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Sunday, August 23, 2026, 7:18 am

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Lifestyle

चिट्‌ठी आई है…रामानंद काबरा

चिठ्ठी आई है…

(भाग–2 : संबंध)

कभी रिश्ते
ज़रूरत से नहीं,
ज़रूरत रिश्तों से पैदा होती थी।
आज स्थिति उलटी है—
रिश्ते तभी स्वीकार्य हैं
जब वे हमारी सुविधा में फिट बैठें।

आज के युवा से पूछिए—
“शादी क्यों नहीं कर रहे?”
उत्तर तैयार हैं—
फील नहीं आ रही…
अंडरस्टैंडिंग नहीं बन रही…
पहले करियर सेट हो जाए…
अभी खुद को समझ रहे हैं…
ये तर्क
गलत नहीं हैं,
पर अधूरे हैं।
क्योंकि सच यह है—
हम बंधन से नहीं,
जिम्मेदारी से डरने लगे हैं।

शादी अब
सहयात्रा नहीं,
एक प्रोजेक्ट बन गई है।
जहाँ—हर भावना का ROI है
हर समझौते का हिसाब
और हर मतभेद का Exit Option
थोड़ी असहमति आए
तो “स्पेस” चाहिए,
थोड़ा कष्ट आए
तो “ब्रेक” चाहिए।
रुककर
साथ निभाने की क्षमता
धीरे–धीरे
हमसे छूटती जा रही है।

हम कहते हैं—
हम आधुनिक हैं…
पर शायद हम
बस असहिष्णु होते जा रहे हैं।
सहनशीलता
पुरानी पीढ़ी की कमजोरी
मान ली गई है।
जबकि सच यह है—
रिश्ते सहनशीलता से ही
गहरे होते हैं।

आज विवाह की उम्र बढ़ रही है।
और उम्र के साथ
डर भी।
डर— कि कहीं स्वतंत्रता कम
न हो जाए, कि कहीं जीवन
किसी और की प्राथमिकताओं
से न भर जाए। और इसी डर से
हम निर्णय टालते रहते हैं।
पर जीवन टालने से नहीं,
निर्णय लेने से आगे बढ़ता है।
रिश्ते परफेक्ट होने से नहीं,
परस्पर स्वीकार से
जीवित रहते हैं।
पर यह स्वीकार
अब हमारी शब्दावली से
धीरे–धीरे गायब होता जा रहा है।

शायद इसीलिए
आज प्रेम है,
पर स्थायित्व नहीं।
साथ है,
पर भरोसा नहीं।
और यही अधूरापन
मन को
अकेलेपन की ओर
धकेलता चला जाता है।

हम रिश्ते इसलिए नहीं खो रहे
कि वे कठिन हैं,बल्कि इसलिए
कि हमने उन्हें निभाना छोड़ दिया है।

 

रामानंद काबरा
9414070142

(क्रमशः — भाग–3 : जड़ें)

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor