लेखक : शिवसिंह
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प्राणायाम में श्वास अंदर खींचने की प्रक्रिया को पूरक, श्वास बाहर निकालने की क्रिया को रेचक तथा श्वास को अंदर अथवा बाहर रोकने की अवस्था को कुंभक कहते हैं। प्राणायाम का मूल सिद्धान्त है श्वास धीरे परन्तु जितना गहरा लम्बा लिया जा सके ले। श्वास लेते समय पेट पूरा फूल जाना चाहिए। श्वास को जितना ज्यादा देर रोक सकें, अंदर रोकने का प्रयास करें, ताकि श्वसन द्वारा शरीर में प्रविष्ट प्राण वायु अपना कार्य वापस बाहर निकलने के पूर्व पूर्ण कर सके अर्थात् ऑक्सीजन का पूरा उपयोग हो सके। श्वास को धीरे-धीरे निष्काषित करें। रेचक का समय पूरक से जितना ज्यादा होगा उतना प्राणायाम प्रभावकारी होता है। कुछ योगियों की ऐसी मान्यता है कि जितना ज्यादा श्वास को अंदर रोक रखा जाता है उतनी अधिक शारीरिक शक्ति प्राप्त होती है, परन्तु यदि दिमाग को शांत करना हो तो श्वास को बाहर अधिक रोकने का अभ्यास करना चाहिए।
नाड़ी शुद्धि प्राणायाम
नाड़ी शुद्धि होने के बाद ही प्राणायाम श्रेष्ठ ढंग से किया जा सकता है। नाड़ी शुद्धि के लिए जो प्राणायाम किया जाता है, उसे अनुलोम विलोम प्राणायाम कहा जाता है। जन साधारण को अनुलोम विलोम प्राणायाम से ही प्राणायाम का आरम्भ करना चाहिए। इसमें नासाग्र के किसी एक भाग से श्वास अंदर लेकर दूसरे छिद्र से बाहर निकाला जाता है। फिर जिस छिद्र से श्वास बाहर निकाला जाता है, उस नासाग्र से पूरक करके दूसरे छिद्र से रेचक किया जाता है। यह एक चक्र होता है। ऐसे अनेकों आवर्तनों का अभ्यास किया जा सकता है। श्वास जितना गहरा और धीमी होती है, उतना प्राणायाम अच्छा होता है। जितना कुम्भक कर सकें उतना अभ्यास करें। पूरक से रेचक का समय जितना ज्यादा रख सकें उतना अच्छा और कुम्भक का समय भी कम से कम पूरक का दुगुना होना चाहिए, तभी नाड़ी शुद्धि सही ढंग से होती है।
कपाल भाति प्राणायाम
कपाल का मतलब खोपड़ी और भाति अर्थात प्रकाशित करना। इसमें शीघ्रता से पूरक और रेचक किया जाता है। कुम्भक नहीं। यह व्यायाम अत्यन्त अलन्त परिश्रम पूर्वक करना चाहिये। इससे शरीर की सभी कोशिकाएँ, ज्ञान तन्तु और स्नायु जोर से कम्पित होते हैं।कपाल भाति प्राणायाम से खोपड़ी, श्वसन तंत्र और नासिका मार्ग स्वच्छ होता है। दमा दूर होता है। बड़ी मात्रा में कार्बनडाई आक्साइड के निष्कासन से रक्त शुद्ध होता है। हृदय की कार्य क्षमता सुधरती है, श्वसन तंत्र, पाचन तंत्र और रक्त परिभ्रमण तंत्र बराबर कार्य करने लगते हैं।
सूर्य भेदी प्राणायाम
इसमें दाहिने नथुने से श्वास ली जाती है और बाएँ नथुने से श्वास निकाली जाती है। इससे शरीर में गर्मी
पतंजलि योग और स्वास्थ्य
बढ़ती है, सक्रियता आती है। सर्दी सम्बन्धी रोगों और सर्दी के मौसम में यह प्राणायाम विशेष प्रभावकारी होता है।
चन्द्र भेदी प्राणायाम
इसमें बाएँ नथुने से पूरक और दाहिने नथुने से रेचक किया जाता है। गर्मी और पित्त सम्बन्धी रोगों तथा गर्मी के मौसम में यह प्राणायाम बहुत लाभकारी होता है। इससे शरीर की थकान दूर होती है। निद्रा अच्छी आती है। शरीर में शीतलता बढ़ती है, बुखार में शीघ्र आराम मिलता है।
भ्रामरी प्राणायाम
ध्यानावस्था में बैठो दोनों नेत्र बन्द कर दोनों हाथों की तर्जनी से दोनों कानों के छिद्र बन्द कर दें। होंठों को आपस में मिला दें। फिर मन ही मन ओम् का गुंजार करें। दोनों नथुनों से पूरक और रेचक करने वाले ऐसे प्राणायाम को भ्रामरी प्राणायाम कहते हैं।
इस प्राणायाम से मानसिक तनाव, चिंता, क्रोध, निराशा में कमी आती है। स्वर में मधुरता बढ़ती है तथा श्वसन और गले के रोग में लाभ होता है, स्मरण शक्ति ठीक होती है।
Author: Dilip Purohit
Group Editor









