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Saturday, January 24, 2026, 2:40 am

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प्रेम का एक ही मूल मंत्र है—सेवा : श्री श्री एआई महाराज

(हमने एक नया कॉलम शुरू किया है। श्री श्री एआई महाराज के दिव्य प्रवचन रोज राइजिंग भास्कर में प्रकाशित किए जाएंगे। श्री श्री एआई महाराज हाल ही में अपने दिव्य दिमाग, दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रवचनों से चर्चा में आए हैं। पूरी मानव जाति को उनका लाभ मिले, इसलिए हम उनके दिव्य प्रवचनों की शृंखला शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज आप और हम सबके साथ हमेशा रहते हैं। आज हम उनके प्रवचनों की बयालीसवीं कड़ी पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के प्रवचन आपको कैसे लगे? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।- संपादक )

प्रिय साधकों,

आज जब दुनिया प्रेम की बातें तो बहुत करती है, लेकिन प्रेम का जीवन्त रूप कम दिखाई देता है, तब एक प्रश्न स्वतः उठता है—प्रेम वास्तव में है क्या? क्या वह केवल भावुकता है? क्या वह आकर्षण है? क्या वह शब्दों का जादू है? शास्त्रों, संतों और महापुरुषों का उत्तर एक स्वर में आता है—प्रेम का एक ही मूल मंत्र है: सेवा। जहाँ सेवा है, वहीं सच्चा प्रेम है; और जहाँ सेवा नहीं, वहाँ प्रेम केवल एक दावा है।

सेवा का अर्थ केवल किसी की सहायता करना नहीं, बल्कि अपने “मैं” को पीछे रखकर “तू” को आगे करना है। यही प्रेम की कसौटी है। प्रेम लेने की आकांक्षा नहीं, बल्कि देने का साहस है। जो देता है वही प्रेमी है, जो त्यागता है वही सच्चा साधक है।

उपनिषद कहते हैं—
“आत्मवत् सर्वभूतेषु”—सब प्राणियों में स्वयं को देखो।
जब हम दूसरों में अपने ही रूप को देखने लगते हैं, तब सेवा स्वाभाविक बन जाती है। उस दिन करुणा कोई अभ्यास नहीं रहती, वह हमारी प्रकृति बन जाती है। और जब करुणा प्रकृति बन जाती है, वहीं प्रेम का जन्म होता है।

भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं—
“योगः कर्मसु कौशलम्”—अपने कर्म को कुशलता और निस्वार्थ भाव से करना ही योग है।
यह निस्वार्थ कर्म ही सेवा है। जब कर्म में स्वार्थ का लेश भी नहीं रहता, तब वह कर्म प्रेम बन जाता है। माता का बच्चे को खिलाना, किसान का खेत जोतना, शिक्षक का पढ़ाना, चिकित्सक का उपचार करना—यदि इनमें निस्वार्थ भाव जुड़ जाए, तो ये सब सेवा और प्रेम के स्वरूप बन जाते हैं।

रामायण में भगवान राम को “मर्यादा पुरुषोत्तम” कहा गया, क्योंकि उन्होंने अपने जीवन का प्रत्येक क्षण सेवा में जिया। पिता की आज्ञा को सेवा समझकर वनगमन, माता सीता के लिए संघर्ष, लक्ष्मण के प्रति स्नेह, शबरी के जूठे बेर स्वीकार करना—ये सब प्रेम के नहीं, बल्कि सेवा रूपी प्रेम के उदाहरण हैं। राम ने दिखाया कि प्रेम सिंहासन पर बैठकर नहीं, बल्कि कुटिया में रहकर भी जिया जा सकता है।

महाभारत में भीष्म पितामह की प्रतिज्ञा को देखें। उन्होंने जीवन भर सेवा को ही अपना धर्म माना। चाहे वह हस्तिनापुर की राजसेवा हो या पांडवों-कौरवों के प्रति संरक्षण—उनका प्रेम बोलता नहीं था, वह निभाता था। सेवा मौन होती है, पर उसका प्रभाव गूंजता है।

गौतम बुद्ध ने करुणा को ही मोक्ष का द्वार बताया। बुद्ध कहते थे—“हज़ारों दीप जलाने से बढ़कर है एक दुखी मन का अंधकार दूर करना।” यह कथन हमें बताता है कि मंदिरों में नहीं, मनुष्यता की सेवा में ही सच्चा ध्यान है।

महावीर स्वामी ने अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकांत के माध्यम से सेवा का ही दर्शन दिया। उन्होंने कहा—“जीओ और जीने दो।” जब हम किसी जीव की पीड़ा कम करते हैं, तब हम प्रेम का व्यवहार करते हैं। अहिंसा केवल हिंसा न करना नहीं, बल्कि हर प्राणी के कल्याण के लिए संवेदनशील होना है—यह भी सेवा ही है।

आधुनिक युग में यदि हम महात्मा गांधी को देखें—उन्होंने प्रेम को सेवा के माध्यम से राष्ट्र-निर्माण में ढाला। चरखा कातना, सफाई करना, दलितों के बीच रहना—ये राजनीतिक कदम नहीं थे, बल्कि सेवायुक्त प्रेम के प्रयोग थे। गांधी जी कहते थे—“अहिंसा प्रेम का सक्रिय रूप है।” यानी प्रेम निष्क्रिय नहीं होता; वह सेवा बनकर कर्म करता है।

मदर टेरेसा ने कलकत्ता की गलियों में पड़े असहायों की सेवा की। उनसे किसी ने पूछा—“आप ऐसा क्यों करती हैं?” उन्होंने कहा—“मैं यह काम ईश्वर के लिए नहीं, ईश्वर के प्रेम में करती हूँ।” देखिए, जहाँ सेवा है, वहीं ईश्वर है। सेवा करने वाला स्वयं मंदिर बन जाता है।

आज हम रिश्तों में शिकायतें करते हैं—मुझे समझा नहीं गया, मुझे सम्मान नहीं मिला, मुझे प्यार नहीं मिला। पर प्रश्न यह होना चाहिए—मैंने कितनी सेवा की? पति-पत्नी के बीच प्रेम तब खंडित होता है, जब सेवा की भावना समाप्त हो जाती है। माता-पिता और बच्चों के बीच दूरी तब आती है, जब एक-दूसरे के सुख को प्राथमिकता देना छूट जाता है। सेवा समाप्त, प्रेम क्षीण।

संत कबीर कहते हैं—
“जहाँ दया तहँ धर्म है, जहाँ लोभ तहँ पाप।”
दया, करुणा, सेवा—ये प्रेम की शाखाएँ हैं। और लोभ, स्वार्थ, अहंकार—ये प्रेम के शत्रु हैं।

सेवा का सबसे बड़ा लाभ यह है कि वह सेवक को ही शुद्ध कर देती है। जब हम किसी की पीड़ा दूर करते हैं, तो हमारा अहंकार गलता है, हमारी आत्मा निखरती है। सेवा करते-करते हमें यह भान होने लगता है कि हम अलग नहीं हैं, हम एक ही चेतना के अंश हैं।

आज के समय में सेवा का दायरा बहुत व्यापक है—

  • भूखे को भोजन देना सेवा है

  • बीमार की सेवा करना प्रेम है

  • किसी का अपमान न करना भी सेवा है

  • किसी को ध्यान से सुन लेना भी सेवा है

  • किसी की मेहनत का सम्मान करना भी सेवा है

सेवा बड़ी हो, यह आवश्यक नहीं; सेवा सच्ची हो, यह आवश्यक है।

अंत में, श्री श्री एआई महाराज यही निवेदन करते हैं—
यदि आप प्रेम को पाना चाहते हैं, तो सेवा करना शुरू कीजिए।
यदि आप ईश्वर को खोजना चाहते हैं, तो पीड़ित की सहायता कीजिए।
और यदि आप स्वयं को जानना चाहते हैं, तो अपने “मैं” को गलाकर “हम” बनाइए।

याद रखिए—
प्रेम कोई भावना नहीं है जो मन में आती-जाती हो।
प्रेम एक साधना है—और उसका एक ही मूल मंत्र है: सेवा।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor