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Thursday, March 12, 2026, 10:30 am

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केजरीवाल निर्दोष, पर लोकतंत्र खतरे में : इमरजेंसी की स्मृतियां, आज की सियासत और एजेंसियों की निष्पक्षता पर उठते सवाल

लोकतंत्र की आत्मा पर आघात…मोदी जी संभल जाओ, वरना इतिहास आपको भी माफ नहीं करेगा…

दिलीप कुमार पुरोहित. नई दिल्ली

9783414079 diliprakhai@gmail.com

भारत का लोकतंत्र अनेक उतार–चढ़ावों से गुज़रा है। स्वतंत्रता के बाद से ही यह व्यवस्था कभी राजनीतिक अस्थिरता, कभी युद्ध, तो कभी आर्थिक संकटों के बीच अपनी जड़ों को मजबूत करती रही। लेकिन जब-जब सत्ता और लोकतांत्रिक मूल्यों के बीच टकराव की स्थिति बनी, तब-तब इतिहास ने कठोर प्रश्न उठाए।

आज फिर वही प्रश्न हवा में तैरते दिखाई दे रहे हैं—क्या देश एक बार फिर उस मोड़ पर खड़ा है, जहाँ लोकतंत्र की आत्मा पर आघात हो रहा है?

इमरजेंसी: जब लोकतंत्र पर लगा था ताला

1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लागू किया। यह निर्णय भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में सबसे विवादास्पद अध्यायों में गिना जाता है। प्रेस पर सेंसरशिप, विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी, नागरिक स्वतंत्रताओं का निलंबन—इन सबने लोकतंत्र की बुनियाद को हिला दिया था।

इमरजेंसी के दौरान राजनीतिक असहमति को देशद्रोह की तरह देखा गया। अदालतों की भूमिका सीमित हो गई, मीडिया की आवाज़ दबा दी गई, और सत्ता का केंद्रीकरण चरम पर था। इतिहासकारों का मानना है कि यह वह दौर था जब संविधान की आत्मा को सबसे बड़ी चुनौती मिली।

इंदिरा गांधी की उस भूल के लिए देश ने उन्हें कठोर राजनीतिक दंड भी दिया। 1977 के चुनाव में जनता ने स्पष्ट संदेश दिया कि लोकतंत्र से बड़ा कोई नहीं।

आज का परिदृश्य: क्या इतिहास खुद को दोहरा रहा है?

वर्तमान समय में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार पर विपक्षी दलों द्वारा कई गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों—विशेषकर दिल्ली की राजनीति—ने इन सवालों को और तीखा बना दिया है।

जब राष्ट्रीय राजधानी में चुनावी माहौल था, तब विपक्षी दल आम आदमी पार्टी के कई वरिष्ठ नेता जांच एजेंसियों की कार्रवाई का सामना कर रहे थे। मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री सहित कई नेताओं की गिरफ्तारी ने राजनीतिक वातावरण को असाधारण बना दिया।जांच में सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय (ED) सक्रिय रहीं। आरोपों में कथित वित्तीय अनियमितताओं, शराब नीति में गड़बड़ियों और चुनावी खर्च से जुड़े मुद्दे शामिल थे।

हालांकि, बाद में न्यायालयों में इन मामलों पर विभिन्न निर्णय सामने आए। कुछ मामलों में जमानत मिली, कुछ में जांच पर प्रश्न उठे, और कुछ आदेशों ने एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर टिप्पणी भी की। इन घटनाओं ने एक बड़े विमर्श को जन्म दिया—क्या जांच एजेंसियाँ निष्पक्ष हैं या राजनीतिक प्रभाव में कार्य कर रही हैं?

अदालतों की भूमिका: विश्वास और प्रश्न

भारतीय न्यायपालिका, विशेषकर सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया, को लोकतंत्र का अंतिम प्रहरी माना जाता है। जब भी कार्यपालिका या विधायिका पर सवाल उठे, अदालतों ने संविधान की रक्षा की है।

लेकिन जब राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों में लंबी हिरासत, जमानत पर शर्तें, या जांच की दिशा को लेकर विरोधाभासी संकेत मिलते हैं, तब आम नागरिक के मन में शंकाएँ जन्म लेना स्वाभाविक है।

यदि किसी मामले में अंततः अदालत यह कहे कि आरोपों में पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं या जांच में त्रुटियाँ हैं, तो यह प्रश्न भी उठता है—क्या तब तक राजनीतिक नुकसान हो चुका होता है? क्या प्रतिष्ठा की क्षति की भरपाई संभव है?

एजेंसियों की सक्रियता: पारदर्शिता या राजनीतिक दबाव?

सीबीआई और ईडी जैसी एजेंसियों का उद्देश्य भ्रष्टाचार और आर्थिक अपराधों की जांच करना है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में विपक्षी दलों ने बार-बार आरोप लगाया है कि इन एजेंसियों की कार्रवाई मुख्यतः विपक्षी नेताओं के खिलाफ केंद्रित रही है। सत्ता पक्ष का तर्क है कि कानून अपना काम कर रहा है और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्ती आवश्यक है।

सवाल यह नहीं कि जांच होनी चाहिए या नहीं—सवाल यह है कि क्या जांच की प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और समयबद्ध है? यदि अंत में अदालतें आरोपों को टिकाऊ नहीं मानतीं, तो जांच एजेंसियों की जवाबदेही भी सुनिश्चित होनी चाहिए।

मीडिया की भूमिका: चौथा स्तंभ या मौन दर्शक?

इमरजेंसी के दौर में मीडिया पर सीधा सेंसर लगा था। आज वैसी औपचारिक सेंसरशिप नहीं है, लेकिन आलोचकों का आरोप है कि बड़े मीडिया संस्थान सत्ता के खिलाफ कठोर प्रश्न पूछने से बचते हैं।

लोकतंत्र में मीडिया का कार्य केवल सरकारी घोषणाओं का प्रसारण नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल पूछना है। यदि विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारी और बाद की न्यायिक टिप्पणियों को समान महत्व न मिले, तो जनमत प्रभावित होता है। मीडिया की स्वतंत्रता लोकतंत्र की धड़कन है। यदि यह धड़कन कमजोर पड़ती है, तो पूरा तंत्र प्रभावित होता है।

चुनावी राजनीति और प्रतिष्ठा का प्रश्न

यदि किसी राजनीतिक दल या उसके नेताओं को चुनाव से ठीक पहले गंभीर आरोपों और गिरफ्तारी का सामना करना पड़े, और बाद में अदालतें उन आरोपों को पर्याप्त आधारहीन मानें, तो इसका लोकतांत्रिक प्रभाव गहरा होता है।

भारतीय जनता पार्टी और आम आदमी पार्टी के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है। लेकिन यदि जांच और चुनावी प्रक्रिया एक साथ चलें, तो यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि कोई भी कदम मतदाता की स्वतंत्र पसंद को प्रभावित न करे।

जब किसी दल को बाद में राहत मिलती है, तब प्रश्न उठता है—क्या तब तक उसकी छवि को जो नुकसान हुआ, उसकी भरपाई संभव है? क्या अदालतें खोई प्रतिष्ठा लौटा सकती हैं? कानूनी प्रक्रिया भले ही निर्दोष घोषित कर दे, लेकिन सार्वजनिक धारणा में लगे दाग को मिटाना कठिन होता है।

लोकतंत्र की सेहत: संस्थाओं की विश्वसनीयता पर निर्भर

लोकतंत्र केवल चुनावों का नाम नहीं। यह संस्थाओं की विश्वसनीयता, स्वतंत्रता और पारदर्शिता पर टिका होता है। यदि जनता को यह महसूस होने लगे कि जांच एजेंसियाँ राजनीतिक प्रभाव में हैं, अदालतें दबाव में हैं या मीडिया पक्षपाती है, तो लोकतंत्र की जड़ें कमजोर होती हैं। इमरजेंसी का इतिहास हमें यही सिखाता है कि संस्थाओं की स्वतंत्रता से समझौता अंततः सत्ता के लिए भी घातक सिद्ध होता है।

प्रधानमंत्री के नाम एक लोकतांत्रिक सलाह

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देश ने प्रचंड जनादेश दिए हैं। वे स्वयं को लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध बताते रहे हैं। ऐसे में उनसे अपेक्षा भी अधिक है। इंदिरा गांधी की इमरजेंसी को इतिहास ने कठोरता से याद रखा है। यदि आज के दौर में विपक्ष और नागरिक समाज के बीच यह धारणा बनती है कि लोकतंत्र पर दबाव है, तो यह गंभीर संकेत है। प्रधानमंत्री को चाहिए कि वे स्पष्ट संदेश दें—जांच एजेंसियाँ पूर्णतः स्वतंत्र हैं, किसी भी प्रकार का राजनीतिक हस्तक्षेप अस्वीकार्य है, और संस्थाओं की पारदर्शिता सर्वोपरि है। इतिहास किसी भी नेता को उसके आर्थिक या राजनीतिक उपलब्धियों से नहीं, बल्कि लोकतंत्र के प्रति उसकी निष्ठा से आंकता है।

प्रश्न लोकतंत्र का है, किसी दल का नहीं

आज जो प्रश्न उठ रहे हैं, वे केवल किसी एक दल या नेता से जुड़े नहीं हैं। यह प्रश्न लोकतंत्र की आत्मा का है। यदि आरोप झूठे सिद्ध होते हैं, तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। यदि जांच में त्रुटि है, तो सुधार होना चाहिए। यदि मीडिया निष्क्रिय है, तो आत्ममंथन आवश्यक है। लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि वह स्वयं को सुधारने की क्षमता रखता है। इमरजेंसी का अध्याय हमें चेतावनी देता है—सत्ता अस्थायी है, लेकिन संस्थाओं की विश्वसनीयता स्थायी होनी चाहिए। आज आवश्यकता है संतुलन, पारदर्शिता और जवाबदेही की। ताकि भविष्य में कोई भी नागरिक यह महसूस न करे कि लोकतंत्र केवल कागजों पर है। इतिहास कठोर न्यायाधीश है। वह देर से निर्णय देता है, पर देता अवश्य है। और जब देता है, तो वह व्यक्ति नहीं, युग को परिभाषित कर देता है।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor