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Thursday, July 9, 2026, 5:32 am

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Lifestyle

पहला दीपक कौन जलाएगा? : डॉ. रामानंद काबरा

युवा-जागरण विशेष लेख : डॉ. रामानंद काबरा

इतिहास तलवारों से नहीं बदलता

इतिहास तलवारों से नहीं बदला।
इतिहास बदला है साधारण लोगों के असाधारण रूप से एक साथ खड़े हो जाने से।
यह लेख भाषण नहीं है।
यह आईना है।
और यह सवाल पूछता है—
क्या हम अभी भी सोए हुए हैं?

एक अँधेरे गाँव में हर घर यही कहता था—
“अँधेरा बहुत है, अकेला दीपक क्या करेगा?”
एक बच्चे ने दीया जलाया।
फिर दूसरे ने।
फिर तीसरे ने।
कुछ ही देर में पूरा गाँव रोशन था।
अँधेरा कभी बड़ा नहीं होता,
हमारी निष्क्रियता बड़ी होती है।
समाज बदलने के लिए भी
एक पहला दीपक चाहिए—
और वह कोई और नहीं, हम हैं।

एक कमज़ोर पुल पर चेतावनी लिखी थी—
“एक समय में केवल एक व्यक्ति जाए।”
पहला व्यक्ति रुका।
दूसरा भी रुका।
फिर सबने कहा—
“चलो, साथ चलते हैं।”
पुल टूटा।
सब गिरे।
एकता यदि विवेक के बिना हो,
तो वह शक्ति नहीं—विनाश बन जाती है।
और
विवेक यदि एकता के बिना हो,
तो वह सही होते हुए भी निष्फल रहता है।
समाज को दोनों चाहिए—
साथ भी, और सही दिशा भी।

एक नगर में अन्याय हो रहा था।
सब देख रहे थे।
सब जानते थे।
पर सब चुप थे।
शासक मुस्कुरा रहा था—
क्योंकि उसे पता था,
सबसे बड़ा समर्थन मौन होता है।
जो गलत के विरुद्ध नहीं बोलता,
वह अनजाने में
गलत का साझेदार बन जाता है।
समाज की सबसे खतरनाक बीमारी है—
“मुझे क्या?”

पाँच उँगलियाँ अलग-अलग कमजोर थीं।
जब वे मुट्ठी बनीं,
तो पत्थर भी टूट गया।
समाज में
व्यक्ति कमजोर हो सकता है,
पर संगठित समाज अजेय होता है।

एक बुज़ुर्ग पेड़ लगा रहा था।
किसी ने कहा—
“आप तो इसके फल खा नहीं पाएँगे।”
बुज़ुर्ग मुस्कुराया और बोला—
“जो पेड़ मैंने खाए,
वो भी मैंने नहीं लगाए थे।”
समाज सेवा भविष्य का सौदा है।
जो आज बीज नहीं बोएगा,
वह कल छाया की शिकायत करेगा।

एक शहर में आग लगी।
सबने वीडियो बनाए।
सबने शेयर किए।
पर ज़िम्मेदारी की बाल्टी
किसी ने नहीं उठाई।
यही आज की सबसे बड़ी विडंबना है—
हम संवेदनशील दिखना चाहते हैं,
जिम्मेदार बनना नहीं।

हम उत्सव करना जानते हैं,
पर मंथन से डरते हैं।
हम भीड़ बनाना जानते हैं,
पर दिशा देना भूल जाते हैं।
हम आलोचना से डरते हैं,
पर पतन से नहीं।

इतिहास तब करवट बदलता है—
जब एक व्यक्ति चुप्पी तोड़ता है,
जब दस लोग साथ खड़े होते हैं,
जब सौ लोग दिशा तय करते हैं,
और जब हज़ार लोग
निरंतरता निभाते हैं।
तभी इतिहास लिखता है—
“यहीं से परिवर्तन शुरू हुआ।”
यह लेख पढ़कर ताली मत बजाइए।
यह लेख पढ़कर पोस्ट शेयर करके रुक मत जाइए।

बस इतना कीजिए—
अपने हिस्से का दीपक जलाइए।
अपने समाज में एक जिम्मेदारी उठाइए।
और जब सही लगे—चुप मत रहिए।
क्योंकि,इतिहास आज भी लिखा जा रहा है…
और कल कोई पूछेगा—
“जब समय था,
तब तुम क्या कर रहे थे?”

डॉ. रामानंद काबरा
9414070142

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor