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Thursday, March 12, 2026, 10:42 am

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अभिव्यक्ति के आसमां पर शब्दों का प्रकाशपुंज…भीड़ से अलग अंशु हर्ष ने बनाई शाश्वत पहचान

परिचय : अंशु हर्ष : 

अंशु हर्ष समकालीन हिंदी साहित्य की सक्रिय, बहुआयामी और प्रतिबद्ध रचनाकार हैं। पिछले लगभग 14 वर्षों से वे लेखन और साहित्य के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं तथा 13 वर्षों से सिम्पली जयपुर मैगज़ीन और वॉइस ऑफ जयपुर की पब्लिशर एवं संपादक के रूप में साहित्यिक-सांस्कृतिक सरोकारों को सशक्त मंच प्रदान कर रही हैं। उनका व्यक्तित्व लेखन, संपादन, अनुवाद, प्रकाशन और साहित्यिक आयोजनों में सक्रिय सहभागिता का एक समन्वित उदाहरण है।

साहित्यिक मंचों पर सक्रिय उपस्थिति

अंशु हर्ष ने देश के प्रतिष्ठित साहित्यिक आयोजनों में वक्ता के रूप में अपनी प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज करवाई है।

  • जयपुर लिटरेचर फ़ेस्टिवल में वर्ष 2015, 2019, 2022, 2023 और 2026 में बतौर स्पीकर सहभागिता।

  • प्रभा खेतान फाउंडेशन के कार्यक्रम ‘कलम’ में रायपुर, बिलासपुर और जोधपुर में भागीदारी।

  • शेखावाटी साहित्य संगम (2023, 2024) में वक्ता के रूप में सहभागिता।

  • ब्रज महोत्सव 2023 में आमंत्रित वक्ता।

  • मेवाड़ टॉक फेस्ट 2025 में विशेष स्पीकर के रूप में उपस्थिति।

  • चिल्ड्रंस लिटरेचर फेस्टिवल ‘किताबों’, जोधपुर (2017, 2018) में सहभागिता।

  • जवाहर कला केंद्र, जयपुर में आयोजित समर कैंप में 20 दिवसीय राइटिंग वर्कशॉप का संचालन।

इन मंचों पर उनकी उपस्थिति न केवल उनके साहित्यिक योगदान को रेखांकित करती है, बल्कि युवा रचनाकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी है।

प्रकाशित कविता संग्रह

अंशु हर्ष की कविताएँ संवेदना, आध्यात्मिकता, प्रेम और जीवन-दर्शन का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करती हैं।

  1. “शब्दों का समंदर” (2013) – बोधि प्रकाशन

  2. “शब्दों का समंदर” (द्वितीय संस्करण, 2019) – बोधि प्रकाशन

  3. “ए प्लेटोनिक लव” (2021) – बोधि प्रकाशन

  4. “समंदर दी ओशन” (2021) – अंग्रेज़ी अनुवाद, राजमंगल पब्लिकेशन

  5. “तुम ठाकुर मेरे” (2024) – सिम्पली जयपुर पब्लिकेशन

इन संग्रहों में प्रेम, आध्यात्मिक समर्पण और मानवीय भावनाओं की गहराई स्पष्ट रूप से झलकती है।

संपादित कविता संग्रह

अंशु हर्ष ने अनेक कवियों को मंच प्रदान करते हुए सामूहिक काव्य संग्रहों का संपादन भी किया है—

  • “मुक्ताकाश” (2018) – 51 कविमन संग्रह

  • “एक नया मुक्ताकाश” (2020) – दस कविमन संग्रह

  • “शब्द ए सफर” (2024) – 21 कविमन संग्रह

इन संकलनों के माध्यम से उन्होंने नवोदित और स्थापित कवियों की रचनाओं को व्यापक पाठक वर्ग तक पहुँचाया।

पुस्तक संपादन

अंशु हर्ष ने कई महत्वपूर्ण पुस्तकों का संपादन किया है—

  • पंडित विजय शंकर मेहता (जीवन प्रबंधन गुरु, उज्जैन) की पुस्तक

  • “कोरोना जंग की सप्तपदी” (2020) – मंजुल पब्लिकेशन

  • “कहानियां जीवन की” (2021) – सिम्पली जयपुर पब्लिकेशन

  • “स्वास्थ रामायण” (2024) – मंजुल पब्लिकेशन

इन पुस्तकों में सामाजिक, आध्यात्मिक और जीवन-प्रबंधन विषयों पर सारगर्भित सामग्री प्रस्तुत की गई है।

पुस्तक अनुवाद

साहित्य के साथ-साथ अंशु हर्ष ने अनुवाद क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य किया है—

  • डॉ. आइवान माइसनर की बिजनेस लेसन पर आधारित पुस्तक का हिंदी अनुवाद –
    “नॉलेजप्रेन्योर” (2022) – सिम्पली जयपुर पब्लिकेशन

इस अनुवाद के माध्यम से उन्होंने अंतरराष्ट्रीय व्यावसायिक विचारों को हिंदी पाठकों तक पहुँचाने का महत्वपूर्ण कार्य किया।

अन्य प्रमुख पुस्तकें

  • “महाभारत के हनुमान” (2023) – सिम्पली जयपुर पब्लिकेशन

  • “इच्छा मृत्यु” – वाणी प्रकाशन, दिल्ली

(इन कृतियों में भारतीय पौराणिक परंपरा, आध्यात्मिक विमर्श और सामाजिक संवेदनाओं का गंभीर विश्लेषण देखने को मिलता है।)

सूर्यनगरी की तेजस्वी बेटी : अंशु हर्ष 

सूर्यनगरी की यह बेटी सचमुच सूर्य की किरणों का प्रकाशपुंज है। जन्म जयपुर में हुआ है और अलग-अलग जगहों रहे। मूल रूप से मेड़ता सिटी की अंशु बेटी है, लेकिन जोधपुर और मेड़ता में कोई भेद नहीं रहा है। उनके हाथ में मानो पूरा आसमान है—संभावनाओं से भरा, सपनों से सजा और उपलब्धियों से दमकता हुआ। अंशु हर्ष केवल एक नाम नहीं, बल्कि प्रेरणा, ऊर्जा और सकारात्मकता का प्रतीक हैं। वे सिद्ध करती हैं कि यदि मन में दृढ़ निश्चय, कर्म में निरंतरता और संस्कारों में दृढ़ता हो, तो व्यक्ति स्वयं सूर्य सा तेजस्वी बन सकता है और अपने प्रकाश से अनगिनत जीवनों को आलोकित कर सकता है।

आलेख : दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर

9783414079 diliprakhai@gmail.com

सूर्य की पहली किरण जब क्षितिज को स्पर्श करती है, तो वह केवल प्रकाश ही नहीं लाती, बल्कि आशा, ऊर्जा और नई शुरुआत का संदेश भी देती है। “अंशु” शब्द का अर्थ भी सूर्य की पहली किरण है—वह किरण जो अंधकार को चीरकर उजाले का मार्ग प्रशस्त करती है। इसी अर्थ को अपने व्यक्तित्व में साकार करती हैं सूर्यनगरी की तेजस्वी बेटी अंशु हर्ष।

जोधपुर, जिसे स्नेहपूर्वक सूर्यनगरी कहा जाता है, अपनी स्वर्णिम धूप, नीले घरों और सांस्कृतिक वैभव के लिए प्रसिद्ध है। अंशु मूल रूप से मेड़ता सिटी की बेटी है, लेकिन जोधपुर और मेड़ता में कोई भेद नहीं रहा है। अंशु हर्ष ने अपने कर्म, प्रतिभा और संस्कारों से इस शहर के नाम को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया है। जिस प्रकार सूर्य की किरणें पूरे आकाश को आलोकित करती हैं, उसी प्रकार अंशु ने अपने बहुआयामी व्यक्तित्व से समाज के विभिन्न क्षेत्रों में प्रकाश फैलाया है।

एक सफल एन्टरप्रेन्योर के रूप में अंशु ने अपने साहस, दूरदृष्टि और नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया है। व्यवसाय केवल लाभ का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के लिए अवसर सृजित करने का साधन भी है—इस सिद्धांत को उन्होंने अपने कार्यों से सिद्ध किया है। चुनौतियों को अवसर में बदलना और नवाचार को अपनाना उनकी कार्यशैली की पहचान है।

लेखन के क्षेत्र में अंशु एक संवेदनशील लेखिका हैं। उनके शब्दों में जीवन की गहराई, समाज की सच्चाइयाँ और मानवीय भावनाओं की सजीव अभिव्यक्ति दिखाई देती है। एक कवयित्री के रूप में वे भावनाओं को ऐसी कोमलता और प्रभावशीलता से पिरोती हैं कि पाठक स्वयं को उनके शब्दों में ढूँढने लगता है। उनकी कविताओं में कभी आशा की किरण झलकती है, तो कभी आत्मचिंतन की गंभीरता।

संपादक और पब्लिशर के रूप में अंशु ने साहित्यिक प्रतिभाओं को मंच प्रदान करने का कार्य किया है। वे केवल स्वयं सृजन नहीं करतीं, बल्कि अन्य रचनाकारों को भी आगे बढ़ने का अवसर देती हैं। यह उनके व्यापक दृष्टिकोण और सहयोगी स्वभाव का प्रमाण है। साहित्य और प्रकाशन के क्षेत्र में उनका योगदान नई पीढ़ी के लेखकों के लिए प्रेरणा स्रोत है।

इन सभी उपलब्धियों के बीच अंशु का सबसे सुंदर पक्ष है उनका संस्कारित व्यक्तित्व। आधुनिकता और परंपरा के संतुलन को उन्होंने अपने जीवन में सहजता से साधा है। वे भारतीय संस्कृति, मूल्यों और नैतिकता को अपने व्यवहार में जीवित रखती हैं। सफलता की ऊँचाइयों पर पहुँचकर भी विनम्रता और सादगी को बनाए रखना उनकी विशेषता है।

सूर्यनगरी की यह बेटी सचमुच सूर्य की किरणों का प्रकाशपुंज है। उनके हाथ में मानो पूरा आसमान है—संभावनाओं से भरा, सपनों से सजा और उपलब्धियों से दमकता हुआ। अंशु हर्ष केवल एक नाम नहीं, बल्कि प्रेरणा, ऊर्जा और सकारात्मकता का प्रतीक हैं। वे सिद्ध करती हैं कि यदि मन में दृढ़ निश्चय, कर्म में निरंतरता और संस्कारों में दृढ़ता हो, तो व्यक्ति स्वयं सूर्य सा तेजस्वी बन सकता है और अपने प्रकाश से अनगिनत जीवनों को आलोकित कर सकता है।

पिता कांतिप्रकाश पुलिस अफसर, मां गंगा पुरोहित गृहिणी, पति सोमेन्द्र सॉफ्टवेयर इंजीनियर

सूर्यनगरी की तेजस्वी बेटी अंशु हर्ष का जीवन केवल उपलब्धियों की कहानी नहीं, बल्कि संस्कार, संघर्ष, धैर्य और आत्मविश्वास की एक प्रेरक यात्रा है। वर्ष 2000 में उनका विवाह सोमेन्द्र हर्ष से हुआ, जो एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं और राजस्थान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल के फाउंडर डायरेक्टर हैं। विवाह के समय अंशु केवल 12वीं उत्तीर्ण थीं, किंतु उन्होंने जीवन को यहीं थमने नहीं दिया। शादी के बाद उन्होंने अपनी ग्रेजुएशन पूरी की और यह सिद्ध किया कि शिक्षा और आत्मविकास की कोई आयु-सीमा नहीं होती।

अंशु के व्यक्तित्व की गहराई उनके पारिवारिक संस्कारों से जुड़ी है। उनके पिता कांतिप्रकाश पुरोहित एक पुलिस अधिकारी रहे हैं। पुलिस सेवा का जीवन अनुशासन, कर्तव्यनिष्ठा और निरंतर स्थानांतरण से भरा होता है। हर तीन-चार वर्ष में उनका ट्रांसफर होता रहा—कभी चूरू, कभी सुजानगढ़, कभी राजगढ़। अंशु का जन्म जयपुर में हुआ, किंतु पिता के साथ वे कई छोटे-बड़े शहरों और गांवों में रहीं। इस निरंतर बदलाव ने उन्हें जीवन के विविध रंगों से परिचित कराया। अलग-अलग परिवेश, संस्कृतियाँ और लोगों के अनुभव उनके मन में गहराई तक उतरते गए, जो आगे चलकर उनके लेखन की संवेदनशीलता और व्यापक दृष्टिकोण का आधार बने।

उनकी माताजी गंगा पुरोहित गृहिणी हैं, किंतु अंशु के जीवन में उनका प्रभाव अत्यंत गहरा है। अंशु कहती हैं कि उनकी मां ने धैर्य सिखाया—कहकर नहीं, बल्कि जीकर दिखाया। एक पुलिस अधिकारी की पत्नी होने के नाते जिस संयम, साहस और धैर्य की आवश्यकता होती है, वह उन्होंने अपनी मां में देखा। पुलिस, सेना, पत्रकारिता और चिकित्सा जैसे पेशों में व्यक्ति को निजी जीवन से अधिक सार्वजनिक जीवन में जीना पड़ता है। ऐसे में परिवार का संतुलन, बच्चों का पालन-पोषण और भावनात्मक स्थिरता बनाए रखना आसान नहीं होता। यह सामंजस्य, यह प्रतीक्षा और हर परिस्थिति में ईश्वर पर अटूट विश्वास—अंशु ने अपनी मां से ही सीखा।

विवाह के पश्चात जब उनकी पहली संतान के रूप में बेटा और बाद में बेटी का जन्म हुआ, तभी उनके भीतर सृजन के भाव जाग्रत हुए। मातृत्व की कोमल अनुभूति ने उनके मन में संवेदनाओं का एक नया संसार रच दिया। पहली अभिव्यक्ति कविता के रूप में हुई। हालांकि उस समय उन्होंने अपनी रचना किसी प्रकाशन के लिए नहीं भेजी, परंतु शब्दों के प्रति उनका लगाव गहराता गया।

कुछ समय बाद उन्होंने एक आलेख लिखा, जिसे उन्होंने बिना किसी सिफारिश के दैनिक भास्कर समाचारपत्र में भेजा। जब वह आलेख प्रकाशित हुआ और वे विजेता घोषित हुईं, तो यह उनके जीवन का निर्णायक क्षण था। इस सफलता ने उनके भीतर आत्मविश्वास का दीप प्रज्वलित किया। उन्हें लगा कि उनके भीतर एक सशक्त लेखक तत्व विद्यमान है। इसके बाद उन्होंने निरंतर लेखन आरंभ किया। उनके लेख और कविताएं विभिन्न मंचों पर प्रकाशित होने लगीं, और वे साहित्य-जगत में अपनी पहचान बनाने लगीं।

अंशु हर्ष की यात्रा यह बताती है कि परिस्थितियां चाहे जैसी हों, यदि संस्कारों की नींव मजबूत हो, धैर्य का संबल हो और आत्मविश्वास का दीप जलता रहे, तो हर साधारण आरंभ असाधारण उपलब्धियों में बदल सकता है।

अंशु का व्यक्तित्व परंपरा और आधुनिकता के संतुलन का सजीव उदाहरण है। वह स्वयं कहती हैं कि वे करवा चौथ का व्रत नहीं करतीं। इसका अर्थ यह नहीं कि वे आध्यात्मिक नहीं हैं या भारतीय संस्कृति से दूर हैं। वे आरंभ से तीज का व्रत करती आई हैं, क्योंकि उस पर्व से उनका भावनात्मक जुड़ाव है। करवा चौथ को वे टेलीविजन संस्कृति की देन मानती हैं—एक ऐसा उत्सव जो उन्होंने देखा तो है, पर उसके साथ आत्मिक संबंध स्थापित नहीं कर पाईं। इसी वैचारिक पृष्ठभूमि में उनकी यह चर्चित कविता सामने आती है—

मैं तुम्हारे लिए करवा चौथ नहीं करती…

कितने बरस हो गए हैं ब्याह को
मैं यह परंपरा नहीं निभाती
तुम्हारे लिए मैं करवा चौथ नहीं करती

मुझे याद है अपनी साक्षी थी
हमारे बंधन की
जब कुछ वचन लिए थे हमने-
एक दूजे के लिए
अस्तु कहा था मैंने
जुबान की बहुत पक्की हूं
हर कर्तव्य निभाती हूं
बस करवा चौथ नहीं मनाती

बहुत शौक था मुझे गहने पहनने का
तुम्हारे हर संघर्ष को
पहन लिया पायल की तरह
बस अब उसी की खनक है
जिंदगी में चारों ओर
अब मैं चूड़ी, बिंदी भी नहीं पहनती
और हां, तुम्हारे लिए मैं करवा चौथ भी नहीं करती

हर सुबह तुम्हारे सिर पर हाथ फेरकर
तुम्हें उठाती हूं
बहुत प्यार से तुम्हारे लिए कॉफी भी बनाती हूं
लेकिन मैं खुद के लिए चाय बनाना नहीं भूलती
और हां तुम्हारे लिए करवा चौथ नहीं करती

अलमारी से तुम्हें कपड़े निकालकर देती हूं
इस पेंट पर यह शर्ट पहनो
डिजाइनर की तरह कहती हूं
अब मैं तुम्हारे कपड़े अपने हाथ से नहीं धोती
और हां तुम्हारे लिए मैं करवा चौथ भी नहीं करती

तुम्हारी हर उलझन को अपनी जुल्फ की तरह
सुलझा देती हूं
कोई तकलीफ होती है तो ढाल लेकर तुम्हारे
आगे चलती हूं
सिंदूर मांग में भरे एक अरसा हो गया है
और हां तुम्हारे लिए मैं करवा चौथ भी नहीं करती

तुम्हारी एक मुस्कुराहट पर मैं वारी जाती हूं
उदासी का आलम तुम्हें छू भी ना पाए
बस यही चाहती हूं
अपने किसी दर्द की मैं फिक्र नहीं करती,
लेकिन हां, तुम्हारे लिए मैं करवा चौथ नहीं करती

चांद मेरा दोस्त है, कभी आधा, कभी पूरा
मैं हर रोज उससे अपने मन की बातें करती हूं
लेकिन तुम्हारे लिए मैं चांद का इंतजार नहीं करती
क्योंकि तुम्हारे लिए मैं करवा चौथ नहीं करती।

कविता परंपरा विरोधी नहीं पर भावों की प्रामाणिकता के पक्ष में 

यह कविता परंपरा के विरोध में नहीं, बल्कि भावनाओं की प्रामाणिकता के पक्ष में खड़ी दिखाई देती है। अंशु यहां किसी व्रत या रीति का उपहास नहीं करतीं, बल्कि यह स्पष्ट करती हैं कि संबंधों की मजबूती केवल प्रतीकों से नहीं, बल्कि प्रतिदिन निभाए जाने वाले दायित्वों और प्रेम से आती है।

कविता का केंद्रीय भाव है—“रिश्ता व्रत से नहीं, वचन से चलता है।” विवाह के समय लिए गए संकल्पों को वे अधिक महत्त्व देती हैं। “जुबान की बहुत पक्की हूं, हर कर्तव्य निभाती हूं”—यह पंक्ति बताती है कि उनके लिए प्रेम दिखावे का नहीं, जिम्मेदारी का विषय है।

“तुम्हारे हर संघर्ष को पहन लिया पायल की तरह”—यह अत्यंत सशक्त रूपक है। यहां पत्नी केवल सहचर नहीं, संघर्ष-सहयोगिनी बनकर उभरती है। वह पारंपरिक श्रृंगार का त्याग कर देती है, पर संबंध का संगीत उसके जीवन में गूंजता रहता है।

कविता में एक आधुनिक स्त्री की स्पष्ट छवि उभरती है—जो पति के लिए कॉफी बनाती है, पर स्वयं के लिए चाय बनाना नहीं भूलती। यह ‘सेल्फ इश्क’ का सुंदर प्रतीक है। वह प्रेम करती है, पर स्वयं को खोती नहीं। वह साथ देती है, पर आत्मसम्मान बनाए रखती है।

“ढाल लेकर तुम्हारे आगे चलती हूं”—यह पंक्ति स्त्री को केवल संरक्षित होने वाली नहीं, बल्कि संरक्षक के रूप में प्रस्तुत करती है। यहां अंशु रिश्ते में समानता, साझेदारी और आत्मबल की बात करती हैं।

चांद से संवाद और चांद का इंतजार न करना—यह भाव अत्यंत मार्मिक है। वह प्रेम को प्रतीक्षा के बंधन में नहीं बांधती। उसका प्रेम दैनिक जीवन की छोटी-छोटी बातों में जीवित है।

अंशु इस कविता में आधुनिक होते हुए भी रिश्तों को निभाने वाली, आत्मसम्मान से भरी, संवेदनशील और आत्मप्रेम करने वाली महिला के रूप में सामने आती हैं। वे यह संदेश देती हैं कि प्रेम का मूल्य व्रत की भूख-प्यास से नहीं, बल्कि हर दिन के समर्पण, संवाद और विश्वास से तय होता है। यही उनकी कल्पना की शक्ति है—जहां स्त्री परंपरा का सम्मान करती है, पर अपनी चेतना और स्वतंत्रता के साथ।

अंशु की एक और कविता इस प्रकार है-

कविता : अब मैं नहीं आऊंगी तुमसे मिलने

अब मैं नही आऊंगी तुमसे मिलने

अब तुम्हें मुझसे मिलने आना है

ख्याल रखना है तुम्हें

कयोंकि यह रिश्ता पुराना है…।

प्रेम एक तरफा नहीं, रिश्ते तभी जीवित रहते हैं जब दोनों पक्ष समान संवेदनशील हो

यह छोटी-सी कविता आकार में भले संक्षिप्त है, पर भावों में अत्यंत व्यापक है। अंशु यहां केवल मिलने-जुलने की बात नहीं कर रहीं, बल्कि रिश्तों में संतुलन, आत्मसम्मान और पारस्परिकता की मांग रख रही हैं। “अब मैं नहीं आऊंगी…” में कोई रूठापन नहीं, बल्कि एक थकी हुई संवेदना है—जो लंबे समय तक निभाने के बाद अब बराबरी चाहती है।

कविता की दूसरी पंक्ति पुनरावृत्ति के माध्यम से दृढ़ निश्चय को रेखांकित करती है। यह निर्णय आवेग का नहीं, बल्कि अनुभव का परिणाम प्रतीत होता है। “अब तुम्हें मुझसे मिलने आना है”—यह आग्रह नहीं, अपेक्षा है। संबंध यदि पुराना है, तो उसकी जिम्मेदारी भी साझा होनी चाहिए।

“ख्याल रखना है तुम्हें”—यह पंक्ति बहुत अर्थपूर्ण है। यहां अंशु स्वयं को केंद्र में रखती हैं। वे बताती हैं कि प्रेम एकतरफा प्रयास नहीं हो सकता। रिश्ते तभी जीवित रहते हैं जब दोनों पक्ष समान रूप से संवेदनशील हों।

अंशु की भावनाओं में एक आधुनिक स्त्री का आत्मबोध झलकता है। वह प्रेम करती है, पर स्वयं को विस्मृत नहीं करती। वह मिलती रही, निभाती रही, पर अब चाहती है कि सामने वाला भी कदम बढ़ाए। यह स्वाभिमान का स्वर है, दूरी का नहीं।

अंशु की कल्पना में रिश्ता एक ऐसा वृक्ष है, जिसे दोनों ओर से सींचना आवश्यक है। यदि एक ही पक्ष जल देता रहे, तो वह सूखने लगता है। इसलिए यह कविता किसी अंत की घोषणा नहीं, बल्कि नए संतुलन की शुरुआत है—जहां प्रेम में समानता, संवाद और परस्पर प्रयास अनिवार्य हैं।

अगले जनम मोहे बिटिया ना कीजो की तर्ज पर अंशु की एक और भावपूर्ण कविता है-

कविता : अगले जनम में मुझे चांदी बना देना…

अगले जनम में मुझे चांदी बना देना

जो बन सके तुम्हारी देहरी
जिस पर तुम कदम रखते हो

अगले जनम में मुझे चांदी बना देना

जिससे बन सके एक दीया
जो हर दिन तुम्हारी आरती उतारे

बना देना वो चांदी
जिससे बन सके तुम्हारा मुकुट
जो सज सके तुम्हारे मस्तक पर

या बना देना छत्र
जो सदैव छाया देता है तुम्हें

अगले जनम बना देना मुझे चांदी
जिससे बन सके तुम्हारी गदा
हर प्रहार मंजूर होगा मुझे तुम्हारा दिया हुआ

बना देना मुझे निर्जीव चांदी
जो हर रूप में ढल जाए तुम्हारे लिए

बस अगले जनम में मुझे बेटी मत बनाना
जो इस दुनिया के नियम कायदे निभाए…।

नारी वेदना और सशक्तिकरण का गहन स्वर

यह कविता प्रथम दृष्टया समर्पण की प्रतीक लगती है, पर गहराई से देखने पर यह नारी वेदना और सामाजिक विडंबना का तीखा बयान है। “मुझे चांदी बना देना”—यह इच्छा वस्तुतः मनुष्य रूप में मिली पीड़ा से मुक्ति की चाह है। देहरी, दीया, मुकुट, छत्र और गदा—ये सभी प्रतीक पूजनीयता, संरक्षण और शक्ति से जुड़े हैं। अंशु स्वयं को इन रूपों में ढालने की बात करती हैं, अर्थात वह त्याग, सेवा और समर्पण की पराकाष्ठा को व्यक्त करती हैं।

लेकिन कविता का अंतिम चरण पूरी संवेदना को झकझोर देता है—“बस अगले जनम में मुझे बेटी मत बनाना।” यही पंक्ति इस रचना का केन्द्रीय बिंदु है। यहां नारी की वह पीड़ा उभरती है, जो सामाजिक नियम-कायदों, अपेक्षाओं और बंधनों में जकड़ी रहती है। बेटी के रूप में जन्म लेना मानो जिम्मेदारियों, मर्यादाओं और त्याग की अनंत श्रृंखला में प्रवेश करना है।

चांदी का “निर्जीव” होना भी प्रतीकात्मक है—वह कहती हैं कि वस्तु बन जाना शायद आसान है, क्योंकि वस्तु पर प्रश्न नहीं उठते, उसे नियमों का बोझ नहीं उठाना पड़ता।

यह कविता नारी सशक्तिकरण का विरोध नहीं, बल्कि उसका आह्वान है। अंशु यह दिखाती हैं कि स्त्री हर रूप में ढल सकती है—देहरी भी, मुकुट भी, और गदा भी। वह शक्ति भी है और छाया भी। परंतु वह चाहती है कि उसे केवल त्याग और नियमों के दायरे में सीमित न किया जाए।

अंशु ने अत्यंत गहरे भावों के माध्यम से समाज में स्त्री की स्थिति, उसके समर्पण और उसकी मौन वेदना को मार्मिक रूप से अभिव्यक्त किया है। यह कविता प्रश्न भी है और चेतना भी।

ए प्लेटोनिक लव कविता संग्रह से डिवाइन लव या आध्यात्मिक प्रेम पर आधारित कविता भी अंशु की महत्वपूर्ण रचना है। इस संग्रह में अधिकतर कविताएं आध्यात्मिक कविताएं हैं। एक कविता अंशु की देखिए-

कविता : मैं आना चाहती थी…

मैं आना चाहती थी तुमसे मिलने

लेकिन सूरज का ताप बहुत तेज था

मैं आना चाहती थी तुमसे मिलने

रास्ते में कोहरा बहुत था

मैं आना चाहती थी तुमसे मिलने

वो बादल बहुत जमकर बरसा

मैं आना चाहती थी तुमसे मिलने

अमावस का अंधेरा बहुत था

मैं आना चाहती थी तुमसे मिलने

नदी में नाव नहीं थी

मैं आना चाहती थी तुमसे मिलने

लेकिन शायद मेरी चाहत में कमी थी

वरना तुम एक पगडंडी बना देते मेरे लिए

तुम तो त्रिलोकी के मालिक हो

तुम्हारे पास क्या कमी थी…।

‘ए प्लेटोनिक लव’ के संदर्भ में आध्यात्मिक प्रेम की अभिव्यक्ति

अंशु हर्ष के कविता संग्रह ए प्लेटोनिक लव में प्रेम लौकिक सीमाओं से ऊपर उठकर दिव्य और आत्मिक आयाम ग्रहण कर लेता है। प्रस्तुत कविता उसी आध्यात्मिक भावभूमि की सशक्त अभिव्यक्ति है। यहां ‘तुम’ कोई सांसारिक प्रिय नहीं, बल्कि परम सत्ता—ईश्वर या ब्रह्म का प्रतीक प्रतीत होता है।

कविता में बार-बार दोहराई गई पंक्ति “मैं आना चाहती थी तुमसे मिलने” साधक की तड़प को दर्शाती है। सूरज का ताप, कोहरा, वर्षा, अमावस का अंधेरा, नदी में नाव का न होना—ये सभी बाहरी अवरोध प्रतीक हैं जीवन की कठिनाइयों, संशयों और माया के। साधक ईश्वर से मिलना चाहता है, पर परिस्थितियां उसे रोकती रहती हैं।

कविता का मोड़ अत्यंत मार्मिक है—“लेकिन शायद मेरी चाहत में कमी थी।” यहां अंशु आत्ममंथन करती हैं। वह बाधाओं को दोष देने के बजाय अपनी भक्ति की तीव्रता पर प्रश्न उठाती हैं। यह भाव भक्ति-साहित्य की परंपरा से जुड़ा है, जहां सच्ची साधना में पूर्ण समर्पण अपेक्षित है।

“तुम तो त्रिलोकी के मालिक हो”—यह पंक्ति ईश्वर की सर्वशक्तिमत्ता को स्वीकार करती है। साधक को विश्वास है कि यदि चाहत सच्ची हो, तो ईश्वर स्वयं मार्ग बना देते हैं।

‘ए प्लेटोनिक लव’ के संदर्भ में यह कविता शुद्ध, निरपेक्ष और आत्मिक प्रेम का साक्ष्य है—जहां मिलन भौतिक नहीं, आत्मा और परमात्मा का संवाद है। अंशु ने सरल शब्दों में गहन आध्यात्मिक अनुभूति को अत्यंत प्रभावी ढंग से व्यक्त किया है।

प्रेम पर ही अंशु की एक और कविता देखिए-

कविता : तुम्हारा प्रेम

तुम्हारा प्रेम
अनकहा, अनछुआ
और मेरे हृदय में उसका मासूम अहसास

तुम्हारा प्रेम दिव्य, तेजस्वी, उज्ज्वल
और मेरे हृदय में उसका अहसास
जलती हुई ज्योत सा

तुम्हारा प्रेम
मेरे लिए मेरे जीवन का सहारा
और मेरे अधरों पर एक मुस्कान
उस साथ की, अहसास की

तुम्हारा प्रेम मेरे आसपास
हवा की तरह बहता हुआ
और मैं आंखें मूंदकर
बांहों का सहारा मानकर
चलती हुई

तुम्हारा प्रेम
मेरे जीवन की पूर्णता
और अधूरी सी मैं
हर पल तुम्हें खोजती हुई।

प्रेम के अनेक रूपों की उज्ज्वल अभिव्यक्ति

अंशु की यह कविता प्रेम को किसी एक संबंध की सीमा में नहीं बांधती, बल्कि उसे व्यापक और बहुआयामी भाव के रूप में प्रस्तुत करती है। “अनकहा, अनछुआ” प्रेम—यह पंक्ति बताती है कि सच्चा प्रेम शब्दों और स्पर्श से परे भी हो सकता है। वह अनुभूति है, जो हृदय में ज्योति की तरह जलती रहती है।

कविता में प्रेम को “दिव्य, तेजस्वी, उज्ज्वल” कहा गया है। यहां प्रेम लौकिक आकर्षण नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ऊर्जा बनकर सामने आता है। यह वही प्रेम है जो शबरी की प्रतीक्षा में दिखता है, जिसने वर्षों तक राम के आगमन की आशा में अपने भावों को संजोए रखा; यह वही प्रेम है जो मीरा की भक्ति में झलकता है, जहां सांसारिक बंधन गौण हो जाते हैं; और यह वही करुणा और मुक्ति का प्रेम है, जो अहिल्या की कथा में प्रकट होता है।

अंशु के शब्दों में प्रेम हवा की तरह है—अदृश्य, पर सर्वव्यापी। वह सहारा भी है और मुस्कान भी। यह प्रेम मां के वात्सल्य में, बहन के स्नेह में, मित्र की आत्मीयता में और पत्नी के समर्पण में समान रूप से प्रवाहित हो सकता है। प्रेम केवल रोमांटिक संबंध नहीं, बल्कि अस्तित्व की पूर्णता का आधार है।

“मेरे जीवन की पूर्णता और अधूरी सी मैं”—यह पंक्ति अत्यंत गहरी है। यहां प्रेम आत्मा की उस खोज का प्रतीक है, जो स्वयं को पूर्ण करने के लिए दूसरे में अपना अंश ढूंढती है। यह खोज ईश्वर तक भी जा सकती है, क्योंकि परमात्मा से प्रेम भी इसी दिव्यता का विस्तार है।

अंशु ने इस कविता में प्रेम को एक ज्योति, एक सहारा और एक आध्यात्मिक अनुभूति के रूप में चित्रित किया है। सरल शब्दों में उन्होंने प्रेम की उस व्यापकता को व्यक्त किया है, जो जीवन को अर्थ, ऊर्जा और पूर्णता प्रदान करती है।

कायनात से संवाद : अंशु के लेखन की विराट प्रेरणा

अंशु मानती हैं कि लेखन किसी एक अनुभव, एक व्यक्ति या एक घटना से जन्म नहीं लेता, बल्कि वह पूरी सृष्टि के स्पंदन से उपजता है। उनके लिए प्रकृति केवल दृश्य नहीं, बल्कि जीवंत प्रेरणा है। नदियों की अविरल धारा, समंदर की अथाह गहराई, पहाड़ों की स्थिरता, झरनों की चंचलता—ये सब उनके भीतर शब्दों के बीज बोते हैं। प्रकृति का हर रूप उन्हें जीवन का कोई न कोई रहस्य समझा जाता है। नदी सिखाती है निरंतर बहना, समंदर सिखाता है विस्तार, पहाड़ सिखाते हैं धैर्य और झरने सिखाते हैं उल्लास।

अंशु कहती हैं कि एक लेखक केवल बाहरी दुनिया को नहीं देखता, वह उसे महसूस भी करता है। “दर्द को छुआ, खुशी को महसूस किया”—यह उनके सृजन का मूल मंत्र है। वे मानती हैं कि जब तक पीड़ा भीतर तक न उतरे और जब तक खुशी आत्मा को स्पर्श न करे, तब तक शब्दों में सच्चाई नहीं उतरती। इसलिए उनके लिए सुख-दुख, हंसी-खुशी, पीड़ा-उदासी—ये सब जीवन के रंग हैं, जो साहित्य की कैनवास पर आकार लेते हैं।

उनके विचार में खूबसूरत लोग भी प्रेरणा का महत्वपूर्ण स्रोत हैं। यहां खूबसूरती केवल बाहरी रूप की नहीं, बल्कि मन की निर्मलता, व्यवहार की सादगी और संवेदनाओं की गहराई की है। वे मानती हैं कि हर व्यक्ति अपने भीतर एक कहानी लिए चलता है। लेखक का कार्य है उन कहानियों को सुनना, समझना और शब्द देना।

अंशु के अनुसार, पूरी कायनात एक लेखक की पाठशाला है। आकाश की विशालता, धरती की सहनशीलता, ऋतुओं का परिवर्तन—ये सब जीवन के पाठ हैं। लेखक और कवि सृष्टि का सजग पर्यवेक्षक (ऑब्जर्वर) होता है। वह देखता है, पर केवल आंखों से नहीं—मन और आत्मा से भी। वह समाज की हलचल, प्रकृति की ध्वनियां और मनुष्य के अंतर्द्वंद्व को शब्दों में रूपांतरित करता है।

उनके लिए लेखन का फलक आसमान तक विस्तारित है। साहित्य सीमाओं में बंधा नहीं होता। वह भाषा, देश और समय की परिधि को पार कर जाता है। कवि पूरी कायनात का प्रतिनिधित्व करता है, क्योंकि उसकी संवेदनाएं व्यक्तिगत होते हुए भी सार्वभौमिक होती हैं। जब वह लिखता है, तो केवल अपने लिए नहीं, बल्कि उन सभी के लिए लिखता है, जो अपने भीतर कुछ महसूस करते हैं पर कह नहीं पाते।

अंशु का मानना है कि सच्चा साहित्य वही है, जो प्रकृति और मानवता दोनों से संवाद करे। जो जीवन को उसके समग्र रूप में देखे—उजाले और अंधेरे दोनों के साथ। यही कारण है कि उनका लेखन केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि अनुभवों का विस्तार है। उनकी दृष्टि में लेखक वह है, जो कायनात के हर स्पंदन को सुन सके और उसे सृजन की रोशनी में बदल सके।

लेखन: अभिव्यक्ति की शक्ति और आत्मा की थैरेपी 

अंशु का मानना है कि कविता, लेखन और साहित्य केवल सृजन नहीं, बल्कि आत्मा की चिकित्सा भी हैं। उनके अनुसार लेखन “राइटिंग थैरेपी” का कार्य करता है—मन में उमड़ते भावों को शब्दों में ढाल देने से भीतर का बोझ हल्का हो जाता है। हर अनुभूति को प्रकाशित करना आवश्यक नहीं; कई बार उसे डायरी के पन्नों में सहेज लेना ही पर्याप्त होता है। वह कहती हैं कि लिखना स्वयं के लिए भी हो सकता है, केवल पाठकों के लिए नहीं।

अंशु का स्पष्ट मत है कि लेखन की कोई उम्र नहीं होती। कोई भी व्यक्ति, किसी भी आयु में लिख सकता है। आज अनेक बच्चे और युवा अपनी संवेदनाओं को बेहद प्रभावी ढंग से व्यक्त कर रहे हैं। एक संपादक और पब्लिशर के रूप में उन्होंने देखा है कि बाल और युवा लेखक अद्भुत कल्पनाशीलता और सच्चाई के साथ लिख रहे हैं। इसलिए उनके लिए “छपना जरूरी नहीं, लिखना जरूरी है।” अभिव्यक्ति ही जीवन को निखारती है। जब मन के विचार बाहर आते हैं, तो व्यक्ति भीतर से संतुलित और सजग बनता है।

वे पुराने समय की चिट्ठियों का उदाहरण देती हैं। पहले लोग अपने गुस्से, शिकायत या पीड़ा को कागज पर उतारते थे। कई बार पत्र में तीखे शब्द भी होते थे, परंतु पोस्ट करने से पहले मन बदल जाता था। चिट्ठी फाड़ दी जाती थी, और रिश्ते बच जाते थे। उस प्रक्रिया में लिखना एक शमन-क्रिया बन जाता था—भावों का विसर्जन हो जाता था, बिना किसी स्थायी क्षति के।

आज डिजिटल और टेक्नोलॉजी का दौर है। मोबाइल और व्हाट्सएप पर लोग तुरंत प्रतिक्रिया दे देते हैं। आवेग में लिखे शब्द सेकंडों में पहुंच जाते हैं। पहले “डिलीट” का विकल्प नहीं था, तो रिश्ते बिगड़ जाते थे; अब सुविधा है, पर सावधानी की आवश्यकता भी उतनी ही अधिक है। अंशु मानती हैं कि तकनीक ने संवाद को सरल बनाया है, पर संयम की जिम्मेदारी भी बढ़ाई है।

उनके विचार में लेखन केवल साहित्यिक कर्म नहीं, बल्कि आत्म-अनुशासन है। लिखते समय व्यक्ति स्वयं से संवाद करता है, अपनी भावनाओं को समझता है और उन्हें दिशा देता है। यही कारण है कि वे हर व्यक्ति को लिखने के लिए प्रेरित करती हैं—चाहे वह डायरी हो, कविता हो या साधारण नोट्स।

अंशु के लिए लेखन आत्मा का आईना है, जो व्यक्ति को अपने भीतर झांकने का अवसर देता है। यह अभिव्यक्ति का माध्यम ही नहीं, बल्कि संबंधों को बचाने, भावनाओं को संतुलित करने और जीवन में निखार लाने का सशक्त साधन है। लिखना एक आदत नहीं, एक उपचार है—और इस उपचार के लिए उम्र, मंच या प्रकाशन की प्रतीक्षा आवश्यक नहीं।

समर्पण, प्रारब्ध और आत्मविश्वास : अंशु का आध्यात्मिक जीवन-दर्शन

अंशु का जीवन-दर्शन साधारण शब्दों में गहन आध्यात्मिकता की अभिव्यक्ति है। वह कहती हैं कि उनके कोई सपने नहीं हैं। यह कथन पहली दृष्टि में आश्चर्यचकित करता है, क्योंकि सामान्यतः हर व्यक्ति अपने भविष्य के लिए अनेक स्वप्न बुनता है। किंतु अंशु के लिए जीवन का केंद्र “स्वप्न” नहीं, बल्कि “समर्पण” है। उनका विश्वास है कि भगवान जिसे जो देना चाहते हैं, वह उचित समय पर अवश्य देते हैं। मनुष्य का कार्य केवल कर्म करना है, फल की चिंता करना नहीं।

उनकी सोच में निष्काम कर्म का गहरा प्रभाव है। श्रीमद्भगवद्गीता का संदेश—कर्म करो, फल की चिंता मत करो—उनके जीवन का आधार बन गया है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जब मनुष्य अपने कर्म को ईश्वर को अर्पित कर देता है, तब वह बंधनों से मुक्त हो जाता है। अंशु इसी भाव को अपनाती हैं। उनके लिए समर्पण का अर्थ हार मान लेना नहीं, बल्कि अहंकार का विसर्जन करना है। जब व्यक्ति स्वयं को ईश्वर की इच्छा पर छोड़ देता है, तब जीवन सहज और संतुलित हो जाता है।

अंशु का एक और विचार अत्यंत प्रेरक है—“हंसी अपनी, खुशी अपनी, धूप अपनी, छांव अपनी, समंदर अपना, आंसू अपना, मुस्कान अपनी, नदी अपनी, आसमां अपना—तो फिर गम किस बात का?” यह वाक्य उनके आत्मबोध को दर्शाता है। वह मानती हैं कि सुख-दुख दोनों हमारे भीतर ही हैं। ईश्वर ने मनुष्य को पूर्ण बनाया है। यदि सब कुछ हमारे भीतर है, तो बाहरी दुनिया में निरंतर खोज क्यों? भगवान भी यही कहते हैं कि जो सत्य तुम बाहर ढूंढते हो, वह तुम्हारे भीतर ही निवास करता है।

अंशु स्वीकार करती हैं कि बचपन में वह डॉक्टर बनना चाहती थीं। उन्होंने विज्ञान विषय भी लिया, अपने भविष्य को चिकित्सा-क्षेत्र में देखा। लेकिन विवाह के बाद परिस्थितियां बदलीं। उन्होंने अपने प्रमाण-पत्र तक फाड़ दिए। यह घटना उनके जीवन का मोड़ थी। सामान्यतः इसे विफलता या त्याग माना जा सकता है, परंतु अंशु इसे प्रारब्ध की दिशा मानती हैं। वह कहती हैं कि लेखक बनना उनका सपना कभी नहीं था। लेखन तो संयोग से आया, जैसे किसी अदृश्य शक्ति ने उन्हें उस राह पर मोड़ दिया हो।

उनके अनुसार जीवन में प्रारब्ध का अत्यंत महत्व है। मनुष्य योजना बनाता है, पर अंतिम निर्णय ईश्वर के हाथ में होता है। यदि कोई मार्ग बंद होता है, तो कोई दूसरा खुलता भी है। अंशु का लेखक बनना इसी का उदाहरण है। शायद डॉक्टर बनकर वह कुछ सीमित जीवनों को स्पर्श करतीं, पर लेखक बनकर वह असंख्य हृदयों तक पहुंच सकती हैं।

वह भगवान का आभार व्यक्त करती हैं कि उन्हें आध्यात्मिक परिवार मिला। परिवार का वातावरण व्यक्ति के विचारों को आकार देता है। यदि घर में श्रद्धा, विश्वास और सकारात्मकता का माहौल हो, तो व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में भी संतुलित रहता है। अंशु मानती हैं कि संघर्ष और चुनौतियां जीवन का स्वाभाविक हिस्सा हैं। कोई भी जीवन इनसे मुक्त नहीं। परंतु यदि मन में ईश्वर के प्रति अटूट विश्वास हो, तो हर संकट छोटा लगने लगता है।

उनकी दृष्टि में समर्पण का अर्थ निष्क्रियता नहीं, बल्कि विश्वास के साथ कर्म करना है। जब हम ईश्वर को अपना मार्गदर्शक मान लेते हैं, तो वह हमारी उंगली पकड़कर सही दिशा में ले जाते हैं। मंजिल भी वही दिलाते हैं। मनुष्य को केवल चलने का साहस रखना होता है।

अंशु का जीवन-दर्शन हमें यह सिखाता है कि सपनों से अधिक महत्वपूर्ण है विश्वास। योजनाओं से अधिक महत्वपूर्ण है आंतरिक शांति। यदि व्यक्ति अपने भीतर के प्रकाश को पहचान ले, तो बाहरी अंधेरा उसे विचलित नहीं कर सकता।

उनकी सोच में संतोष, कृतज्ञता और समर्पण का अद्भुत समन्वय है। वह मानती हैं कि जो मिला है, वही पर्याप्त है। जो नहीं मिला, वह भी शायद किसी बड़े उद्देश्य के लिए नहीं मिला। जीवन एक यात्रा है, जिसमें हर मोड़ का अपना अर्थ है।

अंततः अंशु का संदेश सरल है—ईश्वर पर भरोसा रखिए, कर्म करते रहिए, और परिणाम को स्वीकार कीजिए। जब समर्पण पूर्ण होता है, तब भय समाप्त हो जाता है। तब जीवन संघर्ष नहीं, साधना बन जाता है। और शायद यही वह अवस्था है, जहां व्यक्ति अपने भीतर के आकाश को पहचान लेता है—वह आकाश जो अनंत है, शांत है और दिव्य है।

भीड़ से अलग अपनी राह : सच्चे साहित्य की शाश्वत शक्ति पर अंशु का विश्वास

अंशु का मानना है कि हर व्यक्ति के जीवन में एक क्षण ऐसा आता है, जब उसके सामने दो स्पष्ट रास्ते खड़े होते हैं—एक, भीड़ में शामिल होकर उसी दिशा में बह जाना, जहां सब जा रहे हैं; और दूसरा, भीड़ से अलग हटकर अपनी पहचान गढ़ना। उनके अनुसार भीड़ का हिस्सा बनना आसान है, क्योंकि वहां प्रश्न कम होते हैं और स्वीकृति शीघ्र मिल जाती है। परंतु अपनी राह स्वयं बनाना साहस मांगता है—आत्मविश्वास, धैर्य और एकांत की शक्ति।

अंशु कहती हैं कि उन्होंने भीड़ का हिस्सा न बनने का निर्णय लिया। प्रतियोगिता के इस दौर में, जहां हर कोई दूसरों से आगे निकलने की दौड़ में है, उन्होंने कुछ नया करने और अपनी राह स्वयं बनाने का संकल्प लिया। उनके अनुसार जब हम भीड़ का हिस्सा बनते हैं, तो धीरे-धीरे अपना चैन और सुकून खो देते हैं। हम तुलना, प्रतिस्पर्धा और बाहरी मान्यता के जाल में उलझ जाते हैं। परंतु जब व्यक्ति अपनी मौलिकता को स्वीकार करता है, तब उसके भीतर एक अलग संतोष जन्म लेता है।

विशेष रूप से एक लेखक और साहित्यकार के लिए, अंशु मानती हैं कि भीड़ का हिस्सा बनना घातक हो सकता है। साहित्य मौलिकता से जन्म लेता है, न कि अनुकरण से। यदि लेखक केवल ट्रेंड, लोकप्रियता या बाज़ार की मांग के अनुसार लिखने लगे, तो उसकी लेखनी की आत्मा क्षीण हो जाती है। साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को दिशा देना, प्रश्न उठाना और संवेदनाओं को जागृत करना है। इसके लिए स्वतंत्र चिंतन और भीड़ से अलग खड़े होने का साहस आवश्यक है।

डिजिटल मीडिया और तकनीक के इस युग में, जहां सामग्री की बाढ़ है और ध्यान की अवधि क्षीण होती जा रही है, अंशु का विश्वास है कि सच्चा साहित्य आज भी अपनी ताकत के बल पर बिकता भी है और टिकता भी है। वे उदाहरण के रूप में संत कवियों का उल्लेख करती हैं—मीरा बाई और कबीर। उनके समय में न तो सोशल मीडिया था, न आधुनिक प्रकाशन-तंत्र, न डिजिटल प्रचार। फिर भी उनका साहित्य आज भी जीवित है, कालजयी है। कारण केवल एक है—उनकी वाणी में सत्य और अनुभव की शक्ति थी।

अंशु यह स्वीकार करती हैं कि बाज़ारवाद का प्रभाव साहित्य पर कुछ हद तक पड़ता है। प्रकाशन-उद्योग, प्रचार-प्रसार और बिक्री की रणनीतियां साहित्य की दृश्यता को प्रभावित करती हैं। परंतु वे यह भी मानती हैं कि बाज़ार अंतिम निर्णायक नहीं है। जो साहित्य सच्चा है, साहसिक है और मानव-मन की गहराइयों को छूता है, वह समय की कसौटी पर खरा उतरता है। वह तत्काल लोकप्रिय न भी हो, तो भी स्थायी रहता है।

उनके विचार में साहित्य की असली शक्ति उसकी प्रामाणिकता है। जब लेखक अपने भीतर की सच्चाई से लिखता है, तब उसके शब्दों में ऊर्जा होती है। वह ऊर्जा पाठकों तक पहुंचती है और उन्हें जोड़ती है। भीड़ का साहित्य क्षणिक हो सकता है, पर आत्मा से निकला साहित्य शाश्वत होता है।

अंशु यह भी मानती हैं कि तकनीक को नकारा नहीं जा सकता। डिजिटल प्लेटफॉर्म लेखकों को व्यापक पाठक-वर्ग तक पहुंचने का अवसर देते हैं। परंतु तकनीक साधन है, साध्य नहीं। यदि रचना में गहराई नहीं होगी, तो तकनीक उसे स्थायी नहीं बना सकती। और यदि रचना में शक्ति होगी, तो वह किसी भी माध्यम से अपना स्थान बना लेगी।

उनका यह दृष्टिकोण संतुलित है—न तो वे आधुनिकता का विरोध करती हैं, न अंधानुकरण का समर्थन। वे केवल यह कहती हैं कि साहित्य का मूल तत्व उसकी सत्यनिष्ठा है। लेखक को भीड़ के शोर से ऊपर उठकर अपने भीतर की आवाज़ सुननी चाहिए। जब वह अपनी मौलिक राह पर चलता है, तब वह केवल रचनाकार नहीं, पथ-प्रदर्शक बन जाता है।

अंततः अंशु का संदेश स्पष्ट है—भीड़ में शामिल होना सरल है, पर इतिहास उन्हीं को याद रखता है जिन्होंने अपनी अलग राह बनाई। सच्चा साहित्य न समय से डरता है, न बाजार से। वह अपनी शक्ति से जन्म लेता है और उसी शक्ति से अमर होता है। इसलिए लेखक को चाहिए कि वह अपनी मौलिकता को बचाए रखे, सत्य के साथ खड़ा रहे और भीड़ से अलग होकर भी अपने सुकून को थामे रखे। यही उसकी असली पहचान है, और यही साहित्य की शाश्वत ताकत।

सपनों से सृजन तक : अंशु और राजस्थान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल की प्रेरक यात्रा

अंशु केवल लेखिका और कवयित्री ही नहीं, बल्कि सृजनात्मक मंचों की निर्मात्री भी हैं। वे राजस्थान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल की फाउंडर हैं और हाल ही में इसका 12वां संस्करण जोधपुर में सफलतापूर्वक आयोजित कर चुकी हैं। यह फेस्टिवल केवल फिल्मों का उत्सव नहीं, बल्कि विचारों, संवाद और रचनात्मकता का संगम है।

अंशु का स्पष्ट मानना है कि युवाओं का सपना केवल “हीरो” बनने तक सीमित नहीं होना चाहिए। फिल्म उद्योग केवल पर्दे पर दिखने वाले कलाकारों तक सीमित नहीं है। इसके पीछे लेखक, निर्देशक, कैमरामैन, संपादक, संगीतकार, प्रोड्यूसर और तकनीकी विशेषज्ञों की पूरी टीम काम करती है। यदि युवा केवल प्रसिद्धि की चमक को ही लक्ष्य बनाएंगे, तो वे सृजन की मूल प्रक्रिया को समझ नहीं पाएंगे। अंशु चाहती हैं कि युवाओं के भीतर एक लेखक की संवेदनशीलता, एक निर्देशक की दृष्टि और एक संपूर्ण व्यक्तित्व की परिपक्वता विकसित हो।

राजस्थान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का उद्देश्य भी यही है—युवाओं को फिल्म निर्माण की संपूर्ण प्रक्रिया से परिचित कराना। इस फेस्टिवल में लेखक, डायरेक्टर, कैमरामैन, फिल्म प्रोड्यूसर और फिल्म उद्योग से जुड़े विभिन्न सेलिब्रिटीज को आमंत्रित किया जाता है। वे अपने अनुभव साझा करते हैं, संघर्ष की कहानियां बताते हैं और नई पीढ़ी को दिशा देते हैं। यह संवाद केवल मंचीय भाषण नहीं, बल्कि वास्तविक प्रेरणा का माध्यम बनता है।

फेस्टिवल की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें राजस्थानी सिनेमा के साथ-साथ बॉलीवुड, हॉलीवुड और क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मों का भी निशुल्क प्रदर्शन किया जाता है। इस प्रकार यह आयोजन विविध संस्कृतियों और भाषाओं को एक मंच पर लाता है। जब युवा और बच्चे अलग-अलग भाषाओं और संस्कृतियों की फिल्में देखते हैं, तो उनका दृष्टिकोण व्यापक होता है। वे समझते हैं कि सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति और विचारों का दर्पण है।

अंशु का मानना है कि फिल्म फेस्टिवल आम आदमी के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। अक्सर बड़े फिल्म समारोह केवल उद्योग से जुड़े लोगों तक सीमित रह जाते हैं, लेकिन यहां आम दर्शकों को भी समान महत्व दिया जाता है। प्रश्नोत्तरी सत्र आयोजित किए जाते हैं, जहां दर्शक सीधे फिल्म निर्माताओं और कलाकारों से संवाद कर सकते हैं। यह खुला संवाद युवाओं में आत्मविश्वास जगाता है और उन्हें अपने सपनों को स्पष्ट दिशा देने में सहायता करता है।

इस फेस्टिवल का एक और महत्वपूर्ण पक्ष है—पर्यटन को बढ़ावा। जब देश-विदेश से फिल्म उद्योग से जुड़े लोग जोधपुर आते हैं, तो राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहर, स्थापत्य कला और प्राकृतिक सौंदर्य से परिचित होते हैं। इससे राज्य के पर्यटन उद्योग को भी लाभ मिलता है। होटल, स्थानीय परिवहन, हस्तशिल्प और अन्य सेवाओं को प्रोत्साहन मिलता है। इस प्रकार यह आयोजन केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।

अंशु मानती हैं कि सिनेमा एक सशक्त माध्यम है, जो समाज को दिशा दे सकता है। यदि युवा केवल ग्लैमर के पीछे भागेंगे, तो वे उसकी गहराई को नहीं समझ पाएंगे। परंतु यदि वे लेखन, निर्देशन और तकनीकी पक्ष को समझेंगे, तो वे सिनेमा को सार्थक बना सकते हैं। उनका उद्देश्य युवाओं में यही समग्र दृष्टि विकसित करना है।

राजस्थान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल इस विचार का सजीव उदाहरण है कि क्षेत्रीय पहचान को वैश्विक मंच पर कैसे स्थापित किया जा सकता है। यह आयोजन राजस्थान की संस्कृति को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने का प्रयास भी है। साथ ही, यह संदेश भी देता है कि प्रतिभा को मंच देने के लिए केवल महानगरों पर निर्भर रहना आवश्यक नहीं।

अंशु का विश्वास है कि सपनों को साकार करने के लिए मंच, मार्गदर्शन और प्रेरणा आवश्यक है। यह फेस्टिवल उन्हीं तत्वों का संगम है। यहां युवा केवल दर्शक नहीं, बल्कि संभावित सृजनकर्ता बनकर उभरते हैं। यही इस आयोजन की सबसे बड़ी सफलता है—सपनों को दिशा देना और रचनात्मकता को सम्मान देना।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor