केडी इसरानी. स्वतंत्र पत्रकार. जयपुर
सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री अविनाश गहलोत ने विधानसभा में शुक्रवार को कहा कि राज्य सरकार थैलीसीमिया जैसी गंभीर बीमारी के पीड़ितों के लिए संवेदनशील है तथा इन्हें त्वरित इलाज उपलब्ध करवाने के लिए लगातार प्रयास किये जा रहे हैं। थैलीसीमिया बीमारी से पीड़ित बच्चों की देखभाल के लिए प्रदेश में भरतपुर को छोड़कर सभी 6 संभाग मुख्यालयों पर डे-केयर सेंटर संचालित है। इन सेंटर्स पर मरीजों को बिना रिप्लेसमेंट के रक्त चढ़ाया जाता है। साथ ही रोग से संबंधित जांचे व थैरेपी निःशुल्क उपलब्ध कराई जाती हैं।
इसके अलावा सरकार की ओर से इस रोग के इलाज के लिए बोन मैरो ट्रांसप्लांट हेतु 10 लाख तक की वित्तीय सहायता दी जाती है। उन्होंने कहा कि “मा” योजना में भी इस बीमारी के कैशलैस इलाज की सुविधा उपलब्ध है।
गहलोत ने बताया कि वर्तमान में प्रदेश में थैलीसीमिया से पीड़ित 1105 रोगी हैं। राज्य सरकार द्वारा इन्हें 1250 रुपए प्रतिमाह पेंशन उपलब्ध करवाई जा रही है। इनमें से 797 बच्चे 18 वर्ष तक की उम्र के हैं। उन्होंने बताया कि गत 2 वर्षों में थैलीसीमिया से पीड़ित 53 मरीजों का बोन मैरो ट्रांसप्लांट महात्मा गांधी चिकित्सालय, जयपुर में किया गया है। थैलीसीमिया के अलावा बोन मैरो ट्रांसप्लांट की संख्या 64 है।
गहलोत ने सदस्य श्री रुपिन्द्र सिंह कुन्नर द्वारा इस संबंध में पूछे गए पूरक प्रश्नों का जवाब देते हुए बताया कि प्रदेश में पिछले वर्ष मुख्यमंत्री आयुष्मान बाल संबल योजना लागू की गई थी। नेशनल हेल्थ मिशन की सूची से 52 बीमारियों को इस योजना में शामिल किया गया था। योजना के तहत 50 लाख रुपए तक का उपचार व 5000 रुपये की मासिक सहायता दी जाती है। वर्तमान में इस योजना में थैलीसीमिया बीमारी को शामिल नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार से इस योजना में थैलेसीमिया को शामिल करने का निवेदन किया है।
सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री ने बताया कि थैलीसीमिया एक गंभीर एवं अनुवांशिक बीमारी है। माता-पिता को यह बीमारी होने पर स्वाभाविक रूप से उनके बच्चों में भी आती है। इसमें नियमित अंतराल में मरीज को खून चढ़ाना पड़ता है। उन्होंने कहा कि बोन मेरो ट्रांसप्लांट से ही इसका इलाज संभव है।
इससे पहले विधायक श्री रूपिंदर सिंह कुन्नर के मूल प्रश्न के जवाब में सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री ने बताया कि चिकित्सा महाविद्यालयों में थैलीसीमिया पीड़ित मरीजों को सहायता उपलब्ध करवाये जाने हेतु डे-केयर सेन्टर संचालित हैं। यहां Blood Transfusion without any replacement, Iron Chelation therapy एवं सभी प्रकार की जाँचें पूर्णतः निःशुल्क उपलब्ध हैं। गंभीर मरीजों को भर्ती करने के लिए वार्ड एवं बोन मैरो ट्रांसप्लान्ट की सुविधा भी निःशुल्क उपलब्ध करवायी जा रही है। उन्होंने बताया कि थैलीसीमिया को दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम 2016 के अनुसार 21 दिव्यांगता श्रेणी में शामिल किया गया है। थैलीसीमिया पीड़ित बच्चों को यूडीआईडी कार्ड/दिव्यांगता प्रमाण पत्र जारी किये जा रहे हैं।
उन्होंने बताया कि जन्म से थैलीसीमिया रोग से पीड़ित बच्चे के 05 वर्ष का होने तक माता-पिता के आधार कार्ड से इलाज किया जाता है। 05 वर्ष के पश्चात् बच्चे के आधार कार्ड पर हाथों के निशान अपडेट होने के पश्चात बच्चे की आईडी से इलाज किया जाता है। थैलीसीमिया रोग से पीड़ित बच्चे जिनके बायोमैट्रिक सत्यापन संभव नहीं है, उनकी पेंशन हेतु संबंधित पेंशन स्वीकृतिकर्ता अधिकारी के स्तर से पात्रता संबंधी जांच की जाती है। इसके उपरान्त आवेदक के आधार में पंजीकृत मोबाइल नंबर पर ओटीपी के माध्यम से पेंशन स्वीकृति प्रक्रिया की जाती है।



