इंसाफ जुनेजा : इंसाफ संस्थान की स्थापना केवल एक संगठन बनाने के लिए नहीं की गई थी, बल्कि यह एक आंदोलन की शुरुआत थी। “हमारा उद्देश्य समाज में कला और विरासत संरक्षण के प्रति जागरूकता पैदा करना है। सिंधी समाज की हस्तकला, जिसे आम भाषा में ‘भरत’ कहा जाता है, हमारी पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। यह कला पीढ़ी दर पीढ़ी महिलाओं द्वारा सुई और धागे के माध्यम से संजोई जाती रही है। पहले एक मां अपनी बेटी के विवाह के समय अपने हाथों से बनाई गई चीजें भेंट स्वरूप देती थी, जिसमें उसका स्नेह, संस्कार और संस्कृति झलकती थी। लेकिन आधुनिक और व्यावसायिक दौर में यह परंपरा धीरे-धीरे छूटती चली गई। इसी कला को फिर से समाज के दिलों में बसाने के लिए हमने इंसाफ संस्थान की नींव रखी।”
राइजिंग भास्कर : सिंधी हस्तकला के संरक्षण के लिए आपने क्या पहल की?
इंसाफ जुनेजा: वर्ष 2017 में बुचैटी गांव में एक अनूठी पहल की गई। “हमने देखा कि सिंधी युवाओं की कई पीढ़ियां इस कला से दूर हो चुकी थीं। उन्हें अपनी ही विरासत की जानकारी नहीं थी। तब हमने एक कार्यशाला का आयोजन किया, जो प्रतिदिन दो वर्षों तक लगातार चली। इसमें बाड़मेर से उत्कृष्ट कारीगरों को बुलाया गया, जिन्होंने कशीदाकारी, आरीतारी, सूफ और खारक जैसी पारंपरिक कशीदाकलाओं का प्रशिक्षण दिया। आज इसका परिणाम यह है कि गांव के बच्चे और बच्चियां चमचमाते, प्लास्टिक आधारित व्यावसायिक कपड़ों को छोड़कर पारंपरिक डिजाइनों के साथ नई वेशभूषा को अपनाना ज्यादा पसंद कर रहे हैं।”
लोगों आंखों में गर्व की चमक साफ दिखाई देती है। यह पहल केवल कला तक सीमित नहीं रही, बल्कि लोगों की जीवनशैली में भी बदलाव लेकर आई।
राइजिंग भास्कर : आधुनिक फैशन और पारंपरिक कपड़ों के बीच संतुलन कैसे बनाया जा सकता है?
इंसाफ जुनेजा : फैशन और परंपरा एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। “हमने लोगों को यह समझाने की कोशिश की कि प्राकृतिक अजरक वाले कपड़े न केवल पर्यावरण के लिए बेहतर हैं, बल्कि स्वास्थ्य के लिहाज से भी सुरक्षित हैं। चमचमाते, प्लास्टिक आधारित कपड़ों से सांस के माध्यम से छोटे-छोटे कण शरीर में चले जाते हैं, जो स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालते हैं। इसके विपरीत, पारंपरिक कपड़े प्राकृतिक होते हैं और शरीर को राहत देते हैं। जब लोगों ने यह समझा, तो उनका रुझान स्वतः ही वापस अपनी जड़ों की ओर लौट आया।”
राइजिंग भास्कर : आपकी संस्था केवल हस्तकला तक सीमित नहीं है, अन्य क्षेत्रों में भी काम कर रही है। इसके बारे में बताइए।
इंसाफ जुनेजा : इंसाफ संस्थान का दायरा बहुत व्यापक है। “हम केवल कढ़ाई और वस्त्रों तक सीमित नहीं हैं। सिंधी समाज की मौखिक परंपराएं जैसे गीत, संगीत, लोक कहावतें, दोहे, वंशावली और शोभराज जैसी विधाओं को भी संरक्षित करने का प्रयास कर रहे हैं। पहले इन कलाओं को ढोने वाले लोगों को समाज में निम्न दृष्टि से देखा जाता था, लेकिन हम चाहते हैं कि नई पीढ़ी इन कलाकारों को सम्मान की दृष्टि से देखे। कला केवल मनोरंजन नहीं है, यह समाज की आत्मा होती है।”
संस्था का एक प्रमुख उद्देश्य यह भी है कि कला के प्रति एक सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित किया जाए, ताकि युवा पीढ़ी इसे गर्व के साथ अपनाए और आगे बढ़ाए।
राइजिंग भास्कर : पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में आपकी संस्था का क्या योगदान है?
इंसाफ जुनेजा : हमारी सोच केवल सांस्कृतिक संरक्षण तक सीमित नहीं है। “हमने पुराणिक ज्ञान से जैविक खेती और गौचर भूमि के पुनर्निर्माण के महत्व को समझा। हमारा मानना है कि पर्यावरण संरक्षण केवल पंचायत या सरकार की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। इसी सोच के तहत हमने लोगों को घर पर ही बीज संरक्षण की पौराणिक विधियां सिखाईं और इसके लिए विशेष कार्यशालाएं आयोजित कीं।”
बीज संरक्षण न केवल खेती को आत्मनिर्भर बनाता है, बल्कि जैव विविधता को भी सुरक्षित रखता है। यह प्रयास आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वस्थ और संतुलित पर्यावरण का आधार तैयार करता है।
राइजिंग भास्कर : वंशावली संरक्षण पर काम करने की प्रेरणा कहां से मिली?
इंसाफ जुनेजा : “वंशावली केवल नामों की सूची नहीं होती, यह समाज का इतिहास होती है। हमने महसूस किया कि लोग अपनी जड़ों से कटते जा रहे हैं। इसलिए हमने सिंधी मुस्लिम समाज के कई वर्गों की वंशावली चार्ट का निर्माण किया। इसके माध्यम से लोक कहानियों को भी संरक्षित करने का प्रयास किया गया।”
संस्था ने इस विषय पर कई बड़े-बड़े लोगों के साथ कार्यशालाएं आयोजित कीं, जिससे समाज में अपनी विरासत के प्रति जागरूकता बढ़ी। “जब लोग अपने पूर्वजों के बारे में जानते हैं, तो उन्हें अपनी पहचान पर गर्व होता है,”
राइजिंग भास्कर : आपकी संस्था का संचालन मुख्य रूप से ग्रामीण महिलाएं करती हैं। इसके पीछे क्या सोच है?
इंसाफ जुनेजा : इंसाफ संस्थान की रीढ़ ग्रामीण महिलाएं हैं। “महिलाएं ही हमारी परंपराओं की असली वाहक हैं। उन्होंने ही सदियों से कला, संस्कृति और संस्कारों को संभालकर रखा है। इसलिए हमने तय किया कि संस्था का संचालन भी उन्हीं के हाथों में होगा। इससे न केवल उन्हें आत्मनिर्भरता मिलती है, बल्कि समाज में उनकी भूमिका भी मजबूत होती है।”
आज कई महिलाएं न केवल कला सिखा रही हैं, बल्कि कार्यशालाओं का संचालन भी कर रही हैं। यह बदलाव समाज में एक नई सोच को जन्म दे रहा है।
राइजिंग भास्कर : इंसाफ संस्थान के भविष्य की क्या योजनाएं हैं?
इंसाफ जुनेजा : मेरा सपना है कि इंसाफ संस्थान एक मॉडल बने, जिसे अन्य समाज और क्षेत्र भी अपनाएं। “हम चाहते हैं कि हमारी पहल केवल एक गांव या एक समाज तक सीमित न रहे। हम चाहते हैं कि देश के अन्य हिस्सों में भी लोग अपनी कला, संस्कृति और पर्यावरण के संरक्षण के लिए आगे आएं। भविष्य में हम डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से भी अपनी कार्यशालाओं और सामग्री को व्यापक स्तर पर उपलब्ध कराने की योजना बना रहे हैं।”
राइजिंग भास्कर : समाज के लिए आपका संदेश क्या है?
इंसाफ जुनेजा : “समाज की पहचान उसकी संस्कृति से होती है। अगर हम अपनी कला, परंपराओं और पर्यावरण को खो देंगे, तो हमारी आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी। हमें यह समझना होगा कि संरक्षण केवल एक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि एक कर्तव्य है।”
संस्थान ने समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य किया :
इंसाफ संस्थान और उसके संस्थापक इंसाफ जुनेजा की यह यात्रा एक प्रेरणा है। यह दिखाती है कि अगर सोच सकारात्मक हो और उद्देश्य स्पष्ट, तो सीमित संसाधनों के बावजूद भी बड़े बदलाव लाए जा सकते हैं। सिंधी हस्तकला से लेकर पर्यावरण संरक्षण और वंशावली के संवर्धन तक, इंसाफ संस्थान ने समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य किया है।
आज जब दुनिया तेजी से आधुनिकता की ओर बढ़ रही है, ऐसे में इंसाफ जुनेजा जैसे लोग हमें यह याद दिलाते हैं कि प्रगति का असली अर्थ अपनी विरासत को साथ लेकर चलना है, न कि उसे पीछे छोड़ देना। इंसाफ संस्थान न केवल एक संस्था है, बल्कि यह एक आंदोलन है, जो समाज को उसकी पहचान से जोड़ने का काम कर रहा है। इंसाफ जुनेजा ने बताया कि जिन लोगों की लोक कला संरक्षण व वंशावली संवर्धन में रुचि है वे 9694242020 पर संपर्क कर सकते हैं।
Author: Dilip Purohit
Group Editor






