लेखक : शिवसिंह
9784092381
ज्ञानेंद्रियों और कर्मेंद्रियों के अतिशय अथवा दुरुपयोग से शारीरिक ऊर्जा का अपव्यय होता है। अतः आसन, प्राणायाम के साथ कुछ बंधों के प्रयोग से योगाभ्यास किया जाए तो उसका प्रभाव बहुत अधिक बढ़ जाता है। बंध का अर्थ होता है- “बांधना”, रोकना या कसना। इसे शरीर के निश्चित अंगों को बड़ी सतर्कता से संतुलित किया जाता है। डाॅ.चंचलमल चौरासिया के अनुसार सामान्यतः योग में मुख्य बंध तीन होते हैं और चौथा इन तीनों का योग होता है।
जालंधर बंध
उड्डियान बंध
मूल बंध
महा बंध
(1) जालंधर बंध
जालंधर बंध- ठोड़ी को सीने के ऊपर कंठ से सटाने वाली शरीर की अवस्था को जालंधर बंध कहते हैं। इससे गर्दन में गुजरने वाली नाड़ियाँ नियंत्रित होती हैं और सुषुम्ना सरल चलने लगती है। कुम्भक कर जालंधर लगाने से कुम्भक का समय बढ़ाया जा सकता है। जालंधर बंध के समय रेचक और पूरक नहीं करनी चाहिए। जालंधर बंध व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक रूप से सामर्थ्यदायक होता है। इससे मानसिक शिथिलिकरण होता है और चित्त की एकाग्रता बढ़ती है। रक्तचाप और श्वसन नियंत्रित होता है। थायराइड एवं पेराथायराइड ग्रंथियां बराबर कार्य करने लगती हैं।
(2) उड्डियान बंध
उड्डियान बंध- श्वास को बाहर निकालकर पेट को कमर की तरफ सिकोड़ते, बाह्य कुम्भक करने की स्थिति को उड्डियान बंध कहते हैं। यह बंध खाली पेट ही करना चाहिए। इसे क्रिया से आमाशय का सम्पूर्ण भाग संत्रप्ति की भाँति निछोड़ा जाता है। इससे जमा अथवा रूका हुआ रक्त पुनः प्रवाहित होने लगता है। फलतः पेट के सभी अंग सक्रिय होने लगते हैं।
इस बंध से नाभि, कैस्ट्रल, पेडीस्टाल एवं पेनक्रियाज ग्रंथियाँ बराबर कार्य करने लगती हैं।
(3) मूल बंध
मूल बंध- मल द्वार को ऊपर की तरफ खींचकर संकोचित करने की शारीरिक स्थिति को मूल बंध कहते हैं। इस बंध से अजीर्ण और प्रजनन अंगों संबंधी रोगों में लाभ होता है। मल-पूरुष के रोगों में भी लाभ होता है। यह भूख को बढ़ाता है।
(4) महाबंध
औमहाबंध- जब तीनों बंध एक साथ किए जाते हैं, शरीर की उस अवस्था को महाबंध कहते हैं। इसे पहले जालंधर बंध के साथ उड्डियान बंध लगाना चाहिए, उसके पश्चात् मूल बंध लगाना चाहिए। श्वास की जितना स्वाभाविक गति से रेचक सके, रेचकना चाहिए। फिर पहले मूल बंध उसके पश्चात् उड्डियान बंध और अंत में जालंधर बंध से मुक्त होना चाहिए। उसी से अनेक आवृत्तियां की जा सकती है। महाबंध से तीनों बंधों का लाभ एक साथ मिल जाता है।
बहुत से लोगों को जलवायु विरुद्ध प्राप्त होती है। उसका कारण सही प्राण तत्व की अधिक उपलब्धता होती है। इसके विपरीत जहां प्राण तत्व का अभाव होता है, वहां रोग होने की सम्भावना रहती है। जिस वायु में प्राण ज्यादा घुला होता है, उसे प्राण वायु भी कह दिया जाता है। प्राण ऊर्जा को व्यक्ति अपने अन्दर प्रचुर मात्रा में भर सकता है तथा जिसके प्रभाव से स्वस्थम्, दीर्घ जीवन, चैतन्यता, स्फूर्ति, कार्य करने की क्षमता, सहन करने की शक्ति, मानसिक विश्राम आदि नाना प्रकार की शक्तियां प्राप्त की जा सकती है और विचारों में भी शांति है।
Author: Dilip Purohit
Group Editor









