मुद्दा : सेस नहीं बैन चाहिए
-गुटखा-पान मसाले का मार्केट लगभग ₹45,000 करोड़ का बताया जाता है। (गुटखा, पान, खैनी आदि) के कारण स्वास्थ्य नीतियों में तेजी न लाई गई, तो भारत पर इसके कारण आने वाले दीर्घकालीन स्वास्थ्य व देखभाल खर्च 1,58,705 करोड़ रुपये तक पहुँच सकता है। यदि पूर्ण बैन लागू हो जाए और इसके सेवल में साल-दर-साल गिरावट आए- मान लीजिए कि 50 प्रतिशत रोग-घटना कम हो जाए (क्योंकि पूरी तरह से रोकना शायद मुश्किल हो)- तो भी सालाना लगभग ₹80,000–₹90,000 करोड़ तक का स्वास्थ्य व्यय बचाया जा सकता है।
-सरकार का कहना है कि गुटखा-पान मसाला पर पर जीएसटी की अधिकतम दर 40 प्रतिशत होगी। इससे जो राजस्व मिलेगा उसे राज्य सरकारों के साथ साझा किया जाएगा और स्वास्थ्य सेवाओं और जागरूकता कार्यक्रमों पर खर्च किया जाएगा। इस मूर्ख सरकार पर हंसी आती है। एक रोग का इलाज करने की बजाय दूसरे रोग को आमंत्रण दिया जा रहा है। क्या ही अच्छा हो सरकार गुटखा और पान मसाला पर पूर्ण प्रतिबंध ही लगा दे। अगर ऐसा होता है तो लोग इन कारणों से बीमार ही नहीं पड़ेंगे, अस्पतालों पर बोझ नहीं होगा और जो सरकार का स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च बढ़ेगा वह प्राप्त राजस्व से अधिक होगा…मगर सरकार न केवल मूर्ख है, या अधिक चतुर बनने की कोशिश कर रही है या पूंजीवादी ताकतों के आगे घुटने टेक चुकी है…प्रस्तुत है राइजिंग भास्कर की मुक्कमल रिपोर्ट-
दिलीप कुमार पुरोहित. नई दिल्ली
लोकसभा में 4 दिसंबर 2025 को पेश Health and National Security Cess Bill, 2025 के साथ सरकार ने गुटखा-पान मसाले (और अन्य स्मोकलेस तंबाकू / मसाला उत्पादों) पर भारी-भरकम सेस लगाने की घोषणा की है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि यह इस अतिरिक्त राजस्व को स्वास्थ्य सेवाओं और जागरूकता कार्यक्रमों पर खर्च किया जाएगा और राज्य सरकारों के साथ साझा किया जाएगा। यह सरकार का मूर्खतापूर्ण कदम है। क्या ही अच्छा होता कि सरकार गुटखा और पान मसाला पर पूर्ण प्रतिबंध लगा देती, मगर सरकार ने ऐसा नहीं किया।
लेकिन — क्या सेस लगाना पर्याप्त है? या इस जहरीले मसाले पर पूरा प्रतिबंध लगाना ज़्यादा उपयुक्त और ज़रूरी है?
हमारी रिपोर्ट में हम इस बिल के विरोध में — और पूर्ण प्रतिबंध के पक्ष में — तर्क, आंकड़े, स्वास्थ्य-वित्तीय लाभ, तथा सामाजिक-नैतिक युक्तियां एक साथ पेश करते हैं।
समस्या: गुटखा-पान मसाला — स्वास्थ्य व सामाजिक बोझ
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एक प्रमुख अध्ययन के अनुसार, स्मोकलेस तंबाकू व पान/गुटखा जैसे उत्पादों के सेवन के कारण भारत में मुंह (ओरल) कैंसर के मामलों में वृद्धि हुई है।
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2022 में, विश्व स्तर पर तंबाकू व अरिका नट उत्पादों के कारण हुए 120,200 ओरल कैंसर में से 83,400 मामले केवल भारत के थे।
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इस प्रकार, भारत में स्मोकलेस तंबाकू (जैसे गुटखा, पान मसाला) ही दक्षिण-एशिया में ओरल कैंसर की सबसे बड़ी वजह है।
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ओरल कैंसर के अलावा दांतों की सड़न, मसूड़ों की बीमारी, मुंह में अल्सर, Leukoplakia जैसी पूर्व-कैंसर स्थितियाँ भी इन उत्पादों से जुड़ी पाई गई हैं।
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पीड़ितों का इलाज, अस्पतालों के खर्च, कीमोथेरेपी या सर्जरी, लंबा उपचार — इन सबका आर्थिक बोझ न केवल प्रभावित व्यक्ति/परिवार पर पड़ता है, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली पर भी भारी पड़ता है।
एक अनुमान के अनुसार, यदि धुआं रहित तंबाकू (गुटखा, पान, खैनी आदि) के कारण स्वास्थ्य नीतियों में तेजी न लाई गई, तो भारत पर इसके कारण आने वाले दीर्घकालीन स्वास्थ्य व देखभाल खर्च 1,58,705 करोड़ रुपये तक पहुँच सकता है।
इन आंकड़ों को देखते हुए, यह कहना गलत नहीं कि गुटखा-पान मसाला न केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए जोखिम है, बल्कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणाली व अर्थव्यवस्था के लिए भी भारी बोझ है।
क्या सिर्फ सेस लगाना पर्याप्त है? सरकार क्यों न लगा दे बैन?
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आम बाजार में गुटखा-पान मसाले का मार्केट लगभग ₹45,000 करोड़ का बताया जाता है।
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वहीं, इन उत्पादों के कारण स्वास्थ्य देखभाल पर जो खर्च आना है — उसे देखते हुए सेस के रूप में थोड़ा राजस्व लेना एक छोटा उपाय मात्र हो सकता है।
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अगर सरकार पूरी तरह से बैन लगा दे — अर्थात निर्माण, भंडारण, बिक्री, वितरण सभी पर प्रतिबंध — तो:
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गुटखा-पान मसाले से होने वाले कैंसर, मुंह, दांत, मसूड़ा व अन्य रोगों की संख्या कम होगी।
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लोगों को अस्पतालों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे, चिकित्सा खर्च से निजात मिलेगी।
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सरकार को इन रोगों के इलाज व देखभाल पर अतिरिक्त बजट नहीं देना पड़ेगा।
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दीर्घकालीन स्वास्थ्य बोझ कम होगा, और संसाधन बचेंगे।
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दूसरी ओर, सेस लगाने से केवल कीमत बढ़ेगी, लेकिन यदि लोग अस्वस्थता के प्रति जागरूक न हुए, या आदत बनी रही, तो वे गुटखा-पान मसाला खरीदना बंद नहीं करेंगे।
सच यही है कि — सामाजिक और स्वास्थ्य हित में — बैन का विकल्प सेस से कहीं बेहतर है।
अगर बैन हो जाए — कितनी बचत हो सकती है?
थोड़ा अनुमान लगाने की कोशिश करें:
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अनुमान है कि स्मोकलेस तंबाकू उत्पादों से जुड़े रोगों व स्वास्थ्य देखभाल पर भारत को हर साल 1,58,705 करोड़ रुपये तक खर्च करना पड़ सकता है।
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यदि पूर्ण बैन लागू हो जाए, और इसके सेवन में साल-दर-साल गिरावट आए — मान लीजिए कि 50 % रोग- घटना कम हो जाए (क्योंकि पूरी तरह से रोकना शायद मुश्किल हो) — तो भी सालाना लगभग ₹80,000–₹90,000 करोड़ तक का स्वास्थ्य व्यय बचाया जा सकता है।
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इसके अतिरिक्त, इससे जुड़े व्यक्तिगत खर्च, सामाजिक उत्पादन हानि, आर्थिक बोझ आदि भी घटेंगे — जिसका मापन करना कठिन है, लेकिन सामूहिक रूप से यह देश की आर्थिक सेहत में महत्वपूर्ण योगदान देगा।
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यानि सरकार को सिर्फ सेस से प्राप्त होने वाला राजस्व ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यय, सामाजिक बोझ और आर्थिक नर्क — तीनों में महत्वपूर्ण कमी मिलेगी।
उद्योग, कंपनियाँ व सरकारी तर्क — क्या वे गुटखा-पान मसाला कंपनियों की रक्षा कर रही हैं?
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बाजार आंकड़ों के अनुसार, भारत में पान मसाला उद्योग 45,000 करोड़ रुपये का है।
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सरकार को इस उद्योग से मिलने वाली आमदनी – लगभग 12,000 करोड़ रुपये — तात्कालिक राजस्व जैसा दिखता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह आमदनी असली अर्थव्यवस्था के लिए स्थायी और लाभकारी है, या अस्थायी और हानिकारक? कुछ आलोचक कहते हैं कि यह राशि इतनी ही है जितनी “दाग” — यानी स्वास्थ्य व सफाई के खर्च में खर्च हो जाती है।
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सेस लगाने का मतलब है: कंपनियों को अधिक टैक्स देना, महँगी बिक्री करना, लेकिन यदि सरकार पर स्वास्थ्य व सफाई खर्च कम नहीं हो रहा — तो क्या हालात बदलेंगे? संभव है कि कंपनियाँ टैक्स के बोझ के कारण कीमतें बढ़ाएं, लेकिन लोग कम या बंद न करें।
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ऐसे में सेस सिर्फ एक मध्यवर्ती समाधान है — जो कंपनियों का बचाव करता है, वास्तविक समस्या (स्वास्थ्य व उपभोग) को नहीं हटाता।
पूरी तरह बैन हो, क्योंकि भारत के लोग स्वस्थ रहेंगे तभी देश विकसित होगा
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गुटखा-पान मसाला केवल उद्योग व बाजार का मसला नहीं है; यह देश का सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है।
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सेस बिल — जैसा वर्तमान में प्रस्तावित है — एक सजग कदम हो सकता है, लेकिन यह समस्या का समाधान नहीं है। यह उद्योग को सजग बनाता है, लेकिन स्वास्थ्य-वित्तीय और सामाजिक बोझ को घटाना नहीं।
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पूरी तरह बैन + कड़ाई से प्रवर्तन — यही वह उपाय है जो दीर्घकाल में स्वास्थ्य व अर्थव्यवस्था दोनों को लाभ पहुंचाएगा।
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सरकार को चाहिए कि वह सिर्फ सेस लगाने के बजाय — गुटखा-पान मसाले के उत्पादन, बिक्री, वितरण पर पाबंदी लगाए, अवैध बिक्री के खिलाफ कार्रवाई तेज करे, जागरूकता एवं नशा मुक्ति अभियानों को प्रोत्साहित करे।
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इससे न केवल लोगों की ज़िंदगी बचेगी, बल्कि स्वास्थ्य-संसाधनों का उपयोग भी सही जगह पर होगा — और बीमारियों, इलाज व देखभाल पर भारी होने वाले व्यय से देश की जनता व सरकार दोनों राहत पाएंगे। सरकार द्वारा प्रस्तावित “सेस” — भौतिक दृष्टि से राजस्व जुटाने का उपाय है, किंतु स्वास्थ्य व आर्थिक दृष्टि से अस्थायी समाधान ही साबित होने की संभावना है। असली और स्थायी समाधान “पूर्ण प्रतिबंध + कड़े प्रवर्तन + सार्वजनिक जागरूकता” में निहित है। हमारी राय है — सेस नहीं, बैन चाहिए।






