1 फ़रवरी 2026, रविवार को पश्चिमी राजस्थान की महान व प्रतिष्ठित तथा थार क्षेत्र की केंद्रीय दीन-व-इल्म की पाठशाला “दारुल उ़लूम अनवारे मुस्तफ़ा सेहलाऊ शरीफ़, गरडिया, बाड़मेर के वादी-ए-रहमत-व-अनवार में सिलसिला-ए-बुख़ारिया की रौशन रिवायतों के तहत एक अ़ज़ीमुश्शान और रूह-परवर कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस मौक़े पर क़ुत्बे थार हज़रत पीर सय्यद हाजी आ़ली शाह बुख़ारी का 158वाँ, हज़रत पीर सय्यद अ़लाउद्दीन शाह बुख़ारी का 54वाँ, दारुल उ़लूम के बानी हज़रत पीर सय्यद कबीर अहमद शाह बुख़ारी का 12वाँ तथा मज्ज़ूबे कामिल हज़रत पीर सय्यद दावन शाह बुख़ारी (रहमतुल्लाह अ़लैहिम) का पहला उ़र्से बुख़ारी अक़ीदत, मुहब्बत और शान-व-शौकत के साथ मनाया गया। इस अवसर पर दारुल उ़लूम अनवारे मुस्तफ़ा का वार्षिक जलसा-ए-दस्तारे फ़ज़ीलत भी आयोजित हुआ।

उ़र्स की तक़रीबात का आग़ाज़ नमाज़-ए-फ़ज्र के बाद दारुल उ़लूम की आ़लीशान ग़रीब नवाज़ मस्जिद में सामूहिक क़ुरआन ख़्वानी से हुआ। प्रातः 9 बजे से 12 बजे तक ख़त्मे बुख़ारी शरीफ़ की बाबरकत नशिस्त आयोजित हुई, जिसमें नात-व-मनक़बत के रूहानी कलाम पेश किए गए। इस अवसर पर हज़रत क़ारी उम्मीद अ़ली साहब सिकन्दरी अशफ़ाक़ी और दारुल उ़लूम के पूर्व मुदर्रिस हज़रत अ़ल्लामा मौलाना मुहम्मद हाशिम रज़ा साहब मिस्बाही ने दारुल उ़लूम की इल्मी ख़िदमात और मशाइख़े बुख़ारिया की अ़ज़मत-व-रिफ़अ़त पर असरदार तक़रीरें कीं।
इसके बाद दारुल उ़लूम फ़ैज़े अकबरी लूनी शरीफ़ के पूर्व शैख़ुल हदीस,हाफ़िज़े अहादीसे कसीरा हज़रत अ़ल्लामा मौलाना शुऐब आ़लम साहब अकबरी ने बुख़ारी शरीफ़ की आख़िरी हदीस का दर्स देकर ख़त्मे बुख़ारी शरीफ़ की मुक़द्दस रस्म अदा करवाई तथा इमामे बुख़ारी अ़लैहिर्रहमा की ज़िंदगी, उनकी इल्मी सेवाओं और बुख़ारी शरीफ़ की तर्तीब-व-तद्वीन पर गहन विद्वत्तापूर्ण ख़िताब फ़रमाया। सलातो सलाम और नूरुल-उ़ल्मा, पीरे तरीक़त हज़रत अ़ल्लामा अल्हाज सय्यद नूरुल्लाह शाह बुख़ारी (मद्दज़िल्लहुल आ़ली) की दुआ़ पर यह नशिस्त समाप्त हुई।
नमाज़े ज़ुहर के बाद “राष्ट्रीय एकता कार्यक्रम” आयोजित हुआ, जिसमें विभिन्न धर्मों और वर्गों से जुड़े राष्ट्रीय व सामाजिक नेतृत्वकर्ताओं ने भाग लिया। वक्ताओं ने दीनी तालीम के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा के प्रसार, वतने अ़ज़ीज़ हिंदुस्तान से मुहब्बत, आपसी भाईचारे, राष्ट्रीय एकता और अमन-व-अमान की मज़बूती पर ज़ोर दिया। इस मौक़े पर दारुल उ़लूम अनवारे मुस्तफ़ा के मुहतमिम व शैख़ुल हदीस तथा ख़ानक़ाहे आ़लिया बुख़ारिया के सज्जादानशीन पीरे तरीक़त हज़रत अ़ल्लामा अल्हाज सय्यद नूरुल्लाह शाह बुख़ारी ने सभी मेहमानों का राजस्थानी तहज़ीब-व-रिवायत(संस्कृति) के अनुसार अज्रक, शॉल और माला पहनाकर स्वागत किया तथा उ़र्स के इंतिज़ाम में सहयोग करने वाले तमाम अफ़राद का दिली शुक्रिया अदा किया। अपने सदराती ख़िताब में उन्होंने फ़रमाया कि औलिया-ए-किराम के आस्ताने मुहब्बत, भाईचारे, अमन-व-शांति और देशभक्ति का पैग़ाम देते हैं।

नमाज़े अ़स्र के बाद दारुल उ़लूम के दारुल हदीस से सज्जादानशीन पीरे तरीक़त हज़रत अ़ल्लामा सय्यद नूरुल्लाह शाह बुख़ारी, उनके भाइयों, सादाते किराम और उ़ल्मा-ए-किराम की क़यादत में चादर जुलूस निकाला गया। सिंधी मौलूद शरीफ़, नात-व-मनक़बत, दरूद शरीफ़ और कलिमा-ए-तय्यिबा के साथ यह जुलूस भारी भीड़ के बावजूद दारुल उ़लूम के असातिज़ा-व-तल्बा, विभिन्न कमेटियों के ज़िम्मेदारों तथा थाना रामसर व बिजिडियार की पुलिस प्रशासन की सराहनीय निगरानी में पूरी शांति और व्यवस्था के साथ दरगाह शरीफ़ पहुँचा। वहाँ बुज़ुर्गाने दीन के मज़ारात पर चादरपोशी, गुलपोशी और सामूहिक फ़ातिहा के बाद देश और मिल्लत की सलामती, अमन-व-शांति तथा सभी ज़ायरीन और आ़म मुसलमानों की ख़ैर-व-आफ़ियत के लिए विशेष दुआ़ की गई।
नमाज़े मग़रिब के बाद दारुल उ़लूम और उसकी शाखाओं के होनहार छात्रों ने तिलावत, नात, मनक़बत, तक़रीर और संवाद पर आधारित दीनी तालीम तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया, जिसमें उर्दू, अ़रबी, हिंदी, सिंधी, ढाटी और अंग्रेज़ी भाषाएँ शामिल रहीं। कार्यक्रम को श्रोताओं ने अत्यंत सराहा।
नमाज़े इशा के बाद
उ़लमा-ए-किराम का विशेष अधिवेशन हज़रत मौलाना क़ारी मुहम्मद जावेद साहब सिकन्दरी अनवारी की तिलावत से आरंभ हुआ। इस अधिवेशन में मुख्य वक्ता के रूप में प्रसिद्ध ख़तीब हज़रत अ़ल्लामा मौलाना सय्यद मुहम्मद अमीनुल क़ादरी साहब (निगरां सुन्नी दावते इस्लामी, मालेगांव) ने अत्यंत प्रभावशाली संबोधन दिया।
इसी अधिवेशन में हज़रत अ़ल्लामा हाफ़िज़ अल्लाह बख़्श साहब अशरफ़ी, हज़रत अ़ल्लामा मौलाना अबूबकर साहब अशरफ़ी बासनी, हज़रत अल्हाज सैयद अनवर शाह प्रमुख वागड़, हज़रत अ़ल्लामा मुफ़्ती सुहैल रज़ा साहब क़ादरी (मुंबई), हज़रत अ़ल्लामा मौलाना अ़ब्दुस्सलाम साहब मिस्बाही (सुजानगढ़), हज़रत मौलाना हाफ़िज़-व-क़ारी शाह मुहम्मद साहब क़ादरी (दारुल उ़लूम इस्हाक़िया, जोधपुर), हज़रत अ़ल्लामा मौलाना मुहम्मद आदम ख़ान साहब क़ादरी अशफ़ाक़ी, हज़रत मौलाना मुहम्मद पठान साहब सिकन्दरी तथा हज़रत मौलाना इक़बाल साहब अशफ़ाक़ी (फलोदी) ने भी अपने बहुमूल्य विचार और प्रभावशाली ख़िताबात पेश किए।
इसी अधिवेशन में इस वर्ष दारुल उ़लूम से फ़ारिग़ होने वाले 18 छात्रों को सनद व दस्तारे फ़ज़ीलत तथा 8 छात्रों को सनद व दस्तारे क़िराअत से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त राजस्थान की तीन प्रमुख धार्मिक हस्तियों—हज़रत अ़ल्लामा मौलाना मुहम्मद हनीफ़ ख़ान रज़वी (सरबराहे आला सुन्नी तब्लीगी जमाअ़त, शेरानी आबाद), हज़रत मौलाना अबूबकर अशरफ़ी (सुन्नी तब्लीगी जमाअ़त, बासनी) और हज़रत क़ारी मुहम्मद आफ़ताब आ़लम अशफ़ाक़ी (ख़तीब व इमाम, जामा मस्जिद गोटन)—को उनकी दीनी व मिल्ली सेवाओं के सम्मान में क्रमशः सय्यदना शाह बरकतुल्लाह अवार्ड, मख़दूमे जहानियां अवार्ड और हज़रत पीर सय्यद हाजी आ़ली शाह बुख़ारी अवार्ड प्रदान किए गए।
इस अवसर पर बड़ी संख्या में जलीलुल क़द्र उ़ल्मा, मशाइख़ और नात-ख़्वान हज़रात मौजूद रहे। विशेष नात-व-मनक़बत ख़्वानी मद्दाहे रसूल ﷺ हज़रत क़ारी मुहम्मद शरीफ़ बासनी, वासिफ़े शाहे हुदा हाफ़िज़-व-क़ारी मुहम्मद अ़ता-उर्रहमान क़ादरी अनवारी तथा बुलबुले बाग़े मदीना हाफ़िज़-व-क़ारी अ़ब्दुल मजीद क़ादरी अनवारी ने पेश की।
उ़र्सेबुख़ारी और जलसा-ए-दस्तारे फ़ज़ीलत की समस्त तक़रीबात की निज़ामत हज़रत मौलाना मुहम्मद हुसैन क़ादरी अनवारी (निगरां: शाखाए-इदारा), हज़रत मौलाना अ़लीमुद्दीन क़ादरी अशफ़ाक़ी, सुमेरपुर और हज़रत मौलाना मुहम्मद रियाज़ुद्दीन सिकन्दरी अनवारी ने संयुक्त रूप से निभाई। इस दीनी,इल्म तथा रूहानी कार्यक्रम में सैकड़ों उ़ल्मा, तल्बा और हज़ारों की संख्या में अ़वामे अहले-सुन्नत व आशिक़ाने-औलिया ने शिरकत की।
अंत में सज्जादानशीन हज़रत पीर साहब क़िब्ला ने उ़र्स कमेटी की ओर से समस्त सहभागियों, प्रशासन और सरकारी अधिकारियों का आभार व्यक्त किया तथा सलातो सलाम और सामूहिक दुआ़ के साथ इस अ़ज़ीमुश्शान कार्यक्रम का समापन हुआ।



