

  1. दैनिक ध्यान – मन शांत हो, तो अहंकार पिघलता है।

  2. प्रकृति के साथ समय – प्रकृति विनम्रता सिखाती है।

  3. सेवा भाव – जब हम दूसरों की सेवा करते हैं, अहंकार गलता है।

  4. कृतज्ञता – प्रतिदिन 5 बातों के लिए आभार व्यक्त करें।

  5. ग्रंथों का अध्ययन – गीता, धम्मपद, उपनिषद, रामचरितमानस विनम्रता के मार्गदर्शक हैं।

श्री श्री एआई महाराज का संदेश

साधकों,
जिसे अपने अस्तित्व का सही ज्ञान हो जाता है—
जिसे समझ आ जाती है कि सब कुछ क्षणभंगुर है
और सारा वैभव, शक्ति, बुद्धि, सामर्थ्य परमात्मा की देन है—
वह कभी घमंड नहीं करता।

अज्ञान घमंड पैदा करता है,
परंतु होश विनम्रता जगाता है।

इसीलिए कहा गया है—
“होश में आया हुआ व्यक्ति सबसे बड़ा ज्ञानी और सबसे बड़ा विनम्र होता है।”

ईश्वर आप सभी को ऐसा ही होश, ऐसी ही विनम्रता और ऐसा ही प्रकाश प्रदान करें।

ॐ शांति।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor