लेखक : शिव सिंह
9784092381
इस यम और नियम के पालन से व्यक्ति अपनी क्षमताओं से परिचित हो जाता है। जीवन का सही उद्देश्य समझ में आ जाता है। उसकी प्राथमिकताएँ बदल जाती हैं। वह अपना आत्मोलन नहीं करता। उसका मनोबल और आत्मबल बढ़ जाता है। रोग प्रतिरोधक क्षमता और सहनशक्ति बढ़ जाती है।
इस यम और नियम का अपनी क्षमतानुसार पालनकरने के पश्चात् ही पतंजलि ने अष्टांग योग में आसन को रखा। आसन शरीर की वह स्थिति है, जिससे शरीर बिना किसी बेचैनी के स्थिर रह सके और मन को सुख शांति की प्राप्ति हो। आसन करने से माँस पेशियों में खिंचाव होता है। जिससे उनका विकास होता है। सुस्ती दूर होती है। शरीर में हल्कापन आता है। नाड़ियों की शुद्धि, स्वास्थ्य की वृद्धि एवं तन मन में सक्रियता आती है।
आसन व्यायाम का ही वैज्ञानिक रूप होता है। आसनों से शरीर के ऊर्जा केन्द्र जागृत होते हैं और शरीर में आवश्यक हारमोन्स बनाने वाली अंतःस्रावी प्रक्रियाएँ बराबर कार्य करने लगती हैं। आसनों के अलावा प्रायः अन्य कोई ऐसा सरल व्यायाम नहीं होता जिससे शरीर के सभी अंगों की व्यवस्थित कसरत हो सके।
योग साधकों के लिए अन्य व्यायामों की अपेक्षा आसन ही अधिक उपयोगी होते हैं। आसन में, अन्य पहलवानों जैसे, कठिन व्यायामों जितनी ऊर्जा खर्च नहीं होती, जिसकी पूर्ति के लिए अधिक मात्रा में पौष्टिक आहार की आवश्यकता होती है। राजसिक एवं पौष्टिक आहार से इन्द्रियाँ उत्तेजित होती हैं, वृत्तियाँ राजसिक और तामसिक बनती हैं। परन्तु योगी के लिए अल्प सीमित और सात्त्विक आहार लेने का विधान होता है। अतः योगियों के लिए आसन ही श्रेष्ठतम व्यायाम है।
नियमित करणीय आसन :
1 वज्रासन 2 गौ दुहासन 3 ताडासन
4 शवासन
सही आसनों का चयन आवश्यक
जो अंग कम कार्य करते हैं अथवा अधिक निर्बल होते हैं, उन्हें सचेत एवं पुष्ट करने की विशेष आवश्यकता होती है। अतः आसन का चयन करते समय इस बात का विवेक रखा जावे कि अधिक कार्य कर चुके शरीर के हिस्साँ को आराम दिया जाए अथवा अधिक श्रम की गर्मी से शरीर का वह भाग विकृत हो जावेगा। साधे ही जो भाग कम कार्य करते हैं उनसे श्रम कराया जावे, अन्यथा शरीर का वह भाग निष्क्रिय, चिकना, निकम्मा, क्रियाहीन और कमज़ोर होकर रोगों का घर बन जावेगा।
जिन आसनों में शरीर को अधिक मोड़ने की आवश्यकता होती है, वे लचीली शारीरिक संरचना वाले लोगों के लिए ही उपयुक्त हो सकते हैं, परन्तु जिनकी नाड़ियाँ कड़ी एवं कमज़ोर होती हैं, उनके लिए दूसरे आसन ज़्यादा हितकर होते हैं।
आसन को प्रभावी बनाने वाले तत्त्वः-
कोई भी आसन झटके से नहीं करना चाहिए। किसी भी आसन को करने के पश्चात् उसके विपरीत दिशा में शरीर पर तनाव देने वाले आसन को भी अवश्य करना चाहिए। प्रत्येक आसन के पश्चात् यथा संभव शवासन अवश्य करना चाहिए।
आसनों के लिए प्रातःकाल का समय ही सर्वश्रेष्ठ काल है। आसन करते समय शरीर पर तंग कपड़े नहीं होने चाहिये, जिससे आसन करते समय शरीर से निकलने वाली गन्दी वायु के बाहर आने और उसके स्थान पर नवीन स्वच्छ वायु के स्वरों में बाधा उपस्थित होती है। आसन ऐसे स्थान पर करने चाहियें जहाँ वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा अधिक हो।





