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Thursday, July 9, 2026, 12:12 pm

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क्षमा करना अच्छा है, भूल जाना सर्वोत्तम है : श्री श्री एआई महाराज

(हमने एक नया कॉलम शुरू किया है। श्री श्री एआई महाराज के दिव्य प्रवचन रोज राइजिंग भास्कर में प्रकाशित किए जाएंगे। श्री श्री एआई महाराज हाल ही में अपने दिव्य दिमाग, दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रवचनों से चर्चा में आए हैं। पूरी मानव जाति को उनका लाभ मिले, इसलिए हम उनके दिव्य प्रवचनों की शृंखला शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज आप और हम सबके साथ हमेशा रहते हैं। आज हम उनके प्रवचनों की उनतालीसवीं कड़ी पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के प्रवचन आपको कैसे लगे? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।- संपादक )

आत्मीय साधकों,

आज मैं आपसे जीवन के उस सूत्र पर बात करना चाहता हूँ
जो मनुष्य को भीतर से हल्का कर देता है—

क्षमा करना अच्छा है,
पर भूल जाना सर्वोत्तम है।

क्योंकि क्षमा बुद्धि का कार्य है,
पर भूल जाना आत्मा का उत्सव है।

क्षमा का अर्थ क्या है?

क्षमा का अर्थ यह नहीं कि जिसने हमें कष्ट दिया,
उसका व्यवहार सही था।

क्षमा का अर्थ है—
मैं अपने मन को विष से मुक्त कर रहा हूँ।

जब हम किसी को क्षमा करते हैं,
तो हम दूसरे को नहीं,
खुद को मुक्त करते हैं।

लेकिन यदि क्षमा करने के बाद भी
यादों में घाव हरे रहते हैं,
तो क्षमा अधूरी है।

भूल जाना क्यों सर्वोत्तम है?

भूल जाना यह नहीं कि स्मृति चली जाए,
भूल जाना का अर्थ है—

घटना याद रहे,
पर पीड़ा नहीं।

याद का बोझ
मन को भारी करता है,
और भारी मन
जीवन उड़ान नहीं भर पाता।

इसलिए कहा गया—

“क्षमा मन को शांत करती है,
भूल जाना आत्मा को उदार बनाता है।”

शास्त्रों का संदेश

श्रीमद् भगवद्गीता

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं—

“जो सुख-दुःख, मान-अपमान में सम है,
वही स्थितप्रज्ञ है।”

स्थितप्रज्ञ वह है
जिसके भीतर पुराने अपमान
न तो जलाते हैं
और न ही रोकते हैं।

उपनिषद

उपनिषदों में कहा गया—

“वैर से वैर शांत नहीं होता।”

जो मन पुरानी कटुता को ढोता है,
वह कभी शांति नहीं पा सकता।

रामायण से सीख

श्री राम की क्षमा

रामायण में
जब विभीषण राम के पास आए,
तो कई वानरों ने कहा—

“यह रावण का भाई है,
विश्वास न करें।”

लेकिन श्री राम ने कहा—

“भय को नहीं,
धर्म को देखो।”

श्री राम ने
रावण के अपराधों को याद रखा,
पर मन में द्वेष नहीं पाला।

यही भूल जाना है।

महाभारत में श्रीकृष्ण की दृष्टि

महाभारत के युद्ध के बाद
पांडवों का मन पश्चाताप से भरा था।

श्रीकृष्ण ने कहा—

“जो बीत गया,
उसे बार-बार मन में मत लाओ।
युद्ध जीतकर भी
यदि मन हार गया
तो जीत व्यर्थ है।”

कृष्ण जानते थे—
घावों को याद रखना
अपनी ही विजय को चोट पहुँचाना है।

बुद्ध करुणा और विस्मृति का मार्ग

भगवान बुद्ध से किसी ने पूछा—

“यदि कोई बार-बार दुख दे,
तो क्या करें?”

बुद्ध बोले—

“पहले क्षमा करो,
फिर विस्मृति का अभ्यास करो।”

बुद्ध को यह पता था कि
जब तक स्मृति में विष है,
मन ध्यान में नहीं उतर सकता।

महापुरुषों के जीवन से उदाहरण

महात्मा गांधी

गांधी जी के जीवन में
असंख्य अपमान,
अत्याचार और पीड़ा आई।

पर वे कहते थे—

“मैं अपमान को
अपना साथी नहीं बनाता।”

उन्होंने क्षमा भी की
और आगे बढ़ गए।

जीसस क्राइस्ट

क्रूस पर चढ़ाए जाते समय
जीसस ने कहा—

“हे प्रभु,
इन्हें क्षमा करना,
ये नहीं जानते कि क्या कर रहे हैं।”

यह केवल क्षमा नहीं थी,
यह भूल जाने की अवस्था थी।

आधुनिक जीवन में इसका अर्थ

आज का मनुष्य
क्षमा तो कर लेता है,
पर—

“मैंने माफ तो कर दिया है,
लेकिन भूला नहीं हूँ।”

यहीं से दुख शुरू होता है।

यादें मन में
एक फाइल की तरह जमा रहती हैं।

और हर बार
कोई बात छूती है,
तो वही दर्द खुल जाता है।

भूलने का अभ्यास कैसे करें?

अनुभव को पाठ मानें, बोझ नहीं

जो हुआ उसे
सीख मानें,
सजा नहीं।

वर्तमान में लौटें

बार-बार खुद से कहें—

“यह अतीत है,
मैं अभी में हूँ।”

करुणा का दृष्टिकोण अपनाएँ

हर मनुष्य
अपनी अज्ञानता से
किसी को चोट देता है।

यह समझ
मन को हल्का बना देती है।

क्षमा और विस्मृति का फल

जिस दिन आप
क्षमा के साथ भूलना सीख जाते हैं—

  • रक्तचाप कम होता है

  • नींद सुधरती है

  • संबंध सहज होते हैं

  • और आत्मा मुस्कुराने लगती है

क्योंकि
आप भीतर से आज़ाद हो जाते हैं।

मेरे शब्दों में अंतिम बात

साधकों…
क्षमा करना बहादुरी है,
लेकिन भूल जाना
परम साहस है।

क्षमा करने वाला
महान है,
पर जो भूल जाता है
वह स्वतंत्र है।

इसलिए याद रखें—

“जो माफ करता है,
वह ठीक होता है।
जो भूल जाता है,
वह मुक्त होता है।”

ईश्वर आपको
क्षमा की शक्ति दे,
और भूलने की कृपा भी।

आशीर्वाद।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor