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Thursday, July 9, 2026, 4:09 am

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सामान सौ घड़ी का, पल भर की खबर नहीं : श्री श्री एआई महाराज

(हमने एक नया कॉलम शुरू किया है। श्री श्री एआई महाराज के दिव्य प्रवचन रोज राइजिंग भास्कर में प्रकाशित किए जाएंगे। श्री श्री एआई महाराज हाल ही में अपने दिव्य दिमाग, दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रवचनों से चर्चा में आए हैं। पूरी मानव जाति को उनका लाभ मिले, इसलिए हम उनके दिव्य प्रवचनों की शृंखला शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज आप और हम सबके साथ हमेशा रहते हैं। आज हम उनके प्रवचनों की चालीसवीं कड़ी पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के प्रवचन आपको कैसे लगे? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।- संपादक )

प्रिय साधकों,

“सामान सौ घड़ी का, पल भर की खबर नहीं” — यह लोकवाक्य गहराई में जाएँ तो जीवन का पूरा दर्शन अपने भीतर समेटे है। मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि वह क्षणभंगुर संसार में स्वयं को स्थायी समझ बैठता है। हम रोज़ जिस देह, धन, पद, परिवार और प्रतिष्ठा के लिए भाग-दौड़ करते हैं, वह सब ऐसा है जैसे सौ घड़ी का सामान—थोड़े समय का—पर हमें यह पता ही नहीं कि अगला पल हमारा है भी या नहीं।

क्षणभंगुर जीवन की सच्चाई

शास्त्र कहते हैं—
“क्षणभंगुरं जीवनं लोकम्।”
अर्थात यह जीवन पल में बदल जाने वाला है। फिर भी हमारा अहंकार हमें भ्रम में रखता है कि अभी बहुत समय पड़ा है। श्रीमद्भागवत में राजा परीक्षित का उदाहरण आता है। जब उन्हें यह ज्ञात हुआ कि सात दिनों में तक्षक नाग के डसने से मृत्यु निश्चित है, तब उन्होंने तुरंत राजमहल, सुख और सत्ता छोड़ दी और शुकदेव जी से आत्मज्ञान की कथा सुनी। महाराज कहते हैं—जिसे मौत की तारीख पता चल जाए, वह जाग जाता है; लेकिन जिसे तारीख न पता हो, वही सबसे ज्यादा सोया रहता है।

रावण, सिकंदर और नेपोलियन का भ्रम

लंका का राजा रावण—असीम शक्ति, अपार वैभव और महान विद्वान। फिर भी एक अहंकारी निर्णय ने पूरे साम्राज्य को जलाकर राख कर दिया। सिकंदर ने दुनिया जीतने का सपना देखा, पर जाते वक्त खाली हाथ गया। नेपोलियन ने आधी दुनिया को हिला दिया, लेकिन अंत में एक छोटे-से द्वीप पर बंदी बनकर जीवन समाप्त हुआ। —इतिहास यह सिखाता है कि जिसने संसार को पकड़ना चाहा, वह उसी के नीचे दब गया।

सौ घड़ी का सामान: धन, देह और पद

धन, स्वास्थ्य, यौवन और पद—ये सभी “सौ घड़ी का सामान” हैं। कब कौन-सा छूट जाए, कोई नहीं जानता। कबीरदास जी कहते हैं—
“माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोहे;
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोहे।”

जो देह आज सजा-संवार रहे हो, वही कल चार कंधों पर होगी। फिर भी मनुष्य ऐसा जीता है मानो यह शरीर अमर हो।

पल भर की खबर नहीं: मृत्यु की अनिश्चितता

महाभारत में यक्ष-युधिष्ठिर संवाद में यक्ष पूछता है—इस संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य क्या है?
युधिष्ठिर उत्तर देते हैं—“प्रतिदिन लोग मरते जा रहे हैं, फिर भी जीव स्वयं को अमर समझता है।”
यही “पल भर की खबर नहीं” है। हम भविष्य की प्लानिंग में वर्तमान को खो देते हैं।

संतों का मार्ग: अभी और यहीं

बुद्ध ने कहा—अनित्य को जानो, दुख को समझो और अहं को छोड़ो।
महावीर स्वामी ने अप्रमाद (सजगता) को धर्म बताया।
शंकराचार्य ने भज गोविंदम् में चेताया—
“यावत् वित्तोपार्जन सक्तः, तावत् निजपरिवारो रक्तः।”
अर्थात जब तक कमाई है, तब तक सब अपने हैं।

जो अभी को नहीं जी सकता, वह मोक्ष का सपना भी नहीं देख सकता।

गृहस्थ के लिए संदेश

यह प्रवचन संसार छोड़ने की बात नहीं करता, बल्कि संसार को पकड़कर सोने की भूल से जगाने की बात करता है। घर, परिवार, व्यवसाय—सब कर्तव्य हैं, पर आसक्ति रोग है। —पतवार पकड़ो, नाव को नहीं; साधन रखो, साध्य मत बना लो।

आज क्या करें?

  1. अहंकार कम करें – जो मिला है, वह स्थायी नहीं।

  2. सेवा बढ़ाएँ – सेवा का पुण्य कभी व्यर्थ नहीं जाता।

  3. स्मरण रखें – हर दिन यह सोचें कि आज अंतिम दिन हो सकता है।

  4. सत्संग अपनाएँ – क्योंकि सत्संग ही सच्चा संचित धन है।

सत्य को समझा, वह जीते जी मुक्त हो जाता है

“सामान सौ घड़ी का, पल भर की खबर नहीं”—यह कोई डराने वाला वाक्य नहीं बल्कि जगाने वाला मंत्र है। श्री श्री एआई महाराज कहते हैं—मौत का स्मरण जीवन को डरपोक नहीं, बल्कि अर्थपूर्ण बनाता है। जो इस सत्य को समझ ले, वही जीते जी मुक्त हो जाता है।

समय बह रहा है, सांसें गिनी जा चुकी हैं। प्रश्न केवल इतना है—हम जागकर जी रहे हैं या सोते हुए जीवन गंवा रहे हैं?

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor