लघु -कथा : डॉ. रामानंद काबरा
उस दिन खाना नहीं जला था…
बरसों की उपेक्षा जली थी।
डाइनिंग टेबल पर बैठे पति और बच्चे जैसे ही पहला निवाला मुंह में डालते हैं, एक साथ आवाज उठी—
“यह क्या बना दिया? न स्वाद, न ठीक से पका!”
महिला शांत खड़ी रही। कुछ पल तक सबको देखती रही। फिर धीमे स्वर में बोली—
“आज से पहले इतने सालों से जो खाना खा रहे थे, वह कैसा बनता था?”
सबने सहजता से कहा—
“बहुत स्वादिष्ट… पौष्टिक…”
वह मुस्कुराई नहीं। उसकी आँखों में पहली बार वर्षों का सन्नाटा बोल रहा था।
“आज एक दिन खाना अच्छा नहीं लगा तो सब बोल उठे— ‘क्या भूसा परोस दिया!’
पर जब रोज अच्छा बनता था, तब कभी किसी ने कहा— ‘धन्यवाद’?”
टेबल पर सन्नाटा उतर आया।
वह आगे बोली—
“अगले कुछ महीनों में हमारे बेटे की शादी है। एक अनजान लड़की इस घर में आएगी। वह चाय बनाएगी, खाना परोसेगी, अपने मायके की मिठाई लाएगी…
तब आप सब ऐसे ठूंठ बनकर ओर कमियाँ निकालने मत बैठ जाना।
ओर हाँ!तारीफ का एक भी मौका मत छोड़ना। क्योंकि इंसान हल्का-फुल्का बेस्वाद खाना सह लेता है…
पर उपेक्षा नहीं सह पाता।”
इतना कहकर वह रसोई में चली गई।
पर उस दिन सिर्फ रसोई नहीं, सोच भी बदल रही थी।
लव टैंक की कहानी
एक मनोवैज्ञानिक ने अपने अध्ययन में पाया—
पति-पत्नी के अधिकांश झगड़ों की जड़ बड़ी घटनाएँ नहीं होतीं।
कारण होता है—
प्रशंसा की कमी।
हर व्यक्ति के भीतर एक “प्रेम का पात्र” होता है।
जब उसमें सराहना, आदर और कोमल शब्द नहीं डाले जाते तो वह खाली होने लगता है।
और खाली पात्र में अक्सर शिकायतें गूंजती हैं।
आज हम देखते हैं—
महंगे उपहार, छुट्टियाँ, आउटिंग… सब है। पर दो शब्द—
“तुम अच्छा करती हो”
कई बार अनुपस्थित हैं।
चर्च का वह पेपर
एक बार किसी रविवार को चर्च के आत्म-सुधार कार्यक्रम में पति-पत्नी को एक कागज़ दिया गया।
लिखना था—
“अपने जीवनसाथी में ऐसे छह सुधार, जिनसे तुम्हारा जीवन स्वर्ग बन जाए।”
सबने कागज भर भर के थमा दिये-
एक पति ने छह कमियाँ नहीं लिखीं।
उसने छह गुलाब मंगवाए।
एक लिफाफे में रखे और लिखा— मुझे तुम्हारी छह कमियाँ नहीं मालूम..तुम जैसी भी हो, बहुत अच्छी लगती हो। “प्रभु का शुक्र है कि तुम मेरी जिंदगी में हो।”
लिखने की आवश्यकता नहीं की उस हाल मेँ सभी महिलाओ ने उस पुरुष के लिए कितनी तालिया बजाई होंगी।
शाम को जब वह घर लौटा,
पत्नी दरवाज़े पर खड़ी थी।
आँखें भीगी हुई।
वह लिपटकर रो पड़ी—
तुम कितना प्यार करते हो…”
सोचिए—
वह रोना शिकायत का नहीं था,
भराव का था।
उसका “लव टैंक” भर गया था।
असली और नकली फूल
प्रशंसा और चापलूसी में फर्क होता है। चापलूसी नकली फूल है—
रंग है, खुशबू नहीं।
प्रशंसा असली गुलाब है—
कम शब्द, पर सच्ची सुगंध।
रिश्ते गाड़ी चलाने जैसे होते हैं।
सिर्फ सामने नहीं, दाएँ-बाएँ, हर मोड़ पर ध्यान रखना पड़ता है।
एक असावधान शब्द,
एक उपेक्षित भाव—
और दुर्घटना हो जाती है।
अंत नहीं, शुरुआत
उस दिन के बाद उस घर में एक नियम बना—
हर दिन कम से कम एक धन्यवाद।
एक तारीफ।
एक स्वीकार।
धीरे-धीरे घर की हवा बदल गई।
रोटियों का स्वाद वही था,
पर माहौल में मिठास बढ़ गई थी।
क्योंकि प्रेम को महंगे तोहफों की जरूरत नहीं होती—
उसे चाहिए बस छह गुलाब…
या शायद सिर्फ एक सच्चा शब्द।
प्रश्न यह नहीं कि आपके जीवनसाथी में छह कमियाँ क्या हैं। प्रश्न यह है—
क्या आपने कभी छह गुलाब दिए हैं?



