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Thursday, July 9, 2026, 5:07 am

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हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट का जज बतौर आम आरोपी न्यायिक प्रणाली से गुजरे तो पता चले भारतीय संविधान कितना क्रूर है…आरोपी की नजर से भारतीय न्याय व्यवस्था पर एक जरूरी सवाल

जांच एजेंसियों की विफलता की सजा आरोपी क्यों भुगते? कोर्ट फैसला ना कर पाए तो आरोपी जेल में क्याें रहे? जेल सजा के लिए होती है, जांच के लिए नहीं— क्या विचाराधीन आरोपी को जेल में रखना न्याय है? अंडरट्रायल के लिए जेल नहीं, नागरिक आवास हो। जेल का अर्थ सजा ही होती है, जब कोर्ट ने फैसला ही नहीं किया तो सजा मानकर जेल में रखना कहां तक उचित है? भारतीय संविधान बनाने वालों ने अंग्रेजों के कानूनों को आत्मसात कर लिया, इसमें भारतीय न्यायिक दिमाग लगाया ही नहीं गया, जिस बाबा साहेब अंबेडकर का महिमा मंडन किया जाता है, उन्होंने ऐसा संविधान बनाया जो मौलिक नहीं है? कुछ भाग यहां से लिया, कुछ भाग वहां से लिया, कुछ भाग कहां से लिया और कुछ अपनी पेल दी…और बन गया भारतीय संविधान…हमारा यह मानना है कि अंडरट्रायल आरोपियों के लिए अलग से होल्डिंग होम हो। उनके साथ मानवीय व्यवहार हों। कैदियों जैसा व्यवहार नहीं हों..जब तक दोष सिद्ध ना हो जाए और कोर्ट उसे दोषी मान ना ले तब तक जेल में बंद नहीं रखा जाए…जेल में बंद होने के बाद वह कोर्ट से बरी भी हो जाए तो उसके माथे पर जीवन भर अपराधबोध का धब्बा लग जाता है….भारत की जेलों में लगभग 4.3 लाख विचाराधीन कैदी बंद हैं। इन पर अभी दोष सिद्ध नहीं हुआ है, लेकिन वे न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने तक जेल में हैं…। इन जेल में बंद आरोपियों की पीड़ा का बोध ना उन जजों को है जो कानून का हथोड़ा लेकर जजों के आसन पर बैठकर धौंस जमाते हैं, जब आम कैदी और आम आरोपी की तरह उन्हें जेलों में ठूंसा जाएगा और वे जेल की यंत्रणा भोगेंगे तब पता चलेगा कि बिना फैसला जेलों में रहना कितना उचित है? यह आलेख हम ना संविधान की गरिमा कम करने के लिए लिख रहे और ना ही न्यायाधीशों की मानहानि करने के लिए लिख रहे, बल्कि बिना फैसला जेलों में बंद आरोपियों की पीड़ा को स्वर देने का छोटा सा विनम्र प्रयास कर रहे हैं…अगर सरकार हमारी बात सुन रही है…सुप्रीम कोर्ट तक हमारी दलील पहुंच रही है तो तुरंत एक्शन ले…। लोकतंत्र में मुझे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जो अधिकार मिला है उसके तहत में यह बातें कहने का साहस कर रहा हूं…। लेकिन लोकतंत्र में किस व्यक्ति की आवाज कब दबा दी जाए कहा नहीं जा सकता…क्योंकि हम एक ऐसे दौर में जी रहे हैं जहां कब क्या दरक जाए कुछ कह नहीं सकते?…

दिलीप कुमार पुरोहित. नई दिल्ली
9783414079 diliprakhai@gmail.com
भारतीय न्याय व्यवस्था एक मूल सिद्धांत पर खड़ी है—जब तक दोष सिद्ध न हो, व्यक्ति निर्दोष है। लेकिन जमीनी सच्चाई इससे ठीक उलट है। भारत में आज हजारों नहीं, लाखों लोग ऐसे हैं जो निर्दोष होने का दावा नहीं, बल्कि तथ्य रखते हैं—फिर भी जेल में हैं। उनका अपराध क्या है? केवल इतना कि राज्य समय पर जांच नहीं कर सका, अदालत समय पर फैसला नहीं दे सकी। यह प्रश्न अब केवल मानवीय नहीं, संवैधानिक विद्रोह का प्रश्न बन चुका है।

राज्य की नाकामी की सजा नागरिक क्यों?

अगर कोई नागरिक टैक्स न भरे, तो उसे दंड मिलता है। अगर कोई छात्र परीक्षा में देर करे, तो वह फेल होता है। अगर कोई कर्मचारी काम न करे, तो उसे नौकरी से हटाया जाता है। लेकिन अगर पुलिस समय पर जांच न करे, अभियोजन ढीला हो, कोर्ट में तारीख पर तारीख पड़े—तो सजा किसे मिलती है? आरोपी को।

यह न्याय नहीं, राज्य द्वारा थोपा गया दंड है—बिना दोष सिद्ध हुए।

त्वरित न्याय का अधिकार कागज़ पर है, ज़मीन पर नहीं

सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि Speedy Trial अनुच्छेद 21 का हिस्सा है। लेकिन सवाल यह है—

अगर यह अधिकार वास्तव में मौलिक है,
तो इसके उल्लंघन पर जिम्मेदारी किसकी तय होती है?

आज की स्थिति यह है—
  • जांच एजेंसी लापरवाही करे → कोई सजा नहीं

  • अभियोजन तारीख पर तैयार न हो → कोई सजा नहीं

  • अदालत वर्षों फैसला न दे → कोई जवाबदेही नहीं

लेकिन—
  • आरोपी वर्षों जेल में रहे → “यह तो प्रक्रिया है”

यह प्रक्रिया नहीं, संवैधानिक अन्याय है।

जमानत न मिलना: कानून नहीं, कानून की क्रूरता

कई मामलों में आरोपी जानता है—

  • वह निर्दोष है

  • उसे राजनीतिक, सामाजिक या व्यक्तिगत कारणों से फंसाया गया है

  • सबूत कमजोर हैं

फिर भी—
  • जमानत नहीं

  • ट्रायल शुरू नहीं

  • जांच पूरी नहीं

और परिणाम?

अनिश्चित काल की जेल।

यह स्थिति कानून की मजबूरी नहीं, कानून की असंवेदनशीलता है।

एक कठोर सवाल अदालतों से

अगर—
  • जांच एजेंसी 2 साल में चार्जशीट दाखिल नहीं कर पाती

  • कोर्ट 5–10 साल में फैसला नहीं दे पाती

तो क्या अदालत को यह नैतिक अधिकार है कि वह आरोपी को जेल में रखे?

क्या यह कहना अनुचित है कि—

“जब राज्य समय पर न्याय नहीं दे सकता,
तो उसे किसी की स्वतंत्रता छीनने का अधिकार भी नहीं है।”

आरोपी का दृष्टिकोण: यह पूर्व-सजा है

जेल में रहना—
  • सामाजिक मृत्यु है

  • आर्थिक विनाश है

  • मानसिक यातना है

अगर अंत में आरोपी बरी हो जाता है, तो भी—
  • उसका जीवन वापस नहीं आता

  • उसकी प्रतिष्ठा वापस नहीं आती

  • उसके वर्षों वर्ष बंदी काल वापस नहीं आते

तो यह क्या है?

बिना दोष सिद्ध हुई सजा।

यह सीधे-सीधे अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।

संविधान की चुप्पी, व्यवस्था की कठोरता

संविधान यह नहीं कहता कि—

“आरोपी को जेल में ही रखा जाएगा”

फिर भी व्यवस्था ऐसा करती है।

क्यों?

क्योंकि—

  • यह आसान है

  • यह पुरानी औपनिवेशिक सोच है

  • और क्योंकि आरोपी सबसे कमजोर कड़ी है

यह न्याय नहीं, सुविधा आधारित शासन है।

आरोपी की ओर से प्रस्तावित संवैधानिक रास्ता

अगर आरोपी को वास्तव में “निर्दोष माना जाता है”, तो निम्न बदलाव अनिवार्य हैं—

जेल अंतिम विकल्प हो, पहला नहीं

जब तक—

  • हिंसक अपराध सिद्ध न हों

  • या भागने का स्पष्ट खतरा न हो

आरोपी को जेल में रखना असंवैधानिक माना जाए।

जांच में देरी = स्वतः हिरासत समाप्त

अगर—
  • तय अवधि में जांच पूरी न हो

  • चार्जशीट न आए

आरोपी को जेल में रखने का अधिकार समाप्त हो।

अंडरट्रायल के लिए जेल नहीं, नागरिक आवास

  • अलग होल्डिंग होम

  • मानवीय जीवन

  • कोई कैदी जैसा व्यवहार नहीं

राज्य की विफलता का मुआवजा

अगर आरोपी—
  • अंततः निर्दोष साबित हो

  • और वर्षों जेल में रहा हो

राज्य उस व्यक्ति को कानूनी क्षतिपूर्ति दे।

एक अंतिम, असहज लेकिन जरूरी सवाल

अगर—
  • निर्दोष जेल में है

  • दोष सिद्ध नहीं हुआ

  • न्याय नहीं मिला

तो क्या हम यह कहने का साहस रखते हैं कि—

“यह व्यवस्था संविधान की रक्षा कर रही है?”

या फिर यह मानना पड़ेगा कि—

भारतीय न्याय प्रणाली में आरोपी सबसे पहले दोषी मान लिया जाता है।

सौ बातों की एक बात: यह कानून का नहीं, न्याय का प्रश्न है

यह लेख अपराधियों के पक्ष में नहीं है। यह निर्दोष नागरिक के पक्ष में है, जो राज्य की विफलता की कीमत चुका रहा है। अगर भारत को सच में संवैधानिक लोकतंत्र बनना है, तो यह स्वीकार करना होगा—

जांच में देरी अपराध है,
और उसकी सजा आरोपी को नहीं मिलनी चाहिए।

जेल सजा के लिए होती है, जांच के लिए नहीं
— क्या विचाराधीन आरोपी को जेल में रखना न्याय है?

भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसका संविधान है, जो व्यक्ति की गरिमा, स्वतंत्रता और न्याय की रक्षा का वादा करता है। लेकिन जब हम देश की जेलों की हकीकत देखते हैं, तो यह सवाल बार-बार उठता है—क्या हमारा आपराधिक न्याय तंत्र वास्तव में संविधान की आत्मा के अनुरूप काम कर रहा है? आज भारत की जेलों में बंद लोगों में से लगभग 75 प्रतिशत से अधिक विचाराधीन कैदी हैं। यानी वे लोग, जिन पर आरोप तो लगे हैं, लेकिन अभी तक दोष सिद्ध नहीं हुआ है। ऐसे में सबसे बड़ा और संवेदनशील प्रश्न यह है—जब अपराध सिद्ध ही नहीं हुआ, तो किसी व्यक्ति को जेल में क्यों रखा जाए?

संविधान क्या कहता है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 कहता है कि “किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जा सकता है।” सुप्रीम कोर्ट ने समय-समय पर यह स्पष्ट किया है कि त्वरित न्याय (Speedy Trial) इसी अनुच्छेद का अभिन्न हिस्सा है। साथ ही, कानून का एक बुनियादी सिद्धांत है—जब तक दोष सिद्ध न हो, व्यक्ति निर्दोष माना जाएगा। फिर प्रश्न उठता है कि निर्दोष माने जाने वाले व्यक्ति को जेल जैसी कठोर व्यवस्था में क्यों रखा जाता है?

जेल: सजा या हिरासत?

सैद्धांतिक रूप से जेल वह स्थान है, जहां सजा पाए अपराधियों को रखा जाता है। लेकिन व्यवहार में, जेलें उन लोगों से भरी हैं जिनका अपराध अभी अदालत ने सिद्ध ही नहीं किया। यह स्थिति न्याय के मूल सिद्धांतों के विपरीत प्रतीत होती है।

जेल में रहना केवल स्वतंत्रता का हनन नहीं है, बल्कि:

  • सामाजिक प्रतिष्ठा को गहरी ठेस,

  • मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न की आशंका,

  • परिवार और आजीविका से कटाव,

  • और कई बार हिंसा या अनहोनी घटनाओं का खतरा
    भी साथ लाता है।

ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या यह “पूर्व-सजा” (Pre-trial Punishment) नहीं है?

आरोपी को जेल में रखने का तर्क

राज्य का तर्क आमतौर पर यह होता है कि आरोपी को इसलिए हिरासत में रखा जाता है ताकि:

  • वह फरार न हो,

  • सबूतों से छेड़छाड़ न करे,

  • गवाहों को प्रभावित न करे,

  • और समाज की सुरक्षा बनी रहे।

ये तर्क पूरी तरह निराधार नहीं हैं, लेकिन क्या इन सभी परिस्थितियों में जेल ही एकमात्र विकल्प है? क्या कोई ऐसा मानवीय और न्यायसंगत विकल्प नहीं हो सकता, जो सुरक्षा और गरिमा—दोनों को संतुलित करे? आरोपी फरार न हो, सबूतों से छेड़छाड़ न करे, गवाहों को प्रभावित न करे ओर समाज की सुरक्षा बनी रहे…यह राज्य और सुरक्षा का विषय है…इसे आरोपी के पॉइन्ट ऑफ व्यू से क्या देखा जाता है। सारी शक की सुई आरोपी पर ही क्यों लादी जाती है? कुछ जवादेही पुलिस, जांच एजेंसियां, प्रशासन और सरकार अपने ऊपर क्यों नहीं लेते? अगर आशंकाओं के चलते आरोपी के मौलिक अधिकारों का हनन हो तो न्याय की परिभाषा फिर से लिखने की आवश्यकता हो जाती है।

दुनिया क्या कर रही है?

कई विकसित देशों ने इस समस्या का समाधान खोज लिया है।

यूरोप के कई देशों में विचाराधीन कैदियों के लिए अलग डिटेंशन सेंटर होते हैं, जो जेल जैसे नहीं होते।
अमेरिका जैसे देशों में:

  • जमानत व्यवस्था,

  • इलेक्ट्रॉनिक निगरानी (GPS),

  • हाउस अरेस्ट,

  • और हाफ-वे होम्स
    जैसे विकल्प अपनाए जाते हैं।

इन व्यवस्थाओं का मूल विचार यही है कि जब तक दोष सिद्ध न हो, व्यक्ति को अपराधी की तरह न रखा जाए। 

भारत में विकल्प क्यों नहीं?

भारत की जेल व्यवस्था काफी हद तक औपनिवेशिक सोच की विरासत है। अंग्रेजी शासन के दौरान हिरासत और सजा के बीच स्पष्ट अंतर नहीं रखा गया, और दुर्भाग्य से आज भी वही ढांचा लगभग जस का तस बना हुआ है।

इसके अलावा:
  • न्यायालयों में मामलों की अत्यधिक लंबित संख्या,

  • जजों की कमी,

  • और राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव भी इस समस्या को जटिल बनाते हैं।

क्या यह संविधान की कमजोरी है?

यह कहना उचित होगा कि यह संविधान की कमजोरी नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता है। संविधान सिद्धांत देता है, प्रक्रिया कानूनों और नीतियों के जरिए तय होती है। लेकिन जब प्रक्रिया ही व्यक्ति की गरिमा को आहत करने लगे, तो सुधार अनिवार्य हो जाता है।

एक जरूरी सुधार का सुझाव

अब समय आ गया है कि सरकार और समाज इस विषय पर गंभीर मंथन करें। कुछ व्यावहारिक सुझाव हो सकते हैं—

  1. विचाराधीन कैदियों के लिए अलग ‘अंडरट्रायल होम’
    — जो जेल न हों, बल्कि सुरक्षित और मानवीय आवास हों।
  2. जोखिम-आधारित हिरासत प्रणाली
    — केवल हिंसक और गंभीर अपराधों में ही जेल।
  3. हाउस अरेस्ट और इलेक्ट्रॉनिक निगरानी
    — विशेषकर बुजुर्गों, महिलाओं और बीमार आरोपियों के लिए।
  4. कानूनी सुधार
    — दंड प्रक्रिया कानून में स्पष्ट प्रावधान कि जेल अंतिम विकल्प हो, पहला नहीं।

संविधान संशोधन आवश्यक हो या न हो, लेकिन कानूनी और नीतिगत सुधार अब टाले नहीं जा सकते

राइजिंग भास्कर विचार : दोषी काे दंड जरूरी तो निर्दोष को पीड़ा से बचाना भी जरूरी

न्याय का अर्थ केवल दोषी को दंड देना नहीं, बल्कि निर्दोष को अनावश्यक पीड़ा से बचाना भी है। यदि कोई व्यक्ति अंततः निर्दोष पाया जाता है, तो जेल में बिताए गए उसके दिन कौन लौटाएगा? उसकी बदनामी, मानसिक आघात और सामाजिक नुकसान की भरपाई कैसे होगी?

जेल सजा के लिए होती है, जांच के लिए नहीं।
अगर भारत को सचमुच एक संवेदनशील और न्यायप्रिय लोकतंत्र बनना है, तो विचाराधीन कैदियों के प्रति हमारी सोच और व्यवस्था—दोनों को बदलना होगा। यही संविधान की आत्मा है और यही सच्चे न्याय की कसौटी।

क्या जेल में आरोपी को रखना संविधान की कमजोरी है?

सीधा उत्तर:
हां, यह संविधान की नहीं बल्कि आपराधिक न्याय प्रणाली की एक गंभीर नैतिक कमी है।

क्यों?

अनुच्छेद 21 कहता है—

जीवन और गरिमा का अधिकार

लेकिन—

  • जेल में अमानवीय व्यवहार

  • हिंसा, उत्पीड़न

  • मानसिक आघात

  • सामाजिक बदनामी

ये सब गरिमा के अधिकार का उल्लंघन हैं।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी:

“Undertrial prisoners are not convicts.”
(विचाराधीन कैदी अपराधी नहीं होते)

दुनिया में कहां कैसे मॉडल लागू है?

???????? नॉर्वे, ???????? जर्मनी, ???????? नीदरलैंड्स

  • Undertrial Detention Centers अलग होते हैं

  • खुला वातावरण

  • परिवार से संपर्क

  • काम और पढ़ाई की अनुमति

???????? अमेरिका

  • Bail system मजबूत

  • Electronic monitoring

  • Halfway houses

भारत में भी क्या ऐसे विकल्प संभव हैं?

Undertrial Care Homes (विचाराधीन आवास)

  • जेल से अलग

  • बिना वर्दी, बिना सलाखें

  • CCTV और निगरानी

  • मानवीय जीवन

Electronic Surveillance

  • GPS anklet

  • Digital attendance

House Arrest

  • खासकर बुजुर्ग, महिलाएं, बीमार, आर्थिक अपराधों में

Risk-Based Detention

  • केवल हिंसक और आदतन अपराधियों को जेल

फिर संविधान में ऐसा स्पष्ट प्रावधान क्यों नहीं डाला गया?

कारण:

संविधान फ्रेमवर्क देता है, माइक्रो-मैनेजमेंट नहीं
  • संविधान सिद्धांत तय करता है

  • प्रक्रियाएं कानून (CrPC/BNS) तय करते हैं

1950 में यह मुद्दा इतना प्रबल नहीं था
  • तब जेलों में भीड़ नहीं थी

  • मुकदमे इतने लंबे नहीं चलते थे

राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी
  • विचाराधीन कैदी वोट बैंक नहीं होते

क्या संविधान संशोधन की जरूरत है?

उत्तर:

संविधान संशोधन अनिवार्य नहीं है

कानूनी और नीतिगत सुधार पर्याप्त हैं, जैसे:
  • CrPC/BNS में संशोधन

  • जेल मैनुअल में बदलाव

  • अलग “Undertrial Detention Act”

लेकिन—

यदि संविधान में स्पष्ट रूप से यह जोड़ दिया जाए कि
“जब तक दोष सिद्ध न हो, आरोपी को जेल में नहीं रखा जाएगा”

तो यह ऐतिहासिक सुधार होगा।

मेरा प्रश्न क्यों ऐतिहासिक है?

वह—

  • न्याय बनाम व्यवस्था

  • सजा बनाम हिरासत

  • राज्य की शक्ति बनाम नागरिक की गरिमा

इन सबका मूल है।

अंतिम वाक्य:

जेल सजा के लिए होती है, जांच के लिए नहीं।
और
जिस समाज में निर्दोष भी जेल में हों, वहां न्याय अभी अधूरा है।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor