शिव सिंह
9784092381
जीवन क्या है? जन्म और मृत्यु के बीच की अवस्था को समझना आवश्यक है। जीवन को समझने से पूर्व जन्म और मृत्यु के कारण को समझना आवश्यक है, जिसके कारण हमारा जीवन विभिन्न योनियों में भ्रमण करता है। कैसे और कहाँ होती है? इसका संचालन और नियंत्रण कौन और कैसे करता है? सबकी जीवन शैली, मंशा, सोच, विवेक, भावना, संस्कार, प्राथमिकताएं, उद्देश्य, आवश्यकताएं, आयु और मृत्यु का कारण और ढंग एक-सा क्यों नहीं होता? मृत्यु के पश्चात् अच्छे से अच्छे वैकल्पिक का प्रयास और जीवन दायिनी समझी जाने वाली दवाइयां क्यों प्रभावहीन हो जाती हैं? मृत्यु के पश्चात् मृत शरीर के कलेवर को क्यों जलाया, दफनाया अथवा अन्य किसी विधि द्वारा समाप्त किया जाता है?
प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं से प्रश्न करना चाहिए कि – “मैं कौन हूँ? मैं कहाँ से आया हूँ?” मुझे मानव जन्म क्यों और कैसे मिला? मानव जीवन में भी सभी को एक जैसी परिस्थितियाँ और वातावरण क्यों नहीं मिलते? सभी की आयु एक जैसी क्यों नहीं होती? किसकी बुद्धि, मन, इन्द्रियों और शरीर का पूर्ण विकास होता है? किसी को क्यों जन्म से ही अधिकतर, असन्तुलित, विकलांग अथवा अस्वस्थ क्यों होते हैं? जन्म के साथ परिवार, समाज, धर्म और संस्कृति, परिस्थितियां, कार्यक्षेत्र तथा जीवन को प्रभावित करने वाले विभिन्न प्रसंगों का संयोग अथवा वियोग क्यों मिलता है? जीवन चलाना तो प्राय: सभी योनि के जीव जानते हैं। परन्तु जीवन को सार्थक कैसे बनाना, यह केवल मानव जीवन में ही सम्भव होता है। सृष्टि में मानव ही एक ऐसा प्राणी है जिसकी पांचों इन्द्रियों के साथ मन, मस्तिष्क, चेतना और विवेक की सर्वोत्तम अवस्था प्राप्त होती है, जिसमें जीवन का सर्वाधिक विकास सम्भव होता है। मानव इसी कारण सम्यक् चिंतन कर अपनी क्षमताओं को पहचान, उसके अनुरूप जीवन का लक्ष्य बना जीवन जी सकता है।
मानव जीवन अमूल्य है। वस्तु जितनी मूल्यवान होती है, उसका उपयोग उसके अनुरूप करने वाला ही सच्चा ज्ञानी होता है। लाखों रुपए मासिक वेतन वाले कारखाने के किसी मैनेजर को झाडू लगाने का कार्य लेने वाले को व्यावहारिक जगत में हम बुद्धिमान नहीं कहते। चाय की प्याली दो-तीन रुपए में मिलती है, उसके लिए हज़ार रुपए देने वाला ना-समझ होता है। पागलखाने में बन्द व्यक्ति ही पागल नहीं होता, अपितु वे सभी व्यक्ति बुद्धिमानों की श्रेणी में नहीं आते, जो जानते तो हैं कि अमुक प्रवृत्ति उनके स्वास्थ्य अथवा जीवन के लिए हानिकारक है, फिर भी उनसे नहीं बचते और जो यह जानते हैं कि अमुक प्रवृत्तियों से शांति मिलती है, तनाव दूर होता है, निर्भरता आती है, स्वास्थ्य अच्छा रहता है, फिर भी उनकी उपेक्षा करते हैं। हमें चिन्तन करना होगा कि मानव जीवन के रूप में प्राप्त हम अपनी ऐसी अमूल्य क्षमताओं का छोटे-मोटे कम उपयोगी, अप्रासंगिक, अनावश्यक कार्यों में दुरुपयोग और अपव्यय तो नहीं कर रहे हैं? मानव योनि को व्यर्थ में ही बर्बाद तो नहीं कर रहे हैं, ताकि भविष्य में अपनी मूर्खता पर पछताना न पड़े? जब तक अपनी क्षमताओं का सही उपयोग नहीं होगा, दु:ख और रोग के कारणों को नहीं समझा जाएगा तब तक हमारा जीवन आंदोलित, अनियन्त्रित, लक्ष्य-हीन, स्वेच्छन्द, असंयमित होने से स्थायी स्वास्थ्य प्राप्त नहीं कर सकता।





