लेखक : शिव सिंह
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एनीमिया (रक्त अल्पता) भारत के लिए सबसे बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियों में से एक बना हुआ है। इसे अक्सर “मौन संकट” कहा जाता है क्योंकि यह देश की आधी से अधिक महिलाओं और बच्चों को प्रभावित करता है, जिससे भारत की दीर्घकालिक मानव क्षमता पर सीधा असर पड़ता है।
वर्तमान परिदृश्य: आंकड़ों की नज़र से
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) और 2025-2026 के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, एनीमिया का प्रसार चिंताजनक बना हुआ है:
(अनुमानित %)
बच्चे (6-59 महीने) : 67.1%
महिलाएं (15-49 वर्ष) : 57.0%
गर्भवती महिलाएं : 52.2%
किशोरियां : 59.1
भारत में एनीमिया इतना अधिक क्यों है?
इसके पीछे पोषण संबंधी कमियों से लेकर सामाजिक-सांस्कृतिक आदतें तक कई कारण हैं:
पोषण की कमी: आयरन (लोहे) की कमी प्रमुख कारण है, लेकिन विटामिन B12 और फोलेट की कमी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
आहार संबंधी आदतें: भारतीय आहार में फाइटेट्स (अनाज में मौजूद) और टैनिन (भोजन के तुरंत बाद चाय/कॉफी) की मात्रा अधिक होती है, जो शरीर में आयरन के अवशोषण को रोकते हैं।
स्वच्छता की कमी: पेट में कीड़े होने (Worm infestations) के कारण शरीर में पोषक तत्वों की कमी और खून की हानि होती है।
शारीरिक तनाव: बार-बार गर्भधारण, बच्चों के बीच कम अंतर और भारी मासिक धर्म महिलाओं में आयरन के भंडार को खत्म कर देते हैं।
क्षेत्रीय बीमारियां: कुछ क्षेत्रों में मलेरिया, सिकल सेल एनीमिया और थैलेसेमिया जैसी बीमारियां भी इसका मुख्य कारण हैं।
सरकारी प्रयास: एनीमिया मुक्त भारत
इस समस्या से निपटने के लिए भारत सरकार ने एनीमिया मुक्त भारत (AMB) रणनीति शुरू की है। यह 6x6x6 दृष्टिकोण पर आधारित है: 6 लक्षित समूह, 6 हस्तक्षेप और 6 संस्थागत तंत्र।
मुख्य हस्तक्षेप:
IFA सप्लीमेंटेशन: बच्चों, किशोरों और गर्भवती महिलाओं को आयरन और फोलिक एसिड की गोलियां/सिरप प्रदान करना।
कृमि मुक्ति (Deworming): पोषक तत्वों के नुकसान को रोकने के लिए साल में दो बार बच्चों को कीड़े मारने की दवा देना।
खाद्य सुदृढ़ीकरण (Fortification): सरकारी योजनाओं (जैसे PDS और PM-POSHAN) के माध्यम से आयरन, फोलिक एसिड और B12 युक्त चावल और नमक का वितरण।
डिजिटल परीक्षण: ग्रामीण क्षेत्रों में तत्काल परिणामों के लिए डिजिटल हीमोग्लोबिनोमीटर का उपयोग करना।
आगे की राह: जागरूकता से कार्रवाई तक
यद्यपि सरकारी कार्यक्रम मजबूत हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर अभी भी चुनौतियां हैं। ICMR-राष्ट्रीय पोषण संस्थान (2026) के अनुसार, “स्क्रीन एंड ट्रीट” (परीक्षण और उपचार) का तरीका अधिक प्रभावी हो सकता है, जहां घर-घर जाकर जांच की जाए।
विटामिन C का महत्व: भोजन के साथ खट्टे फलों (जैसे आंवला, नींबू) का सेवन करने से शरीर में आयरन के अवशोषण की क्षमता 3 गुना तक बढ़ सकती है।
एनीमिया केवल एक चिकित्सीय समस्या नहीं है;
यह एक सामाजिक और आर्थिक मुद्दा भी है। एक एनेमिक बच्चा सीखने में पिछड़ जाता है और एक एनेमिक वयस्क कम उत्पादक होता है। इसे हराने के लिए एक “जन आंदोलन” की आवश्यकता है, जहां आहार, स्वच्छता और नियमित जांच हर घर की प्राथमिकता बन जाए।
Author: Dilip Purohit
Group Editor









