उनकी सेवा में न प्रचार की भूख है, न पुरस्कार की लालसा। उन्हें कई सम्मान और अवार्ड मिल चुके हैं, लेकिन वे मानती हैं कि असली पुरस्कार किसी जरूरतमंद के चेहरे पर आई मुस्कान है। वे अवार्ड के लिए नहीं, बल्कि इंसानियत के लिए काम करती हैं।
दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर
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जनवरी की ठिठुरन जब हड्डियों तक उतर आती है, तब फुटपाथ पर सोते बच्चे, महिलाएँ और बुजुर्ग केवल ठंड से ही नहीं, बल्कि उपेक्षा से भी कांपते हैं। शहर की रफ्तार में अक्सर उनकी कराह अनसुनी रह जाती है। लेकिन इसी ठंड, इसी अंधेरे और इसी बेबसी के बीच एक ऐसा उजाला है, जो बिना शोर किए, बिना किसी बैनर या मंच के, चुपचाप मानवता की सेवा में जुटा रहता है। यह उजाला है—समाजसेवी मंजू गहलोत।
मंजू गहलोत कोई संस्था नहीं चलातीं, न ही किसी एनजीओ की पदाधिकारी हैं। फिर भी वे स्वयं में एक चलती-फिरती संस्था हैं। उनके हाथों में कंबल है, दिल में करुणा है और जीवन में एक ही संकल्प—जहाँ जरूरत हो, वहाँ पहुँच जाना।
सेवा का अर्थ: दिखावा नहीं, संवेदना
मंजू गहलोत के लिए समाजसेवा कोई औपचारिक कार्य नहीं, बल्कि जीवन की स्वाभाविक धड़कन है। वे कहती हैं—
“सेवा मेरे लिए काम नहीं, शौक है… और यह शौक अब जुनून बन चुका है।”
उनकी सेवा में न प्रचार की भूख है, न पुरस्कार की लालसा। उन्हें कई सम्मान और अवार्ड मिल चुके हैं, लेकिन वे मानती हैं कि असली पुरस्कार किसी जरूरतमंद के चेहरे पर आई मुस्कान है। वे अवार्ड के लिए नहीं, बल्कि इंसानियत के लिए काम करती हैं।
ठंड में कंबल नहीं, स्नेह भी बाँटती हैं
जब सर्द हवाएँ गलियों में सिसकियाँ भरती हैं, तब मंजू गहलोत फुटपाथों, कच्ची बस्तियों और झुग्गी-झोपड़ियों में पहुँचती हैं।
वे केवल कंबल या बिस्तर नहीं देतीं—
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वे बच्चों के सिर पर हाथ फेरती हैं
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बुजुर्गों से हालचाल पूछती हैं
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महिलाओं को यह भरोसा देती हैं कि वे अकेली नहीं हैं
उनकी सेवा में वस्तु से अधिक भाव होता है। शायद यही कारण है कि लोग उन्हें देखकर राहत महसूस करते हैं।
मकर संक्रांति पर सेवा का संकल्प
मकर संक्रांति जैसे पर्व पर, जब अधिकांश लोग उत्सव और दान को औपचारिकता तक सीमित रखते हैं, मंजू गहलोत ने पाक विस्थापित बस्तियों में जाकर सेवा कार्य किया।
वहाँ उन्होंने—
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जरूरतमंदों को वस्त्र दिए
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भोजन की व्यवस्था की
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बच्चों को पर्व का आनंद दिलाया
उनका मानना है—“त्योहार तभी सार्थक है, जब सबसे आखिरी व्यक्ति तक उसकी खुशी पहुँचे।”
बुजुर्ग: सबसे उपेक्षित, सबसे प्रिय
मंजू गहलोत के सेवा कार्यों का सबसे संवेदनशील पक्ष है—बुजुर्गों के प्रति उनका समर्पण। वे मानती हैं कि समाज का सबसे उपेक्षित वर्ग बुजुर्ग हैं। जिन हाथों ने जीवनभर परिवार को संभाला, वही हाथ अंत में खाली रह जाते हैं।
इसी सोच के साथ वे—
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हर महीने वृद्धाश्रम में भोजन की व्यवस्था करती हैं
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बुजुर्गों के सम्मान कार्यक्रम आयोजित करती हैं
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सांस्कृतिक आयोजन कर उनके मन को प्रसन्न करती हैं
उनके लिए सेवा केवल पेट भरना नहीं, बल्कि मन को सुकून देना है। बुजुर्गों की मुस्कान ही उनके लिए सबसे बड़ा सम्मान है।
अनाथ बच्चों के लिए अपनापन
मंजू गहलोत अनाथालयों, स्लम क्षेत्रों और कच्ची बस्तियों में नियमित रूप से जाती हैं।
वे बच्चों को—
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सूखा राशन
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उपयोगी वस्तुएँ
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त्योहारी सामग्री
तो देती ही हैं, साथ ही जो सबसे जरूरी है—अपनापन—वह भी देती हैं। वे अपना जन्मदिन, परिवार के बच्चों के जन्मदिन और त्योहार इन्हीं बच्चों के साथ मनाती हैं।
उनका कहना है—
“दान से ज्यादा जरूरी है स्नेह। बच्चे नए कपड़ों से ज्यादा प्यार के भूखे होते हैं।”
कुष्ठ रोगी और बेसहारा: जहाँ पहुँचना कठिन है
जहाँ अधिकांश लोग सेवा की राह में भीड़ चुनते हैं, मंजू गहलोत वहाँ जाती हैं, जहाँ जाना साहस मांगता है।
वे नियमित रूप से—
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कुष्ठ आश्रम
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अपना घर आश्रम
जाती हैं।
वहाँ वे केवल सामान नहीं देतीं, बल्कि उनके साथ बैठती हैं, बातें करती हैं, उन्हें यह एहसास दिलाती हैं कि वे समाज से कटे हुए नहीं हैं। यही उनकी सेवा को असाधारण बनाता है।
हर अवसर, सेवा का अवसर
मंजू गहलोत का जीवन यह सिखाता है कि सेवा के लिए अलग समय नहीं निकालना पड़ता, बल्कि जीवन के हर अवसर को सेवा से जोड़ा जा सकता है।
चाहे—
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जन्मदिन हो
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कोई त्योहार हो
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कोई पारिवारिक खुशी
हर खुशी वे वंचितों के साथ बाँटती हैं। उनके लिए पूजा-पाठ का अर्थ है—जरूरतमंद की मदद।
संस्कृति और सेवा का सुंदर संगम
मंजू गहलोत केवल सामाजिक सेवा तक सीमित नहीं हैं। वे राजस्थान की लोक-संस्कृति, तीज-त्योहार और पारंपरिक उत्सवों को निशुल्क आयोजित कर नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ती हैं।
उनका उद्देश्य है—
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संस्कृति का संरक्षण
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सामाजिक जुड़ाव
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सामूहिक आनंद
अवार्ड नहीं, जिम्मेदारी
समाजसेवी मंजू गहलोत को—
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सारथी यूथ फाउंडेशन द्वारा कर्मवीर अवार्ड
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वुमन पॉवर सोसायटी, जयपुर द्वारा नारी शक्ति वंदन अवार्ड
जैसे सम्मान मिल चुके हैं।
ये अवार्ड उनके सेवा कार्यों—वृद्धाश्रम, कच्ची बस्तियों, बच्चों और जरूरतमंदों के लिए—का प्रमाण हैं। लेकिन वे कहती हैं—
“सम्मान मुझे नहीं, सेवा को मिलना चाहिए।”
महिला सशक्तिकरण से पर्यावरण तक
मंजू गहलोत के सेवा क्षेत्र बहुआयामी हैं—
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बच्चों की शिक्षा
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बाल संरक्षण अधिकार
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महिला सशक्तिकरण
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स्वास्थ्य
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पर्यावरण
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कला, नृत्य और मनोरंजन
इन सभी क्षेत्रों में उन्हें सेवा का अवसर मिलता है और यही उनके जीवन की सबसे बड़ी खुशी है।
हर इंसान एक संस्था
मंजू गहलोत का सबसे बड़ा संदेश है—“हर इंसान अपने आप में एक संस्था है।” उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि—
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संस्था का नाम नहीं
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संसाधनों की भरमार नहीं
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प्रचार की आवश्यकता नहीं
बल्कि निस्वार्थ भाव, करुणा और संकल्प ही समाज बदलते हैं।
सेवा ही परम धर्म : जब तक सांस है, सेवा जारी रहेगी
मंजू गहलोत सचमुच समाज के उन दुर्लभ व्यक्तित्वों में से हैं, जिन्होंने यह साबित कर दिया कि सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है।
वे कहती हैं—“मैं कोई संस्था नहीं हूँ, लेकिन मेरी आत्मा सेवा है। जब तक साँस है, सेवा जारी रहेगी।”
उनकी जीवन यात्रा हमें यह सिखाती है कि—
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हर मुस्कुराता चेहरा एक पुरस्कार है
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हर मदद एक पूजा है
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और हर संवेदनशील दिल समाज बदल सकता है
मंजू गहलोत—एक नाम नहीं, एक विचार; एक व्यक्ति नहीं, एक प्रेरणा; और सच में, स्वयं में एक संपूर्ण संस्थान।
Author: Dilip Purohit
Group Editor









