Explore

Search

Thursday, July 9, 2026, 3:49 am

Thursday, July 9, 2026, 3:49 am

LATEST NEWS

The specified slider does not exist.

Lifestyle

प्रेस प्रिव्यू में राजस्थान की झांकी बनी आकर्षण का केन्द्र

“मरुस्थल का स्वर्ण स्पर्श” विषय पर बीकानेर की उस्ता कला का भव्य प्रदर्शन

शिव वर्मा. जयपुर

गणतंत्र दिवस समारोह के अवसर पर कर्तव्य पथ पर प्रस्तुत की जाने वाली “राजस्थान: मरुस्थल का स्वर्ण स्पर्श” विषयक राजस्थान की झांकी गुरुवार सायं दिल्ली कैंट स्थित आर.आर. कैम्प रंगशाला में आयोजित प्रेस प्रिव्यू के दौरान सभी के आकर्षण का केंद्र बनी। बीकानेर की विश्वविख्यात उस्ता कला को केन्द्र में रखकर तैयार की गई इस झांकी ने अपनी विशिष्ट शिल्पकला, सांस्कृतिक वैभव और जीवंत प्रस्तुति से दर्शकों का मन मोह लिया।

झांकी के अग्र भाग में राजस्थान के प्रसिद्ध लोक वाद्य रावणहट्टा का वादन करते कलाकार की 180 डिग्री घूमती प्रतिमा प्रदर्शित की गई है। इसके दोनों ओर उस्ता कला से सजी सुराही, कुप्पी और दीपक आकर्षक फ्रेमों में लगाए गए हैं। झांकी का यह भाग लगभग 13 फीट ऊँचा है। ट्रेलर भाग में उस्ता कला से अलंकृत घूमती हुई पारंपरिक कुप्पी तथा हस्तशिल्प पर कार्य करते कारीगरों के दृश्य प्रदर्शित किए गए हैं, जो इस कला की जीवंत परंपरा को दर्शाते हैं। पृष्ठभाग में विशाल ऊँट और ऊँट सवार की प्रतिमा राजस्थान की मरुस्थलीय संस्कृति एवं लोक जीवन का सशक्त प्रतीक है। दोनों ओर उस्ता कला से सजे मेहराबों में पत्तेदार स्वर्ण कारीगरी के उत्कृष्ट उदाहरण भी प्रदर्शित किए गए हैं।

झांकी के चारों ओर गेर लोक नृत्य प्रस्तुत करते कलाकारों ने राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान को और अधिक प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत किया। कुल मिलाकर यह झांकी पारंपरिक कला, लोक संस्कृति और शाही विरासत का सजीव संगम बनकर सामने आई।

झांकी के डिजाइनर एवं पर्यवेक्षक हर शिव कुमार शर्मा ने बताया कि 23 जनवरी को फुल ड्रेस रिहर्सल तथा 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के मुख्य समारोह में कर्तव्य पथ पर निकलने वाली केन्द्र एवं राज्यों की झांकियों में राजस्थान की यह झांकी बीकानेर की उस्ता कला का भव्य प्रदर्शन करेगी। राजस्थान ललित कला अकादमी के सचिव डाॅ. रजनीश हर्ष ने बताया कि इस झांकी का निर्माण राज्य की उप मुख्यमंत्री एवं पर्यटन, कला एवं संस्कृति मंत्राी दिया कुमारी, अतिरिक्त मुख्य सचिव प्रवीण गुप्ता तथा उप सचिव अनुराधा गोगिया के मार्गदर्शन में किया गया है।

उल्लेखनीय है कि उस्ता कला ऊँट की खाल पर की जाने वाली स्वर्ण जड़ाई की पारंपरिक शाही कला है, जिसकी उत्पत्ति ईरान में मानी जाती है। इसका विकास मुगल काल में हुआ तथा बीकानेर के महाराजा राय सिंह के शासनकाल में यह कला बीकानेर पहुँची, जहाँ स्थानीय कारीगरों ने इसे विशिष्ट पहचान दिलाई। इस कला में 24 कैरेट स्वर्ण पत्रा एवं प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जाता है। वर्तमान में इसका विस्तार लकड़ी, संगमरमर, कांच एवं दीवारों तक हो चुका है। बीकानेर की उस्ता कला को भौगोलिक संकेतक (जीआई टैग) भी प्राप्त है, जो इसकी मौलिकता और सांस्कृतिक महत्व को प्रमाणित करता है।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor