राइजिंग भास्कर के ग्रुप एडिटर दिलीप कुमार पुरोहित ने भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत को लिखा सख्त पत्र
महाकुंभ की भगदड़ से लेकर जैसलमेर किले की घटना तक उदाहरण देकर कहा—“लोकतंत्र में कोई वीआईपी नहीं, हर नागरिक समान”
पत्र को जनहित याचिका मानकर सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग
दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर
9783414079 diliprakhai@gmail.com
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र माना जाता है, जहां संविधान हर नागरिक को समान अधिकार देता है। लेकिन वास्तविकता में अक्सर ऐसी घटनाएं सामने आती हैं जो इस मूल सिद्धांत पर गंभीर सवाल खड़े कर देती हैं। देश में लंबे समय से जारी वीआईपी कल्चर इसी तरह की व्यवस्था है, जिसमें कुछ विशेष पदों पर बैठे लोगों की आवाजाही या कार्यक्रमों के कारण आम नागरिकों के अधिकारों को रोक दिया जाता है।
इसी मुद्दे को लेकर राइजिंग भास्कर के ग्रुप एडिटर दिलीप कुमार पुरोहित ने भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांता के नाम एक विस्तृत और सख्त पत्र लिखकर पूरे देश में वीआईपी कल्चर समाप्त करने की मांग की है। अपने पत्र में उन्होंने कहा है कि भारत के संविधान में दिए गए समानता के मौलिक अधिकार का लगातार उल्लंघन हो रहा है। उन्होंने आग्रह किया है कि उनके इस पत्र को जनहित याचिका (PIL) के रूप में स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट देश में वीआईपी कल्चर समाप्त करने के लिए स्पष्ट और सख्त दिशानिर्देश जारी करे।
संविधान में समानता का अधिकार, फिर भी अलग व्यवस्था क्यों?
दिलीप कुमार पुरोहित ने अपने पत्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है कि भारत के संविधान का Article 14 of the Constitution of India यह कहता है कि देश का हर नागरिक कानून के समक्ष समान है और सभी को कानून का समान संरक्षण प्राप्त है। इसके साथ ही उन्होंने Article 15 of the Constitution of India का भी उल्लेख किया, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि राज्य किसी भी नागरिक के साथ भेदभाव नहीं कर सकता। पुरोहित ने लिखा है कि जब संविधान इतनी स्पष्टता से समानता का अधिकार देता है, तो फिर देश में ऐसी व्यवस्था क्यों है जिसमें कुछ लोगों के आने-जाने के कारण आम नागरिकों को रास्तों से रोका जाता है, सार्वजनिक स्थानों पर प्रवेश बंद कर दिया जाता है और कई बार लोगों को घंटों इंतजार करना पड़ता है।
वीआईपी व्यवस्था से पैदा होते हैं हादसे
पत्र में कहा गया है कि वीआईपी कल्चर केवल असुविधा का कारण ही नहीं है, बल्कि कई बार यह गंभीर हादसों की वजह भी बन जाता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए लिखा कि जब किसी वीआईपी के आने की सूचना मिलती है तो प्रशासन अचानक रास्ते बंद कर देता है, भीड़ को एक जगह रोक दिया जाता है या मार्ग बदल दिए जाते हैं। ऐसी परिस्थितियों में अचानक भीड़ का दबाव बढ़ जाता है और कई बार भगदड़ जैसी स्थिति पैदा हो जाती है।
महाकुंभ का उदाहरण
अपने पत्र में दिलीप कुमार पुरोहित ने हाल के समय में हुए महाकुंभ मेले का उदाहरण देते हुए कहा कि ऐसे विशाल धार्मिक आयोजनों में लाखों श्रद्धालु अपनी आस्था के साथ पहुंचते हैं। लेकिन कई बार वीआईपी व्यवस्थाओं के कारण आम श्रद्धालुओं को रोका जाता है, मार्ग बदल दिए जाते हैं और भीड़ अचानक एक जगह इकट्ठी हो जाती है। ऐसी स्थितियों में भगदड़ मचने की घटनाएं सामने आती हैं और निर्दोष लोगों की जान चली जाती है। पुरोहित ने लिखा कि यह बेहद दुखद है कि आस्था के ऐसे पवित्र आयोजनों में भी आम श्रद्धालु केवल इसलिए परेशान होते हैं क्योंकि कोई वीआईपी वहां आने वाला होता है।
जैसलमेर की घटना ने फिर उठाए सवाल
दिलीप कुमार पुरोहित ने अपने पत्र में 6 मार्च 2026 को राजस्थान के जैसलमेर में हुई एक घटना का भी उल्लेख किया है। उस दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल जैसलमेर फोर्ट के भ्रमण पर पहुंचे थे। जब उनके सोनार किले के दौरे का कार्यक्रम बना तो प्रशासन ने सुरक्षा के नाम पर आम नागरिकों का प्रवेश रोक दिया। इतना ही नहीं, किले के भीतर रहने वाले स्थानीय लोगों को भी अंदर जाने से रोक दिया गया।
मरीजों को भी नहीं मिली राहत
पत्र में यह भी उल्लेख किया गया कि उसी दौरान दो ऐसे मरीज वहां पहुंचे थे जो जोधपुर में हार्ट सर्जरी करवाकर लौटे थे। बीमारी की हालत में उन्हें किले के नीचे लंबे समय तक इंतजार करना पड़ा क्योंकि वीआईपी मूवमेंट के कारण रास्ता बंद कर दिया गया था। पुरोहित ने लिखा कि यह घटना बताती है कि वीआईपी कल्चर किस तरह आम नागरिकों के जीवन को प्रभावित करता है।
“लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि”
अपने पत्र में दिलीप कुमार पुरोहित ने लिखा है कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है और लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता होती है।लेकिन वीआईपी कल्चर के कारण कई बार ऐसा लगता है कि आम नागरिकों को दूसरे दर्जे का नागरिक मान लिया गया है। उन्होंने लिखा कि यदि किसी वीआईपी की सुरक्षा जरूरी है तो देश की सुरक्षा एजेंसियां अपने स्तर पर व्यवस्था करें, लेकिन इसके नाम पर आम नागरिकों के अधिकारों को रोकना संविधान की भावना के खिलाफ है।
सुप्रीम कोर्ट से ऐतिहासिक हस्तक्षेप की मांग
दिलीप कुमार पुरोहित ने मुख्य न्यायाधीश से आग्रह किया है कि उनके इस पत्र को जनहित याचिका के रूप में स्वीकार किया जाए और इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट व्यापक सुनवाई करे। उन्होंने कहा कि यदि सर्वोच्च न्यायालय इस विषय पर स्पष्ट दिशा निर्देश जारी करता है तो देश में एक ऐतिहासिक बदलाव संभव है।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत के नाम पत्र
माननीय मुख्य न्यायाधीश महोदय,
मैं, राइजिंग भास्कर का ग्रुप एडिटर होने के नाते, देश के एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं। भारत का संविधान हमारे लोकतंत्र की आत्मा है और इसमें हर नागरिक को समानता का मौलिक अधिकार दिया गया है। संविधान का अनुच्छेद 14 स्पष्ट रूप से कहता है कि सभी नागरिक कानून के समक्ष समान हैं और उन्हें कानून का समान संरक्षण प्राप्त है। लेकिन व्यवहार में देश में एक ऐसी व्यवस्था विकसित हो गई है जिसे वीआईपी कल्चर कहा जाता है। इस व्यवस्था के कारण आम नागरिकों को अक्सर सार्वजनिक स्थानों पर रोका जाता है, रास्ते बंद कर दिए जाते हैं और कई बार लोगों को घंटों इंतजार करना पड़ता है। माननीय महोदय, यह स्थिति संविधान की भावना के बिल्कुल विपरीत है। हाल ही में महाकुंभ जैसे विशाल धार्मिक आयोजन में भी वीआईपी व्यवस्थाओं के कारण भीड़ का दबाव बढ़ा और भगदड़ जैसी घटनाएं सामने आईं। इन घटनाओं में कई निर्दोष लोगों की जान चली गई। इसी प्रकार 6 मार्च 2026 को राजस्थान के जैसलमेर में एक घटना हुई, जब आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के सोनार किले के दौरे के दौरान आम नागरिकों का प्रवेश रोक दिया गया। यहां तक कि किले में रहने वाले लोगों को भी अपने घरों में जाने से रोक दिया गया। दो ऐसे मरीज, जो हाल ही में हार्ट सर्जरी करवाकर जोधपुर से लौटे थे, उन्हें भी लंबे समय तक बीमारी की हालत में इंतजार करना पड़ा।
माननीय महोदय, क्या यह स्थिति उस देश के लिए उचित है जो खुद को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहता है? मैं आपसे विनम्र लेकिन दृढ़ आग्रह करता हूं कि मेरे इस पत्र को जनहित याचिका के रूप में स्वीकार किया जाए और सुप्रीम कोर्ट इस विषय पर व्यापक सुनवाई करे। यदि किसी वीआईपी की सुरक्षा आवश्यक है तो देश की सुरक्षा एजेंसियां अपने स्तर पर व्यवस्था कर सकती हैं, लेकिन इसके नाम पर आम नागरिकों के अधिकारों को रोकना किसी भी स्थिति में उचित नहीं है। मैं आशा करता हूं कि सुप्रीम कोर्ट इस विषय पर स्पष्ट दिशानिर्देश जारी कर देश में वीआईपी कल्चर समाप्त करने की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाएगा।
सादर
दिलीप कुमार पुरोहित
ग्रुप एडिटर
राइजिंग भास्कर
प्रधानमंत्री से भी पहल की अपील
माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी,
आपका जीवन संघर्ष और परिश्रम की मिसाल है। आप एक साधारण परिवार से निकलकर देश के सर्वोच्च पद तक पहुंचे हैं। एक समय आप चाय बेचने वाले रहे और आज देश के प्रधानमंत्री हैं। इसलिए आप आम आदमी की पीड़ा और उसकी परेशानियों को सबसे बेहतर तरीके से समझ सकते हैं। आज जब देश में वीआईपी कल्चर को लेकर व्यापक चर्चा हो रही है, तो यह अपेक्षा की जाती है कि इस व्यवस्था को समाप्त करने की पहल सबसे पहले आपके स्तर से हो।
यदि वास्तव में लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि है, तो अब समय आ गया है कि वीआईपी कल्चर को समाप्त कर दिया जाए ताकि हर नागरिक खुद को समान अधिकारों वाला महसूस कर सके। देश की जनता को उम्मीद है कि आप इस दिशा में पहल करेंगे और भारत को ऐसा लोकतंत्र बनाएंगे जहां कोई वीआईपी नहीं, बल्कि हर नागरिक समान अधिकारों वाला होगा।











