Explore

Search

Saturday, January 24, 2026, 1:10 am

Saturday, January 24, 2026, 1:10 am

LATEST NEWS
Lifestyle

विशेष साक्षात्कार… गांधी विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने स्वतंत्रता संग्राम के समय थे : डॉ. भावेन्द्र शरद जैन

— डॉ. भावेन्द्र शरद जैन, सचिव, गांधी शांति प्रतिष्ठान समिति से राइजिंग भास्कर के ग्रुप एडिटर दिलीप कुमार पुरोहित और रिपोर्टर पंकज जांगिड़ की विशेष बातचीत

जोधपुर। गांधी शांति प्रतिष्ठान समिति के वर्तमान सचिव डॉ. भावेन्द्र शरद जैन से हुई यह बातचीत केवल एक संस्था का इतिहास नहीं है, बल्कि गांधी विचारों की उस जीवंत परंपरा का दस्तावेज है, जिसने बीते सात दशकों में समाज, साहित्य, पत्रकारिता, युवाओं और लोकतांत्रिक चेतना को निरंतर दिशा दी। इस साक्षात्कार में डॉ. जैन ने न केवल गांधी शांति प्रतिष्ठान की स्थापना-यात्रा पर विस्तार से प्रकाश डाला, बल्कि इसके संस्थापक स्व. नेमिचंद्र जैन “भावुक” के व्यक्तित्व, संघर्ष और गांधीवादी आंदोलन में उनकी भूमिका को भी भावपूर्ण शब्दों में सामने रखा। गौरतलब है कि डॉ. भावेन्द्र शरद जैन स्व. नेमिचंद्र जैन भावुक के पुत्र हैं और वे भावुक साहब की विरासत को संभाले हुए हैं।

राइजिंग भास्कर : डॉ. जैन, गांधी शांति प्रतिष्ठान की स्थापना और उसके मूल उद्देश्य क्या रहे हैं?

डॉ. भावेन्द्र शरद जैन: गांधी शांति प्रतिष्ठान की स्थापना का मूल उद्देश्य गांधी विचारों को समाज के व्यापक वर्ग तक पहुंचाना रहा है। इसकी नींव स्वर्गीय नेमिचंद्र जैन “भावुक” ने सन 1956 में एक गांधी अध्ययन केंद्र के रूप में रखी थी। उस समय आज़ादी को मिले कुछ ही वर्ष हुए थे और देश को नैतिक, वैचारिक और सामाजिक दिशा की आवश्यकता थी। गांधीजी के सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह के सिद्धांत उस समय भी उतने ही जरूरी थे, जितने आज हैं।

सन 1966 में यह केंद्र औपचारिक रूप से गांधी शांति प्रतिष्ठान के रूप में प्रतिष्ठापित हुआ। इसके उद्देश्यों में गांधीवादी मूल्यों व आदर्शों की स्थापना, स्वस्थ लोकतंत्र के लिए शांतिमय व अहिंसक समाज की रचना, सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह के प्रति प्रतिबद्धता, सामाजिक समरसता और सांप्रदायिक सद्भाव की स्थापना, पर्यावरण चेतना का जागरण, सर्वोदय के विचारों का प्रचार और सद्साहित्य के माध्यम से स्वाध्याय की प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करना प्रमुख रहे हैं।

राइजिंग भास्कर : प्रतिष्ठान द्वारा कौन-कौन से प्रमुख आयोजन नियमित रूप से किए जाते हैं?

डॉ. भावेन्द्र शरद जैन: प्रतिष्ठान का प्रयास रहा है कि गांधी विचार केवल पुस्तकों तक सीमित न रहें, बल्कि जन-जीवन का हिस्सा बनें। इसी उद्देश्य से प्रतिवर्ष सर्वोदय विचार परीक्षा का आयोजन किया जाता है। 2 अक्टूबर को गांधी जयंती पर सर्वधर्म प्रार्थना सभा और व्याख्यान आयोजित होते हैं।

इसके अलावा मीरां, कबीर, सूर, तुलसी, रवीन्द्रनाथ टैगोर, आचार्य विनोबा भावे और लोकनायक जयप्रकाश नारायण जैसे महान विचारकों की जयंतियों और पुण्यतिथियों पर कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। 30 जनवरी को गांधीजी की पुण्यतिथि पर विशेष आयोजन होते हैं। साथ ही राष्ट्रीय एकता, शांति और सद्भावना शिविरों के माध्यम से युवाओं और समाज के विभिन्न वर्गों को जोड़ने का कार्य किया जाता है।

राइजिंग भास्कर : स्व. नेमिचंद्र जैन “भावुक” के व्यक्तित्व और उनके गांधीवादी सफर के बारे में कुछ बताइए।

डॉ. भावेन्द्र शरद जैन: नेमिचंद्र जैन “भावुक” का जीवन स्वयं में गांधी दर्शन की जीवंत मिसाल था। वे आज़ादी के आंदोलन के दौरान वानर सेना के सक्रिय कार्यकर्ता रहे। अजमेर बेल्ट में जब गांधीजी का प्रवास होता था, तब वे उनसे मिलने जाते, घंटों उनके साथ रहते और उनके विचारों से गहरे प्रभावित होते।

भावुक जी भावनात्मक रूप से आचार्य विनोबा भावे से भी अत्यंत प्रेरित थे। विनोबा जी की राजस्थान पदयात्रा के दौरान वे महीनों तक उनके साथ प्रेस अटैची के रूप में जुड़े रहे। भूदान आंदोलन के वे प्रबल समर्थक थे और उसे केवल आंदोलन नहीं, बल्कि सामाजिक पुनर्रचना का माध्यम मानते थे।

राइजिंग भास्कर : साहित्य और पत्रकारिता में उनकी भूमिका कैसी रही?

डॉ. भावेन्द्र शरद जैन: भावुक साहब बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। वे अंतर प्रांतीय कुमार साहित्य परिषद के संस्थापक रहे। उस दौर में डॉ. देवराज उपाध्याय और डॉ. लक्ष्मीमल्ल सिंघवी जैसे विद्वान जीवनपर्यंत संस्थान से जुड़े रहे। वे राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर की प्रशासनिक समितियों में भी मनोनीत हुए।

हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए उन्होंने राष्ट्रभाषा प्रज्ञा समिति, वर्धा के माध्यम से लंबे समय तक कार्य किया। जोधपुर की प्रसिद्ध राठी बुक हाउस (मोहनपुरा पुलिया) में उन्होंने मैनेजर के रूप में भी कार्य किया, जो उस समय ज्ञान और साहित्य का बड़ा केंद्र थी। पत्रकारिता से उनका जुड़ाव लगभग 35 वर्षों तक रहा। वे बीबीसी सुनते, राष्ट्रीय समाचार पत्रों का अध्ययन करते और नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान तथा धर्मयुग के लिए पश्चिमी राजस्थान से समाचार भेजते थे। उन्होंने पत्रकारिता की एक पूरी पीढ़ी तैयार की—गौतम भंडारी, विज्ञान मोदी, माणक चौपड़ा, कल्याण कोठारी, पदम मेहता जैसे अनेक पत्रकार उनके सान्निध्य में सीखकर आगे बढ़े।

राइजिंग भास्कर : गांधी शांति प्रतिष्ठान का भौतिक विकास कैसे हुआ?

डॉ. भावेन्द्र शरद जैन: 1960 के बाद गांधी शांति प्रतिष्ठान दिल्ली से संबद्ध होकर जोधपुर के हृदय स्थल सोजती गेट स्थित हैदर बिल्डिंग में सक्रिय हुआ। वहां कार्यालय के साथ वाचनालय और पुस्तकालय का संचालन भी हुआ, जिसे भावुक साहब स्वयं कार्यकर्ताओं के साथ संभालते थे।

सन 2002 में प्रतिष्ठान को रेजिडेंसी रोड, जोधपुर पर सरकार द्वारा भूमि और भवन आवंटित किया गया। तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत स्वयं जोधपुर आए और गांधी शांति प्रतिष्ठान समिति को यह भूमि-भवन निशुल्क आवंटित किया। यह गांधी विचारों के प्रति राज्य की प्रतिबद्धता का भी प्रतीक था।

राइजिंग भास्कर : आपने भावुक साहब से जुड़े कुछ अनछुए किस्सों का भी ज़िक्र किया था?

डॉ. भावेन्द्र शरद जैन: हाँ, ऐसे कई प्रसंग हैं जो उनके चरित्र की ऊंचाई को दर्शाते हैं। एक प्रसंग में, वे कभी किसी से आर्थिक सहायता नहीं मांगते थे। इसी कारण उन पर कर्ज भी चढ़ गया। तब शहर के एडवोकेट रिखबदास कर्णावट ने एक समिति बनाई और टाउन हॉल में जस्टिस बैरी की उपस्थिति में एक समारोह आयोजित कर सम्मानपूर्वक उन्हें राशि भेंट की। जनभावना का सम्मान करते हुए भावुक साहब ने वह राशि केवल संस्थागत कार्यों के लिए स्वीकार की।

दूसरा किस्सा राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री मोहनलाल सुखाड़िया से जुड़ा है। उनके 53वें जन्मदिवस पर जनाना गार्डन में 53 हजार रुपये भेंट किए गए। सुखाड़िया जी ने वह राशि गांधी शांति प्रतिष्ठान के लिए भावुक साहब को सौंप दी और कहा कि इसे गांधीवादी कार्यों में लगाइए। भावुक साहब ने इसे भी जनभावना के सम्मान में स्वीकार किया।

राइजिंग भास्कर : युवाओं के साथ गांधी शांति प्रतिष्ठान का जुड़ाव कैसा रहा?

डॉ. भावेन्द्र शरद जैन: राष्ट्रीय युवा योजना, नई दिल्ली के निदेशक एस.एन. सुब्बाराव के नेतृत्व में जीवनपर्यंत राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय युवा शिविर आयोजित हुए। जोधपुर केंद्र से युवाओं का चयन कर उन्हें भेजा जाता था। इन शिविरों में 25 से अधिक राज्यों के 18 से 35 वर्ष के युवा भाग लेते थे।

हर शाम विभिन्न प्रदेशों के युवा अपनी-अपनी भाषाओं में सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत करते थे। इन शिविरों में भाग लेने वालों में गीता भट्टाचार्य, अशोक गहलोत, जालमसिंह टॉक, यशपाल सिंघवी, पुखराज सोनगरा, संध्या शुक्ला, राकेश गांधी, धर्मेश रुदिया, गिरधारी सिंह बाफना जैसे अनेक नाम शामिल रहे।

राइजिंग भास्कर : भावुक साहब के जीवन का संक्षिप्त परिचय?

डॉ. भावेन्द्र शरद जैन: नेमिचंद्र जैन “भावुक” का जन्म 25 जुलाई 1928 को जोधपुर में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा उन्होंने विजयनगर, आंध्रप्रदेश में तेलुगू और अंग्रेज़ी माध्यम से प्राप्त की। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान विशाखापट्टनम और विजयवाड़ा पर जापानी बमबारी के कारण वे जोधपुर लौटे और 1941 में सरदार विद्यालय में प्रवेश लिया। उन्होंने 1948 में हिंदी साहित्य सम्मेलन से विशारद और साहित्य रत्न, 1952 में हिंदी विद्यापीठ देवघर (बिहार) से साहित्यकार परीक्षा उत्तीर्ण की। उन्हें विद्यावाचस्पति की मानद उपाधि से भी सम्मानित किया गया।

राइजिंग भास्कर : आज के संदर्भ में गांधी शांति प्रतिष्ठान की भूमिका को आप कैसे देखते हैं?

डॉ. भावेन्द्र शरद जैन: आज जब समाज में हिंसा, असहिष्णुता और वैचारिक विभाजन बढ़ रहा है, तब गांधी विचार और भी अधिक प्रासंगिक हो गए हैं। गांधी शांति प्रतिष्ठान का प्रयास है कि हम नई पीढ़ी को सत्य, अहिंसा, संवाद और सह-अस्तित्व के मूल्यों से जोड़ें। यह प्रतिष्ठान केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा है। भावुक साहब ने जो बीज बोया था, उसे आगे बढ़ाना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।

 

 

 

 

 

 

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor