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Saturday, October 17, 2026, 5:30 pm

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Lifestyle

शरीर का संगीत: जब भूख और प्यास ही बनें औषधि

लेखक शिव सिंह
984092381

​आज के इस शोर-शराबे वाले युग में, हमने दुनिया की हर आवाज सुनना सीख लिया है, बस अपने शरीर की पुकार सुनना भूल गए हैं। हम तब खाते हैं जब ‘लंच ब्रेक’ होता है, हम तब पीते हैं जब गला सूखकर कांटा हो जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि

आपका शरीर आपसे क्या मांग रहा है?

​1. भूख: पेट की आग या मन का लालच?

​अक्सर हम पेट भरने के लिए नहीं, बल्कि मन को बहलाने के लिए खाते हैं। कभी तनाव में, कभी बोरियत में, तो कभी बस स्वाद के लिए। लेकिन असली आरोग्य वहीं है जहाँ “भूख लगे तब खाना” के नियम का पालन हो।
​जब शरीर को वास्तव में ऊर्जा की जरूरत होती है, तब जठराग्नि प्रज्वलित होती है। उस समय खाया गया सादा भोजन भी अमृत के समान शरीर को लगता है। बिना भूख के खाना शरीर में कचरा (Toxins) जमा करने जैसा है, जो बाद में बीमारियों का घर बन जाता है।

​2. प्यास: जीवन का अमृत

​पानी केवल गला तर करने के लिए नहीं है, यह हमारे प्राणों का आधार है। “प्यास लगे तब पानी पीना” सुनने में सरल लगता है, लेकिन यह गहरे संयम की बात है। हमारा शरीर 70% पानी है। जब हम प्यास की पुकार को अनसुना करते हैं, तो हम अपनी कोशिकाओं (cells) को सुखा रहे होते हैं। प्यास लगने पर उसे तुरंत तृप्त करना शरीर के प्रति सबसे बड़ा सम्मान है।

​3. सब रोगों से बचना: सादगी ही समाधान है

​अगर हम केवल इन दो संकेतों—भूख और प्यास—को ईमानदारी से समझने लगें, तो आधे से ज्यादा बीमारियाँ हमारे दरवाजे से ही लौट जाएँगी।
​मोटापा, गैस, और अपच उन लोगों के साथी हैं जो बिना भूख के खाते हैं।
​थकान, सिरदर्द और चिड़चिड़ापन अक्सर उन लोगों को होता है जो प्यास को नजरअंदाज करते हैं।

​निष्कर्ष

​ईश्वर ने हमारे शरीर के भीतर एक बहुत ही सटीक ‘सेंसर’ लगाया है। हमें किसी डाइट चार्ट या महंगे सप्लीमेंट की जरूरत नहीं है, बस जरूरत है तो थोड़ा ठहरकर अपने भीतर झांकने की। अपने शरीर से प्रेम कीजिए, इसकी जरूरतों का सम्मान कीजिए।

* ​याद रखिए: यह शरीर ही वह मंदिर है जिसमें आप निवास करते हैं। यदि मंदिर जर्जर होगा, तो प्रार्थना में मन कैसे लगेगा?

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor