मैं कुछ हूं पर तुच्छ नहीं। मैं विचार हूं पर लाचार नहीं। मैं शक्ति का शंखनाद हूं पर अहं का अनहदनाद नहीं। मुझे बहने का धर्म मिला…पर मैं आंख खोलता हूं ताकि उजाले को आत्मसात कर सकूं। मैं मानता हूं मुझे लघुता में गुरुता को सीखना है…। स्वाभिमान मेरा स्वभाव है, पर मैं अभिमान के अंतर को समझता हूं। मैं आज आपसे संवाद करने जा रहा हूं…
दिलीप कुमार पुरोहित. राखी पुरोहित. जोधपुर
9783414079 diliprakhai@gmail.com
मैं पवन…चार और तत्व अग्नि, आकाश, पृथ्वी और जल से बना एक पुतला। प्रकृति ने मुझे इस धरा पर भेजा। कुछ आशाएं, कुछ सपने और कुछ जिम्मेदारियों के साथ…। मैं कुछ हूं पर तुच्छ नहीं। मैं विचार हूं पर लाचार नहीं। मैं शक्ति का शंखनाद हूं पर अहं का अनहदनाद नहीं। मुझे बहने का धर्म मिला…पर मैं आंख खोलता हूं ताकि उजाले को आत्मसात कर सकूं। मैं मानता हूं मुझे लघुता में गुरुता को सीखना है…। स्वाभिमान मेरा स्वभाव है, पर मैं अभिमान के अंतर को समझता हूं। मैं आज आपसे संवाद करने जा रहा हूं…।
मैंने काफी सोचा कि अपने बारे में कुछ कहूं, मगर जीवन तो यात्रा है…यात्रा में पड़ाव आते गए, मैं जीवन के हर क्षण का आनंद उठाता गया। असफलता मेरे अनुभव के गुल्लक में स्वर्ण सिक्के डालती गई और सफलता मेरे लिए एक स्वर्ण मृग है…जिसके पीछे दुनिया भाग रही है। मैं दुनिया का आदमी हूं और दुनियादारी भी जानता हूं…पर सच मानों मैं अभी बच्चा हूं और बच्चे की तरह जीना चाहता हूं। मुझे बड़ा बनकर ज्ञान नहीं बांटना, बस चाहता हूं जो सीख बड़ों से मिली, या जो कुछ कुदरत से अर्जन हुआ उसके सफे में कुछ कुदरत के दिए रंग ही भर सकूं।
कुदरत ने मुझे इस सुंदर संसार की विरासत सौंपीं, हमें भी कुछ लौटाना होगा। लेने की इस दौड़ में हम देने का सुख भूल चुके…आइए ऋण चुकाते हैं- पर किसका? माता-पिता का, पृथ्वी का, राष्ट्र का और गुरुजनों का ऋण हम जीवन भर नहीं चुका सकते…बस हम अपना ही ऋण चुका रहे हैं…। यह जीवन भी एक ऋण है…पर हमने इसे रण बना दिया है…रण और ऋण की दौड़ में हमारा काफी कुछ छूट रहा है। मेरे पिताजी राजाराम जोशी और माता सीता देवी—ने मेरा नाम बहुत सोच-समझकर रखा था। आज महसूस होता है कि उन्होंने केवल नाम नहीं, मेरे जीवन का दर्शन ही दे दिया था। बहना ही मेरा स्वभाव है और जीवन के मुक्त गगन पर बह रहा हूं…।
मुझे कहीं पहुंचना नहीं है। मुझे तो सिर्फ अपनी यात्रा का आनंद लेना है। आओ मैं अपनी कहानी संक्षेप में सुनाता हूं।
जन्म, शिक्षा और आस्था की पगडंडी पर बिखरे विविध रंग
मेरा जन्म 9 जुलाई को इचलकरणजी, महाराष्ट्र में हुआ। मुझसे पहले आठ-दस भाई-बहन इस धरती पर टिक नहीं पाए थे। इसलिए मेरे माता-पिता का मानना है कि मेरा जन्म बालाजी महाराज के आशीर्वाद से हुआ। मैं जन्मा, तो परिवार ने इसे सिर्फ़ जन्म नहीं, बल्कि बालाजी की कृपा का अवतरण माना। आज भी यही मानता हूं कि जो भी मिला, उन्हीं की कृपा से मिला। बचपन हरनावा में बीता। पढ़ाई बीकानेर, जोधपुर की दहलीज़ों पर। माताजी ने कलेजे पर पत्थर रखकर मुझे शहर पढ़ने के लिए भेजा। मामाजी के घर रहकर किताबों से ज्यादा दुनियादारी और व्यावहारिक ज्ञान को समझा। 2008 में एमबीए पूरी हुई और उसी वर्ष कंचन मेरी जीवनसंगिनी बनी। सच कहूं तो मेरी जीवन-तस्वीर में रंग भरने का काम उसी ने किया है। मेरे दो पुत्र प्रद्युम्न और पार्थ मेरे लिए प्रभु का आशीर्वाद है।
जब बच्चों की गुल्लक तोड़ कर्ज चुकाया…
जीवन की राहें हमेशा सीधी नहीं रहीं। मुंबई में प्रारंभिक दिनों में स्टील की फैक्ट्री लगाई, पर मशीनरी अपडेशन की वजह से चली नहीं। बच्चों की गुल्लक तक तोड़नी पड़ी। मैंने सॉफ़्टवेयर बनाए, देशभर में घूमता रहा, प्रयास किए, पर सफलता साथ नहीं चली। फिर 4-16 साल के बच्चों की वर्कशॉप लेना शुरू किया। जोधपुर, जयपुर, दिल्ली, मुंबई आदि स्थानों पर वर्कशॉप की। मलेशिया व इंडोनेशिया से भी आमंत्रण मिला, मगर जा नहीं पाया क्योंकि कुछ पारिवारिक कारण थे। हम केवल कर्म कर सकते हैं, फल ईश्वर के हाथ में है। हमें सफलता-असफलता को स्वीकार करना ही पड़ता है।
किस्मत जोधपुर ले आई…और देखते- ही देखते राह बदल गई
मैंने आखिर राजस्थान लौटने का निर्णय किया। मेरा यह मानना है कि मुंबई अनुभव की फैक्ट्री है। मुंबई सीखने का बड़ा विश्वविद्यालय है। जो व्यक्ति मुंबई का अनुभव ले लेता है वो व्यक्ति जीवन में कहीं बिखरता नहीं टूटता नहीं। मेरे साथ भी यही हुआ। मैंने राजस्थान लौटने का निर्णय किया। तय हुआ कि जोधपुर पहुंचा जाए। 22 फरवरी 2016 सुबह 5:30 बजे ट्रेन से उतरकर स्टेशन से बाहर आकर बैठ गया…खाली जेब, मजबूत इरादे, आंखों में चमक और रानाबाई का आशीर्वाद…सोचता रहा कहां जाऊं…कहां से शुरुआत करूं…लोग क्या कहेंगे…दिल ने कहा किसी की मत सुन…सर झुका और काम कर…तब तक करते रहना जब तक सफलता शोर नहीं मचा दे…कभी कभी अपने घर की छत पर खड़ा होता हूं और सोचता हूं कि क्या सच में सपने पूरे होते हैं.. मैंने अपनी हैसियत से बड़े सपने देखे और आज गर्व से कह सकता हूं कि मेरा ऐसा कोई भी सपना नहीं है जो पूरा हुआ नहीं। ये मेरे राना बाई की कृपा ही है मुझ पर। सच में फिल्मों की तरह जीवन में भी एंडिंग में सब ठीक हो जाता है…लोग मुझे पूछते हैं तेरे साथ कौन है? मैँ कहता हूं ऊपर राम और नीचे राना बाई का धाम..। जोधपुर पहुंचा तब कॉन्ट्रेक्टर बनने का निर्णय लिया और इस फील्ड में मेरे ससुरजी भंवरलालजी सारस्वत से प्रेरित था। शुभ चिंतकों का मार्गदर्शन मुझे मिलता रहा। शायद यहीं से पवन की दिशा बदलनी थी।
राह आसान नहीं थी, आस्था की पगडंडी पर सवार होकर आगे बढ़ता रहा :
मेरे लिए राह आसान नहीं थी। पूंजी की कमी। श्रमिकों की कमी। माल की कमी। समय और स्थान का अभाव। कोई ऑफिस भी नहीं था। मेरे लिए चुनौतियां कम नहीं थी। पहले से स्थापित कॉन्ट्रेक्टर के बीच नए का स्थापित होना चुनौतीपूर्ण था। आखिर मुझे काम मिलने लगा। मैंने चुनौती स्वीकार की। मैंने पाइप लाइन बिछाना शुरू किया। कई गांव ऐसे थे जहां पाइप लाइन बिछाना चुनौतीपूर्ण था। समस्याएं भी आईं। पर रास्ता आगे से आगे निकलता गया। नागौर जिले की हरनावा गांव में मारवाड़ की दूसरी मीरां बाई राना बाई का मंदिर है। राना बाई में मेरी शुरू से आस्था रही है। जब भी परेशानी में होता। राना बाई को याद करता। राह बनती गई। आस्था की पगडंडी पर सवार होकर आगे बढ़ता रहा। मुझे बराबर काम मिलता रहा। फिर सड़कें बनाना भी शुरू किया। यह मेरे लिए नया मगर उत्साहजनक कार्य था।
और आज जब गांव की बुज़ुर्ग महिलाएं कहती हैं, “बेटा, आंख में पानी तो देखा था नल में पानी पहली बार, अब जाकर हलक तर हुए हैं,” तब समझ आता है कि असली कमाई दुआएं होती हैं, बैंक बैलेंस नहीं। गांव के बिरजू काका कहते हैं- बेटा पगडंडी पर पीढ़ियां गुजर गईं, तुम्हारी बदौलत सड़क आई तो सुकून मिला है—यह मेरी सफलता है, पर मुझे हमेशा लगता है कि यह राना बाई की कृपा है, पिताजी के संस्कार हैं और कंचन व छोटे भाई पंकज का साथ है—जो सच में मेरे लिए लक्ष्मण हैं। पंकज आईसीआईसी में वाइस प्रेसिडेंट से इस्तीफा देकर मेरे बिजनेस में हाथ बंटा रहा है।
जब जोधपुर आया और यहां समाज में जाने लगा तब मन में यही था कि एक दिन यहां के लोग भी मुझे जानें और उसी दिन से समाज सेवा में लग गया। कभी सोचा नहीं था कि जहां सिर्फ ये ख्वाहिश थी कि चार लोग मुझे जानेंगे उसी जगह में युवा अध्यक्ष बना। मेरा मानना है कि स्वास्थ्य अच्छा हो सोच साफ हो और इरादा मजबूत हो तो कोई भी मंजिल दूर नहीं।
500 किलोमीटर पाइप लाइन और 500 किलोमीटर सड़कें बिछाई :
हालांकि इसे मैं शुरुआत ही मानता हूं। मैंने 500 किलोमीटर पाइप लाइन और 500 किलोमीटर सड़कें बिछाई। मेरा सफर जारी है। लोग मुझे प्यार करते हैं। गांव वालों का मुझे स्नेह मिलता है। गांव की महिलाएं कहती है- बेटा जब गांव में बहू बनकर आई थी तब कुछ नहीं था और आज जब सास बनी हूं तो पानी देखा है। तब बड़ी खुशी होती है कि मैं गांव के लिए कुछ कर सका। बुजुर्ग कहते हैं कि बेटा यह पगडंडी ही पीढ़ियों से देख रहे थे, तुमने सड़क के दर्शन करवाए। बडा अच्छा लगता है। साथ ही दुख भी होता है कि गांव विकास से आज भी दूर है। पर हमारे हाथ में प्रयास करना है। कॉन्ट्रेक्टर का कार्य मुझे रास आने लगा है। सरकार से कॉन्ट्रेक्ट भी मिलने लगे हैं। मेरा बिजनेस चल निकलना है। अभी चलने का क्रम जारी है। जीवन यात्रा जारी है। मैंने असफलता का कभी दुख नहीं किया। सफलता का कभी अहं नहीं किया। हर पल को एन्जॉय किया।
मेरा पता- सिया की ढाणी :
जब समर्थ हुआ। तो अपने पिता राजाराम और माता सीता देवी के नाम को सार्थक करते हुए सिया की ढाणी मेरा नया आवास बना। आस्था से सब संभव हुआ। माता-पिता का आशीर्वाद रंग लाया। मैंरे सपनों का ऑफिस भी बना, मगर पिताजी दो साल पहले चल बसे और वे मेरी सफलता का पूरा जश्न भी नहीं मना पाए। मेरा एक ही उद्देश्य है कि जो समाज से अर्जित किया उसे समाज को लौटाना। यह मेरा ही नहीं हर बिजनेसमैन का फर्ज होना चाहिए कि वह समाज से अर्जित करता है, उसका कुछ भाग समाज को लौटाना चाहिए। हम समाज के ट्रस्टी है। हम संपत्ति के मालिक नहीं हैं। ट्रस्टी बनकर हमें समाज को लौटाना होगा। यही भावना मेरे संस्कारों में हैं।
अनुज पंकज ने लक्ष्मण की भूमिका, पत्नी कंचन ने पग-पग पर साथ दिया :
मेरे अनुज पंकज ने लक्ष्मण की भूमिका निभाई और पग-पग पर मेरा साथ दिया। जब भी परेशानी में आया वह मेरे साथ कदम से कदम मिला कर चला। मुझे लगा ही नहीं कि मैं अकेला हूं। जीवन की भागदौड़ में निराश होता तो वह मुझे ढाढस बंधाता। उत्साह की थपकी देता। उसके उत्साह बढ़ाने से हर मुश्किल आसान होती गई। छोटे भाई पंकज की पत्नी श्रुति भी कंचन के साथ कदम से कदम मिलाकर साथ चली। पत्नी कंचन का साथ मेरे लिए उत्साहजनक रहा है। वह नहीं होती तो मैं कब का टूट जाता। हर मुश्किल घड़ी में वह चट्टान की तरह खड़ी रही। मेरे हर कदम की सहचरी बनी। मुझे संभाला और बच्चों की अच्छी परवरिश की। मेरे माता-पिता का ख्याल रखा। परिवार की जिम्मेदारियों से कंचन कभी पीछे नहीं हटी।
पिताजी की स्मृति में हरनावा में आई कैंप लगाया, गांव से आज भी जुड़ाव :
हमारा रहना भले ही मुंबई या जोधपुर में रहा हो पर गांव हरनावा से जुड़ाव बना रहा। हरनावा के ग्रामीण पिताजी को मौजिज लोग मानते थे और उनसे सलाह लेते रहते थे। हर बड़े निर्णय में उनकी राय ली जाती रही। पिताजी की स्मृति में पिछले दिनों मैंने हरनावा में आई कैंप लगाया। इस कैंप में सैकड़ों लोग लाभान्वित हुए। जितना सोचा न था जिंदगी ने उससे ज्यादा दिया है, अब लौटाने की बारी मेरी है…गांव में जब आई कैंप लगाया तब ऑपरेशन के बाद एक बुजुर्ग महिला ने मुझे अपने पास बुलाकर कहा बेटा पहले रात को जब बाथरूम जाने उठती थी तो अक्सर गिर जाया करती थी। कुछ दिखता नहीं था…चोट लग जाती थी…अब ऑपरेशन के बाद में आराम से बाथरूम जा सकती हूं….भगवान तेरा भला करे…जब यह सुना तब सिर्फ आंखों में ही पानी नहीं आया बल्कि जीवन को एक दिशा मिल गई कि सच्ची खुशी सेवा में है। जरूरी नहीं कि सेवा के लिए दूर ही जाया जाए। आपके आस-पास किसी को आपकी सहायता की जरूरत है। लोगों की दुआएं मेरे जीवन में बड़ा महत्व रखती है। पिताजी मेरे लिए हमेशा आदर्श रहे। उन्होंने अपने परिवार की जिम्मेदारियां तो उठाई ही साथ ही मेरे बुरे दिनों में मेरी ढाल बनकर खड़े रहे। पिताजी के रहते मैंने अपने आपको कभी अकेला और निराश नहीं समझा। पिताजी मेरी शक्ति थे। पिताजी मेरी साधना थे। पिताजी ने मेरे जीवन पर गहरा असर छोड़ा है। जीवन में संघर्ष करना और कभी नहीं हारना मैंने पिताजी से ही सीखा।
फोटोग्राफी-मॉडलिंग शौक, सम्मान ने हौसला बढ़ाया
फोटोग्राफी, सेवा और मॉडलिंग मेरा शौक रहा है। मैं हमेशा सेवा संबंधी फोटो सोशल मीडिया पर डालता रहा हूं। कई बार लोग इसे दिखावा मानते हैं। मगर मेरा यह कहना है कि मैं दिखावा नहीं करता बल्कि ऐसा इसलिए करता हूं ताकि अन्य लोग प्रेरित हों और समाज सेवा का विस्तार हो। लोग भी मेरे देखा-देखी समाज सेवा से जुड़े। इसलिए मैं इसमें कुछ बुराई नहीं देखता। इसके साथ ही मुझे मॉडलिंग का शौक है। मॉडलिंग के लिए मुझे कई अवसर भी मिले, लेकिन मुझे समय नहीं मिल पाया। साथ ही मुझे सेवा कार्यों के लिए कई सम्मान भी मिले। —Global Legacy Award 2025, Mr Rajasthan confidence ka award, लॉयंस क्लब का सेवा रत्न, कोरोना काल में कलेक्टर से गरीबों को भोजन पैकेट वितरण के लिए सम्मान, अंतरराष्ट्रीय गायत्री परिवार हरिद्वार, शिवाजी फाउंडेशन सोसायटी, राज्य रक्त संक्रमण परिषद महाराष्ट और सारथी यूथ फाउंउेशन ने भी नवाजा। सम्मान कभी लक्ष्य नहीं रहे; बस बहने की यात्रा का हिस्सा हैं।



