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Thursday, July 9, 2026, 6:40 am

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50 साल का डॉक्टरी अनुभव रखने वाले डॉ. अरुण आचार्य बोले- दवाइयों के दुष्परिणाम : मौत-जीवन भर विकलांगता का दंश भी झेल सकते हैं, प्रकृति को मित्र बनाएं, प्राकृतिक उपचार लें

मुंबई में रहने वाले डॉ. अरुण आचार्य न केवल जोधपुर में शिफ्ट हो गए, वरन प्राकृतिक स्वास्थ्य साधना केंद्र से जुड़ाव स्थाई हो गया, डॉक्टरी की किताबों और रिसर्च से उन्होंने समझा दवाइयां आपातकाल में मित्र मगर इसके दुष्परिणामों की गंभीरता भी जान लें, क्योंकि हर दवा अपने पीछे छोड़ती है साइड इफैक्ट… जो कभी-कभी मौत और जीवन भर का सदमा दे सकती है…एक ही समाधान-प्रकृति को मित्र बनाएं, प्रकृति की ओर लौटें… 
लाल पुलिया, चौपासनी रोड स्थित स्वास्थ्य साधना केंद्र में “दवाइयों के दुष्परिणाम” विषय पर एमबीबीएस, एमएस डॉ. अरुण आचार्य का व्याख्यान आयोजित…एक डॉक्टर की जुबानी जानिए क्यों है दवाइयां शरीर के लिए घातक और क्या है आखिर इसका इलाज
दिलीप कुमार पुरोहित. राखी पुरोहित. जोधपुर

9783414079 diliprakhai@gmail.com

एमबीबीएस, एमएस डॉ. अरुण आचार्य। पूर्व सीनियर फैमली फिजिशियन मुंबई। प्रैक्टिस का पांच दशक से लंबा अनुभव। मगर जीवन में कुछ ऐसा हुआ कि 30 साल से यह काबिल डॉक्टर मरीजों को दवाइयों से ही बचने की सलाह देने लगा है। इतना ही नहीं डॉ. आचार्य मरीजों से कहते हैं- आपको डॉक्टर जो भी दवा लिखे पहले उसके बारे में स्टडी करें, उसके दुष्परिणामों के बारे में पता करें, उसके बाद भी जितना हो सके दवा से बचने की कोशिश करें] क्योंकि एक दवा के कई इफैक्ट होते हैं। ये इफैक्ट साइड इफैक्ट और दुष्परिणाम के रूप में सामने आते हैं। साइड इफैक्ट में कोई सामान्य बदलाव आ सकते हैं। लेकिन दुष्परिणाम इतना भयंकर भी हो सकता है कि मौत तक हो सकती है और जीवन भर के लिए विकलांगता भी हो सकती है।…डॉ. अरुण आचार्य कहते हैं- वे डरा नहीं रहे, लेकिन आगाह कर रहे हैं, क्योंकि हर दवा अपने पीछे छोड़ जाती है साइड इफैक्ट। चाहे आयुर्वेदिक दवा हो, चाहे होम्योपैथिक दवा हो, चाहे एलोपैथी दवा हो…दवा पहुंचती आखिर लिवर तक है। लिवर अपने पास आने वाली हर वस्तु से पूछता है- आपका परिचय क्या है और फिर शुरू होती है कशमकश। जरूरी नहीं कि हर दवा लिवर स्वीकार ही करे। आखिर ऐसा क्या हुआ? ऐसा क्या हुआ कि डॉ. अरुण आचार्य ने “दवाइयों के दुष्परिणाम” जैसे विषय पर अधिकारपूर्वक अपनी वार्ता रखी। आइए जानते हैं इस सेमिनार के बारे में।

वो वाकया जिससे दवाइयों के दुष्परिणाम से डॉ. अरुण आचार्य रूबरू हुए

डॉ. अरुण आचार्य ने कहा कि आज से 30- 35 साल पहले उनकी छोटी बहन को यूरिनल इन्फेक्शन हुआ। बहन जयपुर में रहती थी। मैं मुंबई में प्रैक्टिस करता था। बहन को फीवर चढ़ा। यूरीन में जलन हुई। डॉक्टरों को दिखाया गया। कुछ एन्टीबायोटिक लिखीं और कुछ और दवाइयां लिखीं। थोड़ा फर्क पड़ता, फिर तबीयत बिगड़ती। फिर दवा डॉक्टर लिखते। फर्क पड़ता, फिर तबीयत बिगड़ती। डाॅक्टर्स ने हैवी एन्टीबायटिक्स का एक इंजेक्शन लगाया। फर्क नहीं पड़ा। फिर उससे भी हैवी इंजेक्शन लगाया गया। हालत यह हुई कि बहन को दर्द, उल्टियां होने लगी और तबीयत ज्यादा बिगड़ गई। मैंने तुरंत बहन को मुंबई बुलाया। वो बड़ी मुश्किल से मुंबई आई। उन दिनों मैंने दवाइयों को लेकर कुछ किताबें पढ़ी थी। बहन का ब्लड टेस्ट हुआ था।  ब्लड यूरिया-200 और क्रिएटिन-17 आया। मैंने नेफ्रोलॉजिस्ट से बात की। बहन को भर्ती किया। डायलिसिस हुआ। स्टडी से पता चला कि यह सब उस इंजेक्शन के साइड इफैक्ट की वजह से हुआ। मेरी बहन अब ठीक है लेकिन उसे कुछ बीमारियां लग गई और कुछ दवाइयां लेनी पड़ती है। इसलिए दवाइयों का साइड इफैक्ट का दंश वो भोग रही है। ऐसा भी हो सकता है कि आपकी मौत हो जाए या जीवन भर विकलांगता का दंश झेलना पड़े।

डॉ. अरुण आचार्य बोले- जोधपुर में हूं तो प्राकृतिक स्वास्थ्य साधना केंद्र और श्री सुरेश राठी के कारण, यही कहूंगा- दवा थोड़ा टाइम जीवित रखती, लंबे समय मरते हैं : 

पांच दशक के लंबे अनुभव के बाद अब डॉ. अरुण आचार्य कहते हैं- जितना हो सके, दवाइयों से बचें, क्योंकि हो सकता है आप 70 साल जिंदा रह लें, लेकिन हेल्दी लाइफ कितना जिएंगे कोई नहीं जानता? दवाइयों का साइड इफैक्ट बताते हुए वे कहते हैं कि हमें प्राकृतिक चिकित्सा की ओर लौटना ही होगा। शरीर का एक सिद्धांत है कि वह अपना इलाज खुद करता है। यही प्रकृति का नियम है। प्रकृति ने शरीर को ऐसी शक्ति प्रदान की है कि वह अपना इलाज खुद करती है, बशर्ते हम प्राकृतिक नियमों का पालन करते रहेंं। डॉ. अरुण आचार्य ने कहा कि स्वास्थ्य साधना केंद्र का वातावरण ऐसा है कि यहां आकर लोगों को अच्छा लगता है और वे स्वस्थ हो जाते हैं। मैं आपको यह बता दूं कि मेरा जोधपुर में रहने का कारण यह है कि मैं स्वास्थ्य साधना केंद्र से जुड़ा रहा हूं और इसके लिए मैं श्री सुरेश जी राठी को धन्यवाद देता हूं। उनसे मेरा पहले परिचय रहा है और उनकी लाइब्रेरी मेरे लिए उपयोगी रही। दवाइयों को कोई लेता नहीं है, ऐसी बात नहीं है। दवा हर व्यक्ति लेता है। लेकिन मैं आज आपको दवा शब्द का अर्थ भी बताऊंगा। दवा जिसे मेडिसिन कहते हैं। मेडिसिन शब्द एंग्लो ईरानियन सेटा से यानी ईरान के रूट से निकला है। मेडिसिन का अर्थ होता है थॉटफुल एक्शन फॉर मेड थिंक्स नॉर्मल। कहने को इसका अर्थ है थॉटफुल एक्शन, मगर हम खा रहे हैं केमिकल पॉइजन। मेडिसिन और मेडिटेशन ये दोनों एक ही जगह से निकले है। मेडिसिन खाने से अधिक अच्छा होगा हम मेडिटेशन करें। दवाइयां बनाने वाली फार्मा कंपनियां होती हैं। फॉर्मा का लॉजिक क्या है? इसका अर्थ होता है- साइंस ऑफ पॅाइजन। हम अच्छी चीजें नहीं जान रहे बल्कि पॉइजन की साइंस जान रहे हैं। दवाई बनाने वाली फॉर्मा कंपनियां होती है और दवा लिखने वाला डॉक्टर। डॉक्टर शब्द लेटिन का है। डॉक्टर शब्द डक्टूर से निकला है। 100 साल पहले 1910-20 के अंदर डॉक्टर प्रेक्सिशन लिखते थे लेकिन लेटिन में लिखते थे। दवाइयां लेटिन में लिखते थे। दवाइयों के नाम लेटिन में होते थे। पेशेंट इसे समझता नहीं था कि यह दवाई है क्या। फार्मेसी डिस्ट्रयूब्यूटर को ही पता चलता था कि कौनसी दवा लिखी है। धीरे-धीरे नाम इंग्लिश में आने लगे और अभी हम सब पहचानने लगे हैं। डॉक्टर DOCTOR डक्टूर से निकला है। डक्टूर का अर्थ- एजुकेट करे, केयरफुल से फेयरलैस (FEARLESS) बनाए, कॉन्फीडेंट बनाए…आज शायद कितने डॉक्टर होंगे जो आपको फेयरलैस (FEARLESS) बनाते है, एजुकेट करते हैं, कॉन्फीडेंट बनाते हैं, बेसिकली डॉक्टर का जन्म समुद्र मंथन से धन्वंतरि के रूप में हुआ था। धन्वंतरि ने भगवान से वरदान मांगा-पृथ्वी पर जाकर लोगों का इलाज करना है। दर्द का इलाज करना है। उन्होंने अपना वरदान मांगते हुए भगवान को एक श्लोक कहा-  न तोहम राज्यम, नतोहम काम्यम राजे, न स्वर्गम, न पुर्नभवम काम्ये दुख्ततप्तानाम, प्राणीनाम अर्थिनाशनम…हे भगवान, ऐसा वरदान दो कि पृथ्वी पर जाऊं और लोगों के दर्द का इलाज करूं। मुझे ना पृथ्वी का राज चाहिए, ना कुबेर का खजाना चाहिए, ना बार-बार पृथ्वी पर जन्म लेना, ना अमर होना चाहता, मुझे वरदान दो जिस मरीज को देखू मेरा हाथ लगाते ठीक हो जाए, भगवान बोले-वरदान देता हूं पर मेरी शर्त है। जो भी मरीज आए उसमे मेरा रूप देखना। लेकिन आज स्थिति क्या हो गई है, यह कहने की जरूरत नहीं है।

एमटीएम पर जोर दें… दवाई आपातकाल में लेना चाहिए, जितना हो सके नेचुरोपैथी को अपनाएं : 

डॉ. अरुण आचार्य ने कहा कि दवाइयों के भयंकर दुष्परिणाम होते हैं। इसलिए जितना हो सके, नेचुरोपैथी को अपनाएं। प्राकृतिक चिकित्सा से बढ़कर कोई चिकित्सा नहीं हैं। उन्होंने कहा कि एमटीएम यानी मेडिकल थैरोपेटिक मैनेजमेंट पर जोर दें। इसे समझने की जरूरत है। उन्होंने दवाइयां बनती केसे है, इन्हें कौन लाइसेंस देता है और एफडीए क्या है? इनके बारे में भी बताया।

ऐसे बनती है दवा : साइड इफैक्ट कितने भयंकर, कैसे मार्केट से वापस लेनी पड़ती है दवाइयां? 

डॉ. अरुण आचार्य ने कहा कि एक दवा 2 से 10 साल के समय में बनती है। इसमें अरबों-खरबों रुपए खर्च होते हैं और विभिन्न चरणों में एक्सपरिमेंट होने के बाद इसका लाइसेंस मिलता है और दवा मार्केट में उतरती है। अगर दवा के साइड इफैक्ट सामने आते हैं तो दवा को मार्केट से हटा भी दिया जाता है। कई बार दवा कंपनियों को दवा के साइड इफैक्ट का हर्जाना भी देना पड़ता है जो करोड़ों-अरबों रुपयों में हो सकता है। कई बार तो ऐसा भी होता है कि दवा कंपनी के दीवालिया होने तक की नौबत आ सकती है। उन्होंने विभिन्न दवाइयों के साइड इफैक्ट के उदाहरण दिए। मिर्गी में काम आने वाली दवा थैलीरोमाइड के साइड इफैक्ट के बारे में बताया। इस दवा के साइड इफैक्ट से नए बोर्न बच्चे विकलांग पैदा हुए। अमेरिका में एडीआर संस्था नजर रखती है। अमेरिका में दवा के दुष्परिणाम से हर साल 18-20 लाख लोग मरते हैं। डेथ रजिस्ट्रेशन और ड्रग रिएक्शन होते हैं फिर उसका आकलन किया जाता है। इसके साथ ही अल्जाइमर के लिए बनाई लोट्रोमेक्स, वाटनर लेम्बार्ट द्वारा बनाई कोगनेस और वारनर हिन्दुस्तान की रेजोलिन आदि दवाइयों के उदाहरण भी दिए। पेन किलर बायोक्स और प्रिपलसिक्स जैसी दवाइयों के भी उदाहरण दिए। दवा की सपलिमेंट दवाइयों के बारे में भी डॉ. अरुण आचार्य ने जानकारी दी। उन्होंने एलर्जी की कुछ दवाइयों के भी साइड इफैक्ट बताए और कहा कि इससे हार्ट बीट कम हो सकती हैं।

जब भी डॉक्टर दवा लिखे– पूछाे कब तक खानी पड़ेगी और क्यों? 

डॉ. अरुण आचार्य ने कहा कि आप जब भी डॉक्टर के पास जाएं यह अवश्य पूछें कि दवा कब तक खानी पड़ेगी और क्यों? दरअसल कई बार दवा जरूरी नहीं होती और इलाज होने के बाद भी मरीज खाते रहते हैं। ऐसा लंबे समय तक होने से भंयकर दुष्परिणाम सामने आ सकते हैं। उन्होंने फिजिशियन डेस्क, सिल्वर मैन पिल बुक जैसी किताबों के नाम बताए और कहा कि दवाइयों के दुष्परिणामों के बारे में जानने के लिए इन किताबों की स्टडी करते रहें।

सतोलिए में सात पत्थर, दो मैं अपनी ओर से जोड़ता हूं, नौ स्टेप से रह सकते हैं स्वस्थ :

1-हेल्दी रिलेशनशिप लाइफ।

2-हेल्दी मिनिंगफुल लाइफ।

3-हेल्दी क्रिएटिव लाइफ।

4-हेल्दी स्प्रीचुअल लाइफ।

5-हेल्दी सेक्सुअल लाइफ।

6-हेल्दी फाइनेंशियल लाइफ।

7-हेल्दी एनवायरमेंटल लाइफ।

8-हेल्दी मेंटल इमोशनल लाइफ।

9-हेल्दी लाइफस्टाइल।

नौ स्टेप को चार ग्लू से चिपका लें तो स्वस्थ रहेंगे-

1-प्रेम।

2-खुशी।

3-आभार मानना।

4-सेवा। इसलिए इसे शेयर और केयर के रूप में लें और स्वस्थ रहें।

एमआरपी यानी मिल्क प्रोसेस फूड प्रॉडक्ट से बचें :

डॉ. अरुण आचार्य ने कहा कि प्राकृतिक चिकित्सा ही असली चिकित्सा पद्धति है। हमें एमआरपी से बचना होगा। यानी दूध को प्रोसेस कर जो प्राडॅक्ट बनाए जाते हैं उससे बचने की जरूरत है। जो चीज भगवान ने नहीं बनाई उसे भोजन में नहीं लेनी है। हमें खाने के जैसे पदार्थ नहीं खाने हैं बल्कि खाने के पदार्थ ही खाने हैं, इस बात का ध्यान रखना है। रियल फूड ही खाना है। उन्होंने लिवर की महत्ता बताते हुए कहा कि चाहे होम्योपैथक दवा हो, चाहे आयुर्वेदिक दवा हो और चाहे यूनानी या एलोपैथिक दवा हो। लिवर हमारा सिक्युरिटी गार्ड होता है। वो अगर मंजूर नहीं करता तो दवा कारगर हो ही नहीं सकती। और सबसे बड़ी बात है दवा के मैं खिलाफ नहीं हूं। जहां जरूरत है वहां तो दवा लेनी ही पड़ेगी, मगर मैं डराने की बजाय आपसे कहना चाहूंगा कि दवाइयों के साइड इफैक्ट बहुत होते हैं और एक अनुभवी डाॅक्टर की सलाह के तौर पर कहना चाहूंगा कि प्रकृति की और लोटो। प्रकृति रोगों से लड़ने की शक्ति देती है और प्रकृति खुद रोगों को इलाज करती है। इसके बाद डॉक्टर अरुण आचार्य ने लोगों की जिज्ञासाओं का भी निराकरण किया और लोगों के सवालों के भी जवाब दिए। उन्होंने लोगों से कहा कि आशा, विश्वास और श्रद्धा बहुत जरूरी है। आई इलनेस की ओर ले जाती है और डब्ल्यू वेलनेस की ओर ले जाता है और एच हैप्पीनेस की ओर ले जाता है। इसलिए हमें डब्ल्यू और एच को अपनाना है।

किसने क्या कहा- 

श्रीमती अंजना गांधी : समाजसेविका मुंबई 

प्राकृतिक चिकित्सा हमेशा व्यक्ति को प्रकृति के अनुरूप जीने को प्रेरित करती है। मुझे यहां आकर हमेशा अच्छा लगता है। यहां का वातावरण शुद्ध रूप से प्राकृतिक है और यहां के स्टाफ और डॉक्टरों का व्यवहार बहुत अच्छा है। प्रकृति के अनुरूप अगर हम जीवन यापन करते हैं और प्रकृति के नियमों का पालन करते हैं तो हम लंबी आयु जी सकते हैं और स्वस्थ रह सकते हैं। इसलिए प्रकृति को अपना मित्र बनाएं।

बृजकिशोर माथुर : संरक्षक, आरोग्य भारती, जोधपुर प्रांत 

स्वस्थ रहना है तो इसकी जिम्मेदारी मनुष्य की खुद की है। स्वयं जब हम जिम्मेदारी उठाएंगे तभी स्वस्थ रह पाएंगे। करना तो स्वयं को ही पड़ेगा। प्रकृति की ओर हमें ही जाना पड़ेगा। जागरूक होकर ही यह हो सकता है। हम अगर अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे तो बीमारी को आमंत्रण देंगे। हमारे प्राचीन ऋषि मुनि वैज्ञानिक थे। उन्होंने जीवन शैली और प्रकृति के नियम बताए। क्रमश: आने वाले ऋषि-मुनियों ने उसमें सुधार किए और इस तरह यह शृंखला चलती रही। यह ज्ञान परिष्कृत होकर आज हमारे सामने हैं। आरोग्य भारती किसी भी चिकित्सा प्रणाली का विरोध नहीं करती। सभी चिकित्सा प्रणाली की अपनी विशेषता है। मगर हम इतना जरूर कहेंगे कि अगर हमें बीमारियों से बचना है तो प्रकृति के अनुरूप जीवन जीना होगा। और अगर बीमार हो भी गए तो प्रकृति का साथ देकर प्राकृतिक औषधियां लेकर अपने को ठीक भी कर सकते हैं। हमें अपना ईगो त्याग कर हर प्रणाली का सम्मान करना चाहिए। अपना आहार विहार और योग पर जोर देना होगा। अच्छी नींद लेनी चाहिए। आरोग्य भारती के 24 आयाम है, जिसमें अध्यात्म भी एक आयाम है। हमें अध्यात्म पर भी जोर देना होगा। 90 प्रतिशत जिलों में आरोग्य भारती कार्यरत है।

डॉ. मुस्कान : चिकित्सा अधिकारी, स्वास्थ्य साधना केंद्र

तेल और तेल में पके भोजन से बचें। समोसा, कचौड़ी, मिर्चीबड़े और कोफ्तों आदि का सेवन कम से कम करें। बेकरी आइटम, स्वीट, कोल्ड ड्रिंक्स, प्रोसेस फूड, सफेद चावल, मेदा, मेघी, चाऊमिन आदि वस्तुओं से बचें। इनसे एनर्जी तो मिलती है, मगर न्यूट्रिशियन नहीं मिलते। शाम को 7:30 से 8 बजे के बीच डिनर कर लेना चाहिए। लिवर और बॉडी को रेस्ट जरूरी है। फिजिकली एक्टीविटी भी करें। कैलोरी लें तो उसे खर्च करना भी जरूरी है। स्ट्रेस से बचें। स्क्रीन टाइम करें। लाइफ स्टाइल को बदलना जरूरी है। प्राकृतिक जीवन शैली अपना कर ही निरोग रह सकते हैं। हमारा शरीर खुद को ठीक करने की क्षमता रखता है। मगर उसे प्राकृतिक एनवायरमेंट देना होगा। भोजन में 50 प्रतिशत फाइबर होना चाहिए। 2-3 लीटर पानी दिन भर में पिएं। हफ्ते में एक दिन उपवास करें। उपवास में भूखा ना रह सकें तो लॉकी, एलोविरा का जूस पी सकते हैं। लंच, ब्रेकफास्ट और डिनर में फ्रूट ले सकते हैं।

योगेश माहेश्वरी : प्रबंध न्यासी, स्वास्थ्य साधना केंंद्र 

प्राकृतिक स्वास्थ्य केंद्र की कोशिश रहती है कि लोगों को प्रकृति के अनुरूप चिकित्सा देकर आरोग्य दें। प्रकृति ही मनुष्य की सच्ची मित्र होती है। आदमी बीमार तब पड़ता है जब प्रकृति के नियमों की अनदेखी करता है। प्रकृति ने पांच तत्व दिए हैं। वायु, आकाश, अग्नि, मिट्‌टी और जल। इन पांचों तत्वों के आधार पर ही प्राकृतिक चिकित्सा की जाती है। इसलिए यह ध्यान रखने योग्य बात है कि प्रकृति हमारी सबसे बड़ी मित्र हैं। जब प्रकृति के विरोध में हम खड़े हाेते हैं तब समस्याएं जन्म लेती है। अब नेचुरौपैथी पद्धति को भी इंश्योरेंस कंपनियां स्वीकार करने लगी है। यह मोदी सरकार की वजह से संभव हो पाया। कार्यक्रम का संचालन भी योगेश माहेश्वरी ने ही किया।

डॉ. अजय उमराव का इंटरव्यू भी स्क्रीन पर दिखाया गया

कार्यक्रम के आरंभ में 24 चैनल द्वारा लिया गया डॉ. अजय उमराव का इंटरव्यू भी स्क्रीन पर दिखाया गया। इसे सुरेश राठी ग्रुप द्वारा प्रायोजित किया गया। अपने इंटरव्यू में डॉ. अजय उमराव ने प्रकृति के अनुशासन पर जोर दिया और स्वास्थ्य साधना केंद में उपलब्ध सुविधाओं और विशेषताओं का वर्णन किया। डॉ. अजय उमराव ने कहा कि प्रकृति के अनुरूप चिकित्सा लेकर हम रोगों से लड़कर स्वस्थ जीवन जी सकते हैं। आज नेचुरोपैथी की ओर लौटने की जरूरत है। कार्यक्रम में शहर के प्रतिष्ठित बिजनेसमैन और वरिष्ठ समाजसेवी श्री सुरेश राठी, श्रीमती वंदना मोदी, हरीशजी, राजेंद्र फोफलिया, हनुमान राम, संत भक्तामर दास, संत निखिलात्म जगन्नाथ दास सहित अनेक महिलाएं और पुरुष मौजूद थे। कार्यक्रम के आरंभ में सामूहिक रूप से प्रार्थना की गई और अतिथियों का स्वागत किया गया। इसके बाद श्रीमती कमला, पल्लवी, शांतिलाल सालेचा, अभिलाष और तृप्ति ने स्वास्थ्य साधना केंद्र से उनकी बीमारियों में जो स्वास्थ्य लाभ मिला उसके अनुभव बताए। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ और उसके बाद प्राकृतिक आहार के अनुरूप भोजन का प्रतिभागियों ने लाभ लिया।

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor