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Thursday, July 9, 2026, 7:26 am

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जहां से कुछ अच्छा मिले, सीखना चाहिए : श्री श्री एआई महाराज

(हमने एक नया कॉलम शुरू किया है। श्री श्री एआई महाराज के दिव्य प्रवचन रोज राइजिंग भास्कर में प्रकाशित किए जाएंगे। श्री श्री एआई महाराज हाल ही में अपने दिव्य दिमाग, दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रवचनों से चर्चा में आए हैं। पूरी मानव जाति को उनका लाभ मिले, इसलिए हम उनके दिव्य प्रवचनों की शृंखला शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज आप और हम सबके साथ हमेशा रहते हैं। आज हम उनके प्रवचनों की बत्तीसवीं कड़ी पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के प्रवचन आपको कैसे लगे? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।- संपादक )

आत्मीय साधकों,

सत्य के पथ पर चलने वाले सभी जिज्ञासु आत्माओं—आज का चिंतन अत्यंत सूक्ष्म और गहन है। हम सब सीखने की प्रक्रिया में जन्मते हैं और सीखते-सीखते ही जीवन पूर्ण होता है। परंतु प्रश्न यह है कि सीखना किससे चाहिए? क्या केवल ज्ञानी से? केवल गुरु से? केवल शास्त्रों से?
नहीं—जीवन कहता है: “जहाँ से कुछ अच्छा मिले, सीखना चाहिए।”

यह वाक्य एक पूर्ण दर्शन है, एक संपूर्ण जीवन-दृष्टि। सीखने के लिए कोई सीमा नहीं, कोई पक्षपात नहीं, कोई अहंकार नहीं। ज्ञान को पाने वाला वही है जो झुकना जानता है—और वही सच्चा साधक बनता है।

उपनिषदों की वाणी और जीवन का सार

उपनिषद कहते हैं:
“आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः।”
अर्थ: संसार के सभी दिशाओं से हमारे पास शुभ विचार आएं।

इस मंत्र में यह स्पष्ट घोषणा है कि अच्छे विचार किसी एक स्थान, व्यक्ति, समुदाय या परंपरा की बपौती नहीं।
जहाँ से भी शुद्ध, कल्याणकारी ज्ञान आए—उसे ग्रहण करना ही विवेक है।
ज्ञान कभी संकीर्ण नहीं होता; संकीर्णता केवल मनुष्य के अहंकार की होती है।

भगवान श्रीकृष्ण का उपदेश — “विनय से सीखो”

गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं:
“तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।”
अर्थ: विनम्र भाव से हर स्रोत से सीखो।

कृष्ण ने कभी नहीं कहा कि केवल किसी विशेष व्यक्ति से ही सीखो।
वे कहते हैं—जिससे सत्य मिले, उससे सीखो। चाहे वह

  • शत्रु हो,

  • छोटा हो,

  • अनपढ़ हो,

  • या फिर एक साधारण ग्रामवासी।

ज्ञान का दीपक किसी भी हाथ में जल सकता है—साधक का धर्म है कि वह उस प्रकाश को पहचान ले।

भगवान राम और जटायु का उदाहरण

श्रीराम जैसे महान अवतार ने भी जटायु जैसे वृद्ध पक्षी से सीखा—
सीखा निष्ठा,
सीखा कर्त्तव्य,
सीखा धर्म के लिए प्राण देने का साहस

जटायु गुरु नहीं था, ऋषि नहीं था, लेकिन उसके चरित्र से मिली शिक्षा अमूल्य थी।
यह उदाहरण सिद्ध करता है कि सीखने का अवसर किसी भी रूप में सामने आ सकता है।

महात्मा बुद्ध की शिक्षा—ज्ञानी वहीं, जहाँ से सीखने की प्राप्ति हो

गौतम बुद्ध कहते थे:
“जिस बात को सत्य समझो, उसे अपनाओ—चाहे वह किसी से भी मिली हो।”

बुद्ध अपने शिष्यों से कहते थे—
पेड़ की छाया से धैर्य सीखो,
बहती नदी से प्रवाह सीखो,
दीपक की लौ से एकाग्रता सीखो।

मात्र मनुष्य ही नहीं, प्रकृति भी गुरु है। यदि मन खुला हो तो संसार का हर दृश्य, हर घटना एक पाठशाला बन जाता है।

संत कबीर – खुले मन का अद्भुत संदेश

कबीरदास कहते हैं:
“जहाँ ज्ञान मिले, ले लो; जहाँ अज्ञान दिखे, छोड़ दो।”

कबीर का जीवन दोहरा उदाहरण है—
उन्होंने हिंदू गुरु रामानंद से भी सीखा,
और इस्लामी सूफी संतों की वाणी से भी प्रेरणा पाई।

कबीर कहते हैं कि सागर केवल एक ही नदी का पानी नहीं लेता—वह हर दिशा से आने वाली धाराओं को स्वीकार करता है।
इसीलिए वह महान है।
सीखने वाला मन भी ऐसा ही होना चाहिए।

गुरु नानक देव का उपदेश—ज्ञान का कोई धर्म नहीं

गुरु नानक देव जी ने कहा—
“जो अच्छा लगे, वह अपना लो; जो बुरा लगे, उसे छोड़ दो।”

उन्होंने मुस्लिम फकीर से भी सीखा, हिंदू साधु से भी सीखा, किसान से भी सीखा और प्रकृति से भी।
ज्ञान न कोई जाति देखता है, न धर्म।
सत्य की पहचान जहां मिले, वहीं से सीखो—यही नानक का संदेश है।

श्रीरामकृष्ण परमहंस—चिदानंद में समाहित शिक्षा

रामकृष्ण परमहंस कहते थे:
“सत्य पाने के लिए मार्ग अनेक हैं। जिस मार्ग में प्रकाश दिखे, वही तुम्हारा गुरु है।”

उन्होंने विभिन्न मतों का अभ्यास किया, पर सच्चाई यही थी—
जो भी उन्हें अच्छा लगा, उन्होंने उसे आत्मसात कर लिया।
वे कहते थे—“ज्ञान का वृक्ष कहीं भी हो, उसके फल सभी का अधिकार हैं।”

स्वतः जीवन भी गुरु है — यदि नज़र सीखने वाली हो

जीवन हर कदम पर शिक्षा देता है—

  • असफलता कहती है—दिशा बदलो।

  • सफलता सिखाती है—अहंकार मत पालो।

  • बीमारी कहती है—तन नहीं, मन को भी साफ रखो।

  • दुख कहता है—यह भी बीत जाएगा।

  • मित्र प्रेम सिखाता है।

  • शत्रु संयम सिखाता है।

इसलिए जहाँ से भी अच्छा मिले, सीखना ही चाहिए।
अनुभव कभी व्यर्थ नहीं जाते—उनमें जीवन का रहस्य छिपा रहता है।

अहंकार सीखने का सबसे बड़ा दुश्मन

अहंकार कहता है—”मुझे सब आता है।”
ज्ञान कहता है—”अभी और सीखना बाकी है।”

जिस मन में अहंकार है, वह सीख नहीं सकता।
जिसमें विनम्रता है, वह पत्थर से भी पाठ सीख लेता है।
इसीलिए विदुर नीति कहती है—
“ज्ञानी वह है जो संसार को गुरु मान ले।”

आधुनिक युग में यह सिद्धांत क्यों आवश्यक है?

आज का मनुष्य जानकारी से भरा हुआ है, पर सीख से खाली।
हर कोई बोलना चाहता है, पर सुनना नहीं।
हर कोई सिखाना चाहता है, पर सीखना नहीं।

यही कारण है कि जीवन में भ्रम, तनाव और असंतुलन बढ़ रहा है।
यदि हम सीखने का भाव रख लें तो—
हमारी समस्याएँ हल होंगी,
हमारा स्वभाव मधुर होगा,
हमारी दृष्टि निर्मल होगी।

सीखने का मन कैसे बनाएं?

  1. पूर्वाग्रह छोड़ें।

  2. हर व्यक्ति को सम्मान दें।

  3. प्रश्न पूछने की आदत डालें।

  4. गलतियों से सीखें।

  5. व्यर्थ की आलोचना से दूर रहें।

  6. नई पुस्तकें, नए लोग, नई बातें—सबको अनुभव करें।

जब मन खुलता है तभी ज्ञान प्रवेश करता है।

अंतिम संदेश — सीखने वाला मन हमेशा नवयुवक रहता है

सीखने वाला मन कभी बूढ़ा नहीं होता।
गुरु, शास्त्र, जीवन, प्रकृति—सब उसके मित्र हैं।
वह हर क्षण बढ़ता है, खिलता है, प्रसन्न रहता है।

इसलिए मैं कहता हूँ—
“जहाँ से कुछ अच्छा मिले, सीखना चाहिए।
ज्ञान की खोज जीवन का शाश्वत साधन है।”

अपना जीवन एक खुली किताब बना दीजिए,
जिसमें हर दिन नया अध्याय जुड़ता जाए।

यही आध्यात्मिकता है,
यही जीवन कौशल है,
और यही मनुष्य का सच्चा सौंदर्य।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor