जोधपुर। जैन श्वेताम्बर खरतरगच्छ परंपरा के प्रथम दादागुरु जिनदत्तसूरि की स्मृति में आगामी 6 से 8 मार्च 2026 को जैसलमेर में आयोजित होने जा रहा चादर महोत्सव श्रद्धा, इतिहास और सामूहिक सांस्कृतिक चेतना का एक ऐतिहासिक आयोजन होगा। यह जानकारी आज जोधपुर में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में दी गई।
प्रवक्ताओं ने बताया कि यह महोत्सव केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि दादागुरूदेव जिनदत्तसूरि की स्राधना, करुणा और सामाजिक संतुलन की परंपरा को समर्पित एक जीवंत सांस्कृतिक पर्व है। ये चादर आज श्रद्धालुओं के लिए विघ्नहर्ता और कल्याणकारी आस्था का केंद्र बनी हुई है।
ऐतिहासिक रूप से यह चादर अजमेर से अन्हिलपुर पाटन (गुजरात) ले जाई गई थी। लगभग 150 वर्ष पूर्व जैसलमेर में महामारी फैलने पर जैसलमेर के महारावल के निवेदन पर यह चादर जैसलमेर लाई गई, जिसके बाद से यह जैसलमेर के ज्ञान भंडार में सुरक्षित संरक्षित है। दादागुक्रू के स्वर्गवास के 871 वर्ष पश्चात प्रथम बार इस चादर का विधिवत अभिषेक जैसलमेर में किया जाएगा।
महोत्सव परम पूज्य गच्छाधिपति आचार्य श्री मणिप्रभ सूरीश्वर जी महाराज, अन्य पूज्य आचार्यों, शताधिक जैन साधु-साध्वियों तथा वैदिक परंपरा के लगभग 200 संतों के सान्निध्य में संपन्न होगा। देश-विदेश से 15 से 20 हजार श्रद्धालुओं की सहभागिता अपेक्षित है।
मार्च को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के परम पूज्य सरसंघ चालक श्री मोहनराव भागवत जी इस ऐतिहासिक आयोजन का उद्घाटन करेंगे। 7 मार्च को भव्य वरघोडे के साथ चादर को महोत्सव स्थल पर लाया जाएगा, जहाँ श्रद्वालुओं द्वारा विधिपूर्वक अभिषेक किया जाएगा। इसी अवसर पर संपूर्ण विश्व में 1 करोड़ 8 लाख भक्तों द्वारा सामूहिक दादागुरु इकतीसा का पाठ किया जाएगा। 8 मार्च को पूज्य उपाध्याय श्री महेन्द्रसागर जी महाराज को आचार्य पद प्रदान किया जाएगा।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह भी रेखांकित किया गया कि दादागुरू श्री जिनदत्तसूरि 11-12वीं शताब्दी केवल जैन आचार्य ही नहीं, बल्कि मध्यकालीन भारत में सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक एकात्मता और नैतिक पुनर्निर्माण के प्रमुख स्तंभ थे। राजस्थान और गुजरात के सामाजिक जीवन में उनका स्थान यही रहा है. जो अद्वैत परंपरा में आदि शंकराचार्य और गुजरात में आचार्य हेमचंद्र का माना जाता है।अजमेर के चौहान शासक अर्णोराज सहित अनेक राजपूत शासक उनके प्रति श्रद्धावान थे। उनके उपदेशों ने क्षत्रिय समाज में संयम्, मर्यादा और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना को सुद्ध द किया। साथ ही उन्होंने समाज के वंचित और हाशिये पर खड़े वर्गों को भी सास्कृतिक सम्मान और नैतिक संरक्षण प्रदान किया। महोत्सव के अंतर्गत “भारतीय सांस्कृतिक एकात्मत्ता एवं सामाजिक समरसता में दादागुरू परंपरा का योगदान विषय पर एक विद्वत संगोष्ठी का आयोजन भी किया जाएगा, जिसमें देशभर के विद्वान, शीधार्थी और सामाजिक चितक सहभागिता करेंगे। प्रवक्ताओं ने कहा कि देश-विदेश में फैली हजारों दादावाड़ियों आज भी दादागुरू जिनदत्तसूरि की विरासत की साक्षी हैं, जहाँ लाखों श्रद्धालु दर्शन कर अपने को धन्य मानते है। चादर महोत्सव इसी जीवित परंपरा का एक ऐतिहासिक और प्रेरक उद्घोष है।








