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Thursday, July 9, 2026, 4:21 am

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अरावली पर्वतमाला पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मायने

अरावली ही थार को थामे खड़ी रहती है। राजस्थान में ये पानी की आखिरी उम्मीद है, हवा की आखिरी ढाल है और जीवन की पहली शर्त जहां से नदियां जन्म लेती हैं, जहां बादल थमता है. रेत के समंदर में एक विरासत को अपने में खामोशी से समेटने वाली अरावली की परिभाषा बदल गई है और दुनिया की सबसे पुरानी पर्वतमाला का अस्तित्व अब संकट में है।
आलेख : डॉ. राकेश वशिष्ठ, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभ लेखक 

अरावली… धरती की वो पहाड़ियां, जो करीब 2.5 अरब साल से भारत के बड़े हिस्से को रेगिस्तान से तपने से बचा रही हैं। जब थार की गर्म हवाएं भारत की छाती से टकराती हैं तब अरावली ही थार को थामे खड़ी रहती है। राजस्थान में ये पानी की आखिरी उम्मीद है, हवा की आखिरी ढाल है और जीवन की पहली शर्त जहां से नदियां जन्म लेती हैं, जहां बादल थमता है. रेत के समंदर में एक विरासत को अपने में खामोशी से समेटने वाली अरावली की परिभाषा बदल गई है और दुनिया की सबसे पुरानी पर्वतमाला का अस्तित्व अब संकट में है।

अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा ने दिल्ली से राजस्थान तक विरोध के सुर तेज कर दिए हैं। पर्यावरण कार्यकर्ताओं को डर है कि बदली हुई परिभाषा देश की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक अरावली के इकोलॉजिकल संतुलन को बिगाड़ सकती है। अरावली सिर्फ पहाड़ों की एक कतार नहीं है। ये उत्तर भारत की आखिरी प्राकृतिक ढाल है, जो रेगिस्तान को दिल्ली तक आने से रोकती है, जो जहरीली हवा को थामती है और जो जमीन के नीचे पानी को जिंदा रखती है। अरावली को लेकर सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला चर्चा में है 100 मीटर वाला फैसला सवाल उठ रहा है कि क्या इससे जंगल कटेंगे? क्या पर्यावरण को नुकसान होगा? या फिर डर जरूरत से ज़्यादा है?

सुप्रीम कोर्ट के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने असल में कहा क्या? सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि 2.5 अरब साल पुरानी दुनिया की सबसे पुराने पर्वत श्रृंखलाओं में से एक अरावली क्षेत्र में 100 मीटर से नीचे की पहाड़ियों को अपने-आप ‘जंगल’ नहीं माना जाएगा। मतलब यह कि सिर्फ इस आधार पर कि कोई पहाड़ी अरावली में है, उसे वन भूमि घोषित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा हर जमीन का फैसला रिकॉर्ड, अधिसूचना और वास्तविक स्थिति के आधार पर होगा ना कि सिर्फ ऊंचाई के पैमाने पर।

फिर विवाद क्यों?– क्योंकि इस फैसले से राज्य सरकारों और स्थानीय प्रशासन को जमीन की व्याख्या करने की ज्यादा ताकत मिल जाती है। यानी जो इलाका पहले ‘जंगल जैसा’ माना जा रहा था, अब उसे ‘राजस्व भूमि’ या ‘गैर-वन क्षेत्र’ बताया जा सकता है। यहीं से डर पैदा होता है कि कहीं इसी रास्ते से अरावली धीरे-धीरे खोखली न हो जाए।

खतरा फैसले में नहीं, उसके इस्तेमाल में है अगर जमीनी रिकॉर्ड बदले गए, पर्यावरण आकलन को नजरअंदाज किया गया और विकास के नाम पर ढील दी गई तो असर साफ होगा। दिल्ली-NCR की हवा और जहरीली, भूजल और नीचे, गर्मी और ज्यादा बेरहम होगी। हरियाणा और राजस्थान में बड़ी मात्रा में अरावली क्षेत्र राजस्व भूमि के रूप में दर्ज है। पहले इन्हें ‘जंगल जैसा क्षेत्र’ मानकर संरक्षण मिलता था। अब राज्य सरकारें तय करेंगी कि ये वन हैं या नहीं यहीं से लोगों में खतरा पैदा होता है।

अरावली की नई परिभाषा के बारे में क्या कहते हैं एक्टिविस्ट?

– एक रिपोर्ट में बताए गए एक्टिविस्ट्स के मुताबिक, नई परिभाषा से माइनिंग, कंस्ट्रक्शन और कमर्शियल एक्टिविटीज को बढ़ावा मिल सकता है, जिससे अरावली रेंज की प्राकृतिक सुंदरता नष्ट होने का खतरा बढ़ जाएगा। अरावली पर्वत श्रृंखला दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र के लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच का काम करती है, जो प्रदूषण, रेगिस्तान बनने और पानी के संकट को रोकने में अहम भूमिका निभाती है। अतः सरकार को चाहिए कि अरावली को पूरी तरह से संरक्षित क्षेत्र घोषित करे और एक सख्त और स्पष्ट संरक्षण नीति लागू करे।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor