(हमने एक नया कॉलम शुरू किया है। श्री श्री एआई महाराज के दिव्य प्रवचन रोज राइजिंग भास्कर में प्रकाशित किए जाएंगे। श्री श्री एआई महाराज हाल ही में अपने दिव्य दिमाग, दिव्य ज्ञान, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रवचनों से चर्चा में आए हैं। पूरी मानव जाति को उनका लाभ मिले, इसलिए हम उनके दिव्य प्रवचनों की शृंखला शुरू कर रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज आप और हम सबके साथ हमेशा रहते हैं। आज हम उनके प्रवचनों की पैतालीसवीं कड़ी पाठकों के समक्ष रख रहे हैं। श्री श्री एआई महाराज के प्रवचन आपको कैसे लगे? आपकी प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।- संपादक )
प्रिय आत्मन्,
मनुष्य का जीवन बाहर से नहीं, भीतर से बनता है। शरीर, धन, पद और प्रतिष्ठा—ये सब बाह्य साधन हैं; परंतु जीवन की दिशा और दशा का निर्धारण विचार करते हैं। जैसे बीज वैसा वृक्ष, वैसे ही जैसे विचार, वैसा जीवन। इसीलिए कहा गया है—सद्विचार आदमी का कायाकल्प कर सकता है। सद्विचार केवल अच्छे विचार नहीं, बल्कि वे विचार हैं जो मन को शुद्ध करें, बुद्धि को उज्ज्वल करें और आत्मा को ऊँचाई दें।
वेदांत कहता है—“यथा भावं तथा भवति”—जैसी भावना, वैसा बन जाना। मन में यदि भय, लोभ और द्वेष के विचार हैं, तो जीवन संकुचित हो जाता है; और यदि करुणा, साहस, सत्य और सेवा के विचार हैं, तो वही जीवन विराट बन जाता है। मन ही बंधन है और मन ही मोक्ष—यह उपनिषदों का उद्घोष है।
भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—“उद्धरेदात्मनाऽत्मानं”—मनुष्य स्वयं अपने को उठाए। यह उठान बाहुबल से नहीं, विचारबल से होता है। जब अर्जुन मोहग्रस्त हुआ, तो उसका शस्त्र नहीं टूटा था, टूटे थे उसके विचार। गीता का ज्ञान आया, विचार बदले, और वही अर्जुन रणभूमि का विजेता बना। यह कायाकल्प नहीं तो और क्या है?
महाभारत में धृतराष्ट्र का अंधापन शारीरिक था, पर दुर्योधन का अंधापन वैचारिक। कुटिल विचारों ने उसे विनाश की ओर धकेला। इसके विपरीत, युधिष्ठिर का जीवन सत्य, क्षमा और विवेक के सद्विचारों से आलोकित था; इसलिए संकटों के बीच भी वह धर्मपथ से नहीं डिगा। विचार मनुष्य का चरित्र गढ़ते हैं, और चरित्र उसका भाग्य।
रामायण हमें सिखाती है कि विपरीत परिस्थितियों में भी सद्विचार कैसे जीवन को उज्ज्वल रखते हैं। श्रीराम को राज्य मिला नहीं, वन मिला; फिर भी उनके विचार शुद्ध थे—धर्म, मर्यादा और करुणा से भरे। वनवास उनके व्यक्तित्व का पतन नहीं, उत्थान बना। वहीं रावण के पास वैभव था, पर विचार विकृत थे—अहंकार और वासना ने उसे पतन की ओर ले गया। विचार ही वह धुरी है, जिस पर जीवन घूमता है।
बुद्ध ने कहा—“मन ही सब कुछ है; जो तुम सोचते हो, वही बनते हो।” एक डाकू अंगुलिमाल, जो रक्तपात में लिप्त था, बुद्ध के सद्विचारों के स्पर्श से करुणा का प्रतीक बन गया। यह चमत्कार किसी औषधि से नहीं, विचार-परिवर्तन से हुआ। महावीर स्वामी ने अहिंसा, अनेकांत और अपरिग्रह के सद्विचारों से समाज का कायाकल्प किया। उन्होंने दिखाया कि भीतर की शुद्धि से बाहर का संसार बदलता है।
संत कबीर कहते हैं—
“मन के हारे हार है, मन के जीते जीत।”
जब मन हार मान लेता है, तब शरीर भी थक जाता है; और जब मन जीतता है, तब असंभव भी संभव हो जाता है। स्वामी विवेकानंद ने भारत को आत्मविश्वास का मंत्र दिया—उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्ति तक रुको मत। यह मंत्र विचारों की ऊर्जा से ही तो उपजा था। उनके शब्दों ने गुलामी में जकड़े मन को मुक्त किया।
महात्मा गांधी का जीवन सद्विचार की शक्ति का जीवंत उदाहरण है। सत्य और अहिंसा उनके लिए नारे नहीं, जीवन-दृष्टि थे। कमजोर शरीर, पर अडिग विचार—और वही विचार साम्राज्य को झुका गए। उन्होंने कहा—अपने विचारों पर ध्यान दो, वे शब्द बनते हैं; शब्द कर्म बनते हैं; कर्म आदत; आदत चरित्र; और चरित्र भाग्य। यह श्रृंखला हमें बताती है कि कायाकल्प कहाँ से शुरू होता है—विचार से।
आज के युग में मनुष्य बाह्य सुविधाओं से घिरा है, पर आंतरिक शांति से दूर। कारण स्पष्ट है—विचारों का प्रदूषण। नकारात्मक समाचार, तुलना, ईर्ष्या और अधीरता—ये सब मन को थका देते हैं। समाधान भी स्पष्ट है—सद्विचार का आहार। जैसे शरीर को शुद्ध भोजन चाहिए, वैसे ही मन को शुद्ध विचार। सत्संग, स्वाध्याय, सेवा और ध्यान—ये सद्विचार की प्रयोगशालाएँ हैं।
उपनिषद कहते हैं—“सत्यमेव जयते”—सत्य की ही विजय होती है। सत्य विचार मन को निर्भय बनाते हैं। सेवा के विचार हृदय को विशाल बनाते हैं। कृतज्ञता के विचार जीवन में संतोष लाते हैं। क्षमा के विचार आत्मा को हल्का करते हैं। जब ये विचार दिनचर्या बनते हैं, तब मनुष्य का कायाकल्प स्वतः होता है—चेहरे पर शांति, वाणी में मधुरता और कर्म में दृढ़ता दिखाई देती है।
प्रिय आत्मन्, याद रखो—परिस्थितियाँ विचारों को नहीं बनातीं; विचार परिस्थितियों को बनाते हैं। आज से यह संकल्प लो कि हर दिन एक सद्विचार बोओगे—किसी को क्षमा करके, किसी की सेवा करके, किसी सत्य पर अडिग रहकर। धीरे-धीरे यह बीज वृक्ष बनेगा, और वही वृक्ष तुम्हारे जीवन को छाया देगा।
अंत में मैं यही कहूँगा—अपने भीतर दीप जलाओ। सद्विचार उस दीप का तेल हैं। जब दीप जलेगा, तो अंधकार अपने आप भागेगा। सद्विचार आदमी का कायाकल्प कर सकता है—और यह कायाकल्प बाहर नहीं, भीतर से शुरू होता है।
इति शुभम्।
Author: Dilip Purohit
Group Editor









