जर्नलिस्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी का हो गठन
-आज वे पत्रकार जिन्होंने नियम विरुद्ध और दंद-फंद कर और सांठगांठ कर फर्जी तरीके से अपना अधिस्वीकरण करवा लिया हैं, वे चौड़े होकर घूम रहे हैं और वर्षों से पत्रकारिता कर रहे और गैर अधिस्वीकृत पत्रकार केवल सरकारी योजनाओं का अधिस्वीकृत पत्रकारों को फायदा उठाते देख रहे हैं और मन मसोस कर बैठे हैं। कोई बोलने वाला नहीं है। कोई सुनने वाला नहीं हैं।
-हम तो सरकार से एक ही मांग करते हैं यह अधिस्वीकृत और गैर अधिस्वीकृत पत्रकारों का लफड़ा ही खत्म करो। जो भी पत्रकार 20 साल से अधिक समय से पत्रकारिता कर रहे हैं उन्हें अधिस्वीकृत मानकर सभी सुविधाओं का लाभ दिया जाए।
दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर
9783414079 diliprakhai@gmail.com
सांसद नीरज डांगी ने पत्रकारों को कोविड 19 महामारी से पूर्व भारतीय रेल द्वारा प्रदत्त यात्रा रियायतों को पुनः बहाल करने की मांग की है। हम सांसद नीरज डांगी से संबंधित प्रेस नोट हूबहू इस खबर कें अंत में छापेंगे, मगर पहले अपनी बात डांगी जी से कहना चाहेगे कि अगर पत्रकारों के हितों में बोलना है तो मुक्कमल आवाज उठाओ, वरना चुपचाप मुंह बंद कर खामोश रहो। पत्रकार का अर्थ केवल अधिस्वीकृत पत्रकार ही नहीं हैं। यहां वे पत्रकार भी शामिल हैं जो वर्षों से राष्ट्रीय मीडिया हाउस में काम करने के बाद भी अधिस्वीकृत नहीं हैं। लेकिन उन्हें किसी प्रकार का कोई लाभ नहीं मिल रहा। अगर डांगी साहब पत्रकारों की दुखती रग पर हाथ रखा है तो उनकी आवाज सरकार के कानों तक इस प्रकार उठाओ कि सरकार मजबूर हो जाए कुछ करने को…अन्यथा यह रोना-धोना बंद करो… पत्रकार आपके और सरकार के रहमोकरम पर जिंदा नहीं है। सारी सुविधाएं वापस ले लो। मेरी बात से कई पत्रकार इत्तेफाक नहीं रखेंगे, लेकिन हकीकत यही है कि पत्रकार एक बैचारगी कौम बनकर रह गई है। पत्रकारों को जानवरों की तरह हांका जा रहा है। और किसी को स्वाभिमान और आत्मसम्मान की चिंता है या नहीं मगर मैं नहीं चाहता कि पत्रकार अपने हक के लिए आप जैसे नेताओं की कृपा दृष्टि से आशा और उम्मीद लगाएं।
मारवाड़ प्रेस क्लब के अध्यक्ष राजीव गौड़ ने बड़ी उम्मीद से पत्रकारों से सुझाव मांगे थे। राजीव गौड़ ने कड़े और कठोर शब्दों में पत्रकारों के साहस को जगाया और कहा कि शर्म की बात है कि पत्रकार सुझाव नहीं दे रहे। इसके बाद सुझावों की झड़ी लग गई। कई अखबारों और न्यूज पोर्टल ने पूरा-पूरा पेज सुझावों से भर दिया। मगर खुदगर्ज और मतलबपरस्त भजनलाल सरकार ने पत्रकारों की एक भी मांग बजट में शामिल नहीं की। इसका सीधा सा अर्थ है कि पत्रकार कौम बैचारगी कौम बनकर रह गई है। आज हालत यह है कि बड़े-बड़े मीडिया हाउस सरकार का भौंपू बन गए हैं ओर छोटे अखबार, चैनल और न्यूज पोर्टल के पास आय का साधन नहीं है, इसलिए वे सरकार के खिलाफ लिखने का साहस नहीं कर पा रहे। हालात बड़े विकट हैं। पत्रकार खुद भी संगठित नहीं है। बड़े-बड़े मीडिया हाउस के पत्रकार शातिर, धूर्त और मक्कार बनकर एक सफेदपोश बने हुए हैं। जबकि उन्हें आम पत्रकार के आत्मसम्मान और एक आम पत्रकार के हितों से कोई मतलब नहीं है। आज वे पत्रकार जिन्होंने नियम विरुद्ध और दंद-फंद कर और सांठगांठ कर फर्जी तरीके से अपना अधिस्वीकरण करवा लिया हैं, वे चौड़े होकर घूम रहे हैं और वर्षों से पत्रकारिता कर रहे और गैर अधिस्वीकृत पत्रकार केवल सरकारी योजनाओं का अधिस्वीकृत पत्रकारों को फायदा उठाते देख रहे हैं और मन मसोस कर बैठे हैं। कोई बोलने वाला नहीं है। कोई सुनने वाला नहीं हैं। हम तो सरकार से एक ही मांग करते हैं यह अधिस्वीकृत और गैर अधिस्वीकृत पत्रकारों का लफड़ा ही खत्म करो। जो भी पत्रकार 20 साल से अधिक समय से पत्रकारिता कर रहे हैं उन्हें अधिस्वीकृत मानकर सभी सुविधाओं का लाभ दिया जाए।
जर्नलिस्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी (जेडीए) का गठन करो
डांगी साहब मुद्दा उठाना है तो यह उठाओ कि जेडीए यानी जर्नलिस्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी का गठन हो। जर्नलिस्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी का गठन करवाकर पत्रकारों के सारे मुद्दाें का इसके तहत निस्तारण करवाओ। इस प्राधिकरण का संचालन सीनियर पत्रकार करें। इसमें दो तीन रिटायर जजों को शामिल किया जाएं। ना तो किसी तरह के राजनीतिज्ञ और ना ही आईएएस ओर आरएएस अफसरों को शामिल किया जाए। केवल पत्रकारों द्वारा अथॉरिटी का संचालन किया जाए और एक ही छत के नीचे पत्रकारों की सारी समस्याओं का समाधान हो। चाहे पत्रकारों की आवास कॉलोनी हो, चाहे पत्रकार संगठनों के भवन हो, चाहे पत्रकारों को लोन, अनुदान या पेंशन के मुद्दे हो । चाहे पत्रकारों की स्वास्थ्य पॉलिसी हो, चाहे पत्रकारों के बच्चों की शिक्षा छात्रवृत्ति हो। कहने का मतलब पत्रकारों के आर्थिक, लीगल, सामाजिक सरोकार, सुरक्षा और तमाम मुद्दों का एक ही छत के नीचे समाधान हो। यह सुझाव ऐसा सुझाव है, जिसे अगर लागू किया जाए तो लोकतंत्र में पत्रकार की ताकत बढ़ेगी और पत्रकार स्वतंत्रतापूर्वक और निर्भीक पत्रकारिता कर पाएंगे। अभी तक सरकारी रहमोकरम पर पल रहे और मर-मर कर जी रहे पत्रकार सरकार के खिलाफ और आईएएस और आईपीएस अफसरों के खिलाफ दो लाइन लिखने से पहले हजार बार सोचते हैं। अगर कोई पत्रकार हिम्मत भी करता है तो उसे कीमत चुकानी पड़ती है। अभी भी वक्त है डांगी जी आप अगर पत्रकारों का भला चाहते हो तो केवल रेलवे पास का मुद्दा ही नहीं मुक्कमल मुद्दा उठाओ। क्या सरकारी सुविधाओं का लाभ उठाने के लिए अधिस्वीकृत पत्रकारों ने ठेका ले रखा है। क्या वर्षों से पत्रकारिता करने वाले गैर अधिस्वीकृत पत्रकार झक मारते रहे हैं।
अब नीरज डांगी द्वारा शून्यकाल में उठाई आधी-अधूरी मांग के प्रेसनोट की खबर
सांसद नीरज डांगी ने आज राज्यसभा सदन में शून्यकाल के दौरान देश के लोकतांत्रिक ढाँचे के चौथे स्तंभ-पत्रकारिता से संबंधित, संवेदनशील एवं जनहित से सीधे जुड़े विषय की ओर ध्यान आकर्षित किया। सांसद नीरज डांगी ने बताया कि कोविड-19 महामारी से पूर्व भारतीय रेल द्वारा पत्रकारों को दी जा रही यात्रा रियायतें महामारी के दौरान स्थगित की गई थीं, जो उस समय की परिस्थितियों में एक अस्थायी एवं व्यावहारिक निर्णय था। किंतु खेद का विषय है कि देश में सामान्य स्थिति बहाल होने, सभी आर्थिक एवं सामाजिक गतिविधियाँ सुचारु रूप से प्रारंभ होने तथा अन्य श्रेणियों को दी गई रियायतें पुनः लागू होने के बावजूद पत्रकारों की यह महत्वपूर्ण सुविधा आज तक बहाल नहीं की गई है। सांसद डांगी ने कहा कि पत्रकार केवल समाचार संकलन तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वे देश के दूर-दराज़, दुर्गम एवं संवेदनशील क्षेत्रों में जाकर आम नागरिकों की समस्याओं, सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन, आपदाओं, सामाजिक असमानताओं तथा लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की निष्पक्ष रिपोर्टिंग करते हैं। कई बार उन्हें सीमित संसाधनों, जोखिमपूर्ण परिस्थितियों और समयबद्ध दबावों में कार्य करना पड़ता है। ऐसे में भारतीय रेल द्वारा दी जाने वाली यात्रा रियायतें किसी प्रकार का विशेषाधिकार नहीं, बल्कि उनके कर्तव्यों के निर्वहन में सहायक एक आवश्यक सुविधा रही हैं। उन्होंने बताया कि लोकतंत्र में पारदर्शिता, जवाबदेही और जनहित तभी सुनिश्चित हो सकता है जब पत्रकार निर्भय, स्वतंत्र और सुलभ साधनों के साथ कार्य कर सकें। सांसद नीरज डांगी ने बताया कि पत्रकारों को यात्रा रियायतों से वंचित रखना अप्रत्यक्ष रूप से उनकी कार्यक्षमता को सीमित करता है और यह स्थिति लोकतांत्रिक मूल्यों की भावना के अनुरूप नहीं कही जा सकती। विशेष रूप से छोटे एवं स्वतंत्र पत्रकार, ग्रामीण एवं क्षेत्रीय मीडिया से जुड़े संवाददाता इस निर्णय से सर्वाधिक प्रभावित हुए हैं। लोकतंत्र सशक्त, जीवंत और उत्तरदायी लोकतंत्र तब ही रह सकता है जब उसकी आवाज़ निर्भय, स्वतंत्र और निर्बाध हो। सांसद नीरज डांगी ने सरकार से मांग की है कि कोविड-19 महामारी से पूर्व भारतीय रेल द्वारा पत्रकारों को प्रदान की जा रही सभी यात्रा रियायतों को तत्काल प्रभाव से पुनः बहाल किया जाए। मान्यता प्राप्त पत्रकारों के लिए एक स्पष्ट, पारदर्शी एवं स्थायी नीति का निर्माण किया जाए, जिससे भविष्य में किसी भी आपात स्थिति में उनके अधिकारों एवं सुविधाओं की अनावश्यक समाप्ति ना हो। यह भी सुनिश्चित किया जाए कि इस नीति का लाभ वास्तविक एवं सक्रिय पत्रकारों तक सरल प्रक्रिया के माध्यम से पहुँचे।








