लेखक : शिवसिंह
9784092381
योग क्या है ?
योग शब्द ‘युज्’ धातु से बना है। जिसका शाब्दिक अर्थ है जुड़ना, मिलाना। जब व्यक्ति अपनी आत्मा से जुड़ जाता है तथा उससे साक्षात्कार कर लेता है तो वह स्वयं को नर से नारायण और आत्मा को परमात्मा बना देता है। योग सुखी जीवन जीने की सरल एवं प्रभावशाली श्रेष्ठ विधि है। जिसके द्वारा मनुष्य का शरीर पूर्ण स्वस्थ, इन्द्रियों में अपार शक्ति, मन में अपूर्व आनन्द, बुद्धि में सम्यक् ज्ञान एवं भावों में कषायों की मंदता और सजगता आती है, वही सच्चा योग होता है। योग साधना से मनुष्य जन्म-मृत्यु के बन्धनों से मुक्त हो सकता है। योग द्वारा शरीर से रोग, इन्द्रियों की थकावट और कमजोरी, मन से चिन्ता, भय, तनाव, आवेगों से अपने आपको मुक्त रखा जा सकता है।
वर्तमान में प्रचलित योग का मुख्य आधार पतंजलि द्वारा निर्धारित अष्टांग योग साधना है। पतंजलि ने यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार ध्यान और समाधि के द्वारा योग के आठ अंगों का क्रमानुसार निर्देश किया है। जिसकी सम्यक् विधि से क्रियान्विति करने पर मनुष्य अपने परम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। योग की सारी साधना व्यक्ति के स्वयं के सम्यक् पुरुषार्थ पर ही निर्भर करती है। जो मानव की सम्यक् जीवन शैली का ही रूप होता है।
योग शरीर को विशेष प्रकार से मोड़ना अथवा घुमाना मात्र व्यायाम ही नहीं है, अपितु मन, वचन और काया का सम्यक् संगम, तालमेल और सन्तुलन ही सच्चा योग होता है। वास्तव में योग सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन और सम्यक् आचरण की उत्कृष्ट साधना है। जिससे शरीर, मन और आत्मा ताल से ताल मिलाकर कार्य करते हैं। तीनों के विकारों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है तथा तीनों निर्विकारी बनते हैं। यही मनुष्य जीवन का ध्येय होता है।
योग का वर्तमान स्वरूप
परन्तु आजकल विश्व भर में प्रचलित एवं प्रसारित योगाभ्यास प्रायः आसन और प्राणायाम तक सीमित होता जा रहा है। यम, नियम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि के अभाव में नर से नारायण और आत्मा को परमात्मा बनाने वाली योग साधना मात्र शरीर का व्यायाम बनकर रह गया है। यह योग का अवमूल्यन है, अष्टांग योग की क्रमिक साधना ही सच्चा योग है।
ठीक इसी प्रकार आज ध्यान भी एक फ़ैशन का रूप लेता जा रहा है। शारीरिक रोगों के उपचार तक सीमित होता जा रहा है। बिना यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार और धारणा के ध्यान साधना स्थायी रूप से फ़लीभूत नहीं हो सकती। आज ध्यान कराया जाता है, ध्यान किया जाता है, परन्तु वास्तव में बहुत कम व्यक्तियों के ही ध्यान होता है। ध्यान में सच्चे आनन्द और शान्ति की अनुभूति होती है। आज ध्यान के नाम से जितनी भी पद्धतियाँ प्रचलित हैं, चाहे वे किसी नाम से हों, ध्यान द्वारा एक आत्मा की अनन्त शक्तियों का अनुभव करने वाला, शरीर और आत्मा का भेदज्ञान कराने वाला ध्यान, ध्यानी को सांसारिक भौतिक उपलब्धियों में कैसे उलझा सकता है? इसका ध्यानी की उपलब्धियों के लच्छे-लम्बे अनुभव करने वालों को स्पष्टीकरण करना चाहिए। आज ध्यानियों के जीवन में समभाव की प्राप्ति और कषायों की मंदता क्यों नहीं बढ़ रही है? उनकी सहनशीलता क्यों घट रही है? साधारण से वियोग और प्रतिकूलताओं में वे अपना सन्तुलन क्यों गँवा कर विचलित हो जाते हैं? उन्हें प्रसिद्धि की भूख क्यों परेशान कर रही है? उनके जीवन में मादकवृत्ति क्यों और कैसे पनप रही है?
ध्यान कोई पोषक नहीं है कि चाहे पहन लें और जब चाहे उतार कर फेंक दें। ध्यान का मापदण्ड होता है— कषायों की मंदता, कामनाओं एवं आत्म-विकारों की कमी, आत्मा विकास में उत्तरोत्तर अभिवृद्धि। जिस प्रकार खेत में गेहूँ के लिये की जाती है, घास के लिये नहीं। घास तो गेहूँ के साथ स्वतः उपलब्ध हो जाती है। जिस ध्यान से व्यक्ति अन्तर्मुखी न बने वह ध्यान अधूरा ही होता है। रोगों में राहत को ही ध्यान की परिपूर्णता मानना बुद्धिमत्ता पूर्ण नहीं कहा जा सकता। ऐसा प्रयास मात्र घास के लिए खेती करने के समान अपने समय, श्रम और क्षमताओं के अवमूल्यन का ही प्रतीक होता है। ध्यानी अप्रमादी अर्थात् अपने जीवन मूल्यों के प्रति शत प्रतिशत सचेत और जागृत होता है। जिस प्रकार अन्धकार और प्रकाश साथ-साथ नहीं रह सकता, ठीक उसी प्रकार प्रमाद (अजगरता) दूर हुए बिना सच्चा ध्यानी नहीं बन जा सकता है।
Author: Dilip Purohit
Group Editor









