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Thursday, March 12, 2026, 10:27 am

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ज्ञानदीप…एक दीप आलोक पर्व का : नीलम व्यास ‘स्वयंसिद्धा’

पुस्तक समीक्षा : कवयित्री सुशीला भंडारी, समीक्षा- नीलम व्यास ‘स्वयंसिद्धा’

इन दिनों सुशीला भंडारी जी की काव्य संग्रह की पहली पुस्तक पढ़ी जिसका शीर्षक है -ज्ञानदीप, जो कि कई मायनों में अपने आप में अनूठी है। पहला यह की अस्सी दशक वयस के पार करने के बाद यह पहली पुस्तक छपी है, जो सुशीला जी के जीवन भर के अनुभवों की तपिश में पक कर फलीभूत हुई है। सुशीला भंडारी जी शिक्षा विभाग में सेवानिवृत हो चुकी है, मग़र साहित्य जगत में उनका लेखन कार्य आज तक सक्रिय है, अनवरत चल भी रहा है। जो कि नवोदित साहित्यकारों के लिए प्रेरणादायक है।
जितना सरल व सहज कवयित्री का व्यवहार व स्वभाव है उतनी ही सरल शैली में कविताओं का सृजन हुआ है जो जीवन की सीख देती है ज्ञान का दीप जलाकर, ऐसा दीप जो प्राणी जगत को अज्ञान तिमिर से निकाल कर ज्ञान के सूरज की स्वर्णिम रोशनी से सरोबार कर देता है।
इस काव्य संग्रह में देश व समाज के कल्याण व उत्थान की मंगल कामना के साथ जन सेवा करने का भाव भरा है जो कि नई पीढ़ी को व्यष्टि से समष्टि की ओर जाने का संदेश भी देता है।

विश्व बन्धुत्व का भाव भर महावीर स्वामी के बताए पथ का अनुसरण करने का भाव भी प्रकट हुआ है, जो नैतिक मूल्यों से परिपूर्ण आदर्श समाज व आदर्श जीवन की बेहतरीन परिकल्पना भी प्रस्तुत करती है।

इन्होने स्त्री जीवन पर आधारित कविता में नारी के रुप अनेक बिम्बों में ढालकर समाज के सभी कर्म क्षेत्रों में नारी के वर्चस्व को सिद्ध किया है। कवयित्री सुशीला भंडारी की कविताओं में जीवन के कैनवास को सतरंगी आभा

से भरे भावों के झिलमिल रंगों से भरने का सुंदर प्रयास हुआ है इसलिए कही प्रकृति का भव्य चित्रण हुआ है, कही रिश्तों की लहलहाती बगिया अपनी महक बिखेरे मिलती है, कही नव वर्ष के आगमन का उल्लास है, नव संकल्प है तो किसी कविता में लोकतंत्र का उत्सव मनाकर सही चुनाव प्रक्रिया अपनाने का संदेश दिया है। गणतंत्र दिवस नामक कविता में शहीदों को नमन कर इस राष्ट्र पर्व को सच्ची श्रद्धा से मनाने का भाव मिला है।

काव्य संग्रह में माँ सरस्वती की अर्चना करते हुए एक ज्ञान का दीपक जला दो नामक कविता में –
मन मंदिर के भीतर केवल
एक ज्ञान का
दीप जला दो
मन मंदिर की दीप शिखा
जग को आलोकित कर देगी… जीवन भर देगी।

कवयित्री ने जीवन के साथ साथ मन मंदिर में ज्ञान दीपक जलाने का आह्वान किया है, जिससे हृदय के नकारात्मक भावों का कलुष मिट जाए और सुखी संसार की कल्पना पूर्ण हो जाए।
कवयित्री ने सम्पूर्ण जगत के लिए मंगलमय जीवन की कामना की है –
मंगलकामना नाम कविता में –
“मंगल मय हो जीवन सबका/मुदित हो जन मानस/ नए प्रभात का हो स्वागत/मंगल दायक हो नूतन वर्ष।”
इसी प्रकार राष्ट्र भाषा हिन्दी को कुंदन सम माना है जो मणियों की माला सम सबको एकता के सूत्र में बांधती है।
कवयित्री ने जोधपुर के प्रति अपने लगाव को प्रकट किया है,’अनुपम है सूर्यनगरी ‘-कविता में
शब्दों की बानगी देखिएगा-राव जोधाजी ने बनवाया/दुर्ग अद्भुत पहाड़ी पर/शहर बसाया जोधाणा/जहाँ सूर्यनगरी अपनी रश्मि से /जग के अंधकार को हर ले/नई ज्योति व शांति का संदेश फैला दे।
जोधपुर के प्रसिद्ध स्थल, संस्कृति, खान पान, पहनावे का बहुत सुंदर चित्रण इस कविता में हुआ है।जोधपुर की अपनायत का अनोखा खजाना यहाँ विरासत में मिला है, इस भाव को मुखरित करके जोधपुर के प्रति अपने असीम लगाव को दर्शाया है।
भारत के अनेक महापुरुषों के आदर्श जीवन पर भी कवयित्री की कलम खूब चली है -जिनमें संत शिरोमणि विवेकानंद के जीवन का गुणगान हुआ है तो दूसरी तरफ राजस्थानी वीर दुर्गा दास की देशभक्ति की शिखा को सब दिशा को आलोकित करती हुई बताया गया है। सैनिक शक्ति को प्रणाम करते हुए सीमा के प्रहरी नामक कविता लिखी जो बर्फ़ीली सीमा पर बैठे प्रहरी को नमन करती है, देश के इन सपूतों पर नाज को प्रकट करते हुए इनके काम को धन्य कहा गया है।
“धन्य इनकी जननी/धन्य इनकी मातृभूमि/ऐसे वीरों को करते हम प्रणाम।”
कवयित्री ने जीवन में आशा वादी भाव रखते हुए अनवरत नव निर्माण की अलख मन में जगाने की प्रेरणा दी है, नव निर्माण कविता में -देखिएगा
‘नव निर्माण की शुभ बेला में/नए गीत हम गाए/जन- जन हो कल्याण/बने मानवता के पुजारी, घर- घर खुश हाली लाए।’
कवयित्री ने अध्यात्म व जीवन आदर्श के मूल्यों को अपने काव्य में पिरोया है जो कि जीवन माला के सब सुंदर रूपों को एक धागे में समायोजित करते प्रतीत होते है।
ऐसी ही एक उत्कृष्ट कविता देखिएगा -‘तृण सा है जीवन’-जिसमें
‘मन की साधना करें /मन के भीतर जाए /अंतस मैल हटाय/
मन वचन कर्म रखें शुद्ध /औरों को सुखी बनाएं।’
ऐसे मन से जीवन के सफर को पार करने का जीवट प्रदान किया है।जब अंतरज्योति जगे तब विकार हटे।
इसी प्रकार अपरिग्रह नामक कविता में-
‘महावीर के अपरिग्रह को सोचें/समझें/और उलट फेर से बचकर /विकारों को मिटाएं/जीवन सुखी बनाएं।
कवयित्री सुशीला जी भंडारी की कविताओं में केवल स्वान्त सुखाय का भाव ही प्रकट नहीं हुआ है अपितु युग बोध की चेतना को विकसित करने के महान भाव भी प्रकट हुआ है। जीवन के यथार्थ को पहचान कर जग कल्याण करने, समाज व देश का कल्याण करने का महती भाव प्रकट हुआ है जो कि उनकी समग्र जीवन दृष्टि की गहराई व उच्च लेखन शक्ति को भी उजागर करती है।
जैसे- जैसे यह काव्य संग्रह पढ़ते है वैसे-वैसे हम शब्दों के ऐसे सुनहले संसार में विचरण करने लगते है जिसमें अंतर्मन को विकार रहित करने का अनुरोध है, जीवन पथ को नकारात्मक भावों से रहित करने का भाव भी है, मनुष्य को एकता के सूत्र में पिरोकर जग कल्याण करने का महनीय लक्ष्य भी है और सबसे बढ़कर है कवयित्री की जीवन के प्रति आशावादी सोच व प्रबल जिजीविषा का भाव, जो हीनता के मलीन पंक को साफ कर स्वर्ग सम सुंदर जीवन की परिकल्पना से भर देता है।
मैं कवयित्री सुशीला जी भंडारी को हार्दिक बधाई देती हूँ कि उम्र के इस मुकाम पर भी वे निरंतर सक्रियता से साहित्य जगत के आकाश में ज्ञान का ऐसा दीप जला रही है जो उन्हें समस्त मानवता के पथ को आलोकित करने का सुअवसर प्रदान कर रहा है। यह ज्ञान का दीपक जलता ही रहे, कवयित्री की लेखनी को नया सृजन पथ दिखाता ही रहे ऐसी ही मेरी मनोकामना है।आशा है हमें आगे भी उत्तम काव्य संग्रह पढ़ने को मिलेंगे जो कवयित्री को साहित्य जगत का चमकता सितारा बनाएंगे, नव पीढ़ी को प्रेरित करने का महनीय कर्तव्य पथ सुशोभित करेंगे। आपके उज्ज्वल भविष्य की कामना है।

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor