वास्तविक परिवर्तन बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि आंतरिक स्पष्टता और सजगता से प्रारंभ होता है। आत्मजागरूकता, स्पष्टता, उत्कृष्टता, स्वतंत्रता और सामंजस्य को जीवन के पाँच आधार स्तंभों के रूप में प्रस्तुत किया गया। प्रतिभागियों को आत्म.चिंतन के लिए पाँच प्रमुख प्रश्नों पर मनन करने हेतु प्रेरित किया गया, जिनमें सचेत रहकर, प्रत्यक्ष रूप से गहराई के दिव्य भाव को समझाया गया।
दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर
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मनोविज्ञान विभाग जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय द्वारा भारतीय उपचार प्रणाली पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन के अंतर्गत पूर्व सम्मेलन में कार्यशाला आयोजित की गई। इसमें गहन बौद्धिक चिंतन, आत्म.अन्वेषण एवं व्यवहारिक साधना के वातावरण में प्रतिभागियों ने आत्मजागरूकता से सामाजिक उत्तरदायित्व तक की यात्रा पर विचार किया।
विभागाध्यक्षा डॉ. हेमलता जोशी ने बताया कि कार्यक्रम का संचालन चेन्नई से आई सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक एवं प्रशिक्षक निताशा शर्मा द्वारा किया गया। जिसमें मनोविज्ञान से जुड़े 40 छात्रों तथा पेशेवरों ने भाग लिया। विशेष संवाद सत्र में स्ययं को जानने की अवधारणा को केंद्र में रखते हुए जीवन के मूल प्रश्नों पर चिंतन किया गया। सत्र में यह संदेश प्रमुखता से उभरा कि जीवन में असफलता जैसी कोई वस्तु नहीं होती। क्रियान्वयन के बिना विचार केवल भ्रम है। इन सूत्रों द्वारा प्रतिभागियों ने व्यक्तिगत अभ्यास, अनुशासन और निरंतर आत्मसाधना के महत्व को समझा।
योग, मनोविज्ञान और स्वकार्य के समन्वय पर विशेष बल दिया
कार्यक्रम में योग, मनोविज्ञान और स्वकार्य के समन्वय पर विशेष बल दिया गया। वक्ता ने स्पष्ट किया कि वास्तविक परिवर्तन बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि आंतरिक स्पष्टता और सजगता से प्रारंभ होता है। आत्मजागरूकता, स्पष्टता, उत्कृष्टता, स्वतंत्रता और सामंजस्य को जीवन के पाँच आधार स्तंभों के रूप में प्रस्तुत किया गया। प्रतिभागियों को आत्म.चिंतन के लिए पाँच प्रमुख प्रश्नों पर मनन करने हेतु प्रेरित किया गया, जिनमें सचेत रहकर, प्रत्यक्ष रूप से गहराई के दिव्य भाव को समझाया गया। सत्र का उद्देश्य केवल वैचारिक विमर्श तक सीमित न रहकर उसे व्यवहार में रूपांतरित करना था। जिसमें ठोस अनुभव, चिंतनपरक अवलोकन और सैद्धांतिक अवधारण के माध्यम से आत्म.विकास की प्रक्रिया से जोड़ा गया। संवादात्मक गतिविधियों और सामूहिक चर्चा ने वातावरण को जीवंत एवं सहभागितापूर्ण बनाए रखा।
हजारों मील की यात्रा एक छोटे से कदम से प्रारंभ होती है : डॉ. अर्पिता कक्कड़
कार्यक्रम के दौरान यह प्रेरक संदेश भी दिया गया कि हजारों मील की यात्रा एक छोटे से कदम से प्रारंभ होती है। इस विचार ने प्रतिभागियों को अपने जीवन में छोटे.छोटे सकारात्मक परिवर्तन आरंभ करने के लिए प्रेरित किया। आयोजन सचिव डॉ. अर्पिता कक्कड़ ने सत्र को अत्यंत प्रेरणादायकए व्यावहारिक एवं जीवनोपयोगी बताया तथा यह स्पष्ट किया कि भारतीय ज्ञान परंपरा, योग और मनोविज्ञान का समन्वय वर्तमान समय की चुनौतियों जैसे तनाव, अनिश्चितता और जीवनशैली संबंधी समस्याओं का सशक्त समाधान साक्षात्कार से संभव है। जो न केवल आत्म.बोध की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हैए बल्कि परंपरा और आधुनिकता का संतुलित समन्वय है। साक्षात्कार से शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों क्षेत्रों में सार्थक परिवर्तन संभव है।










