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Sunday, April 19, 2026, 5:16 am

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जैसलमेर के छात्र करण भाटिया का कमाल: ‘ई-कूली’ सिस्टम से रेलवे यात्रियों की बड़ी समस्या का समाधान

राइजिंग भास्कर के मंच पर किया लाइव डेमो, ग्रुप एडिटर दिलीप कुमार पुरोहित ने भी परखा सिस्टम; बुजुर्ग, दिव्यांग और बीमार यात्रियों के लिए साबित हो सकता है वरदान

दिलीप कुमार पुरोहित. जैसलमेर

राजस्थान का ऐतिहासिक शहर जैसलमेर अपनी स्वर्णिम आभा, भव्य स्थापत्य और विश्वप्रसिद्ध जैसलमेर फोर्ट यानी सोनार किले के कारण पूरी दुनिया में जाना जाता है। पीले पत्थरों से बनी इमारतें, अनोखी शिल्पकला और इतिहास की विरासत इस शहर को विशेष पहचान देती हैं। इसी स्वर्णिम नगरी से एक ऐसा विचार सामने आया है जो भारतीय रेल यात्रियों की वर्षों पुरानी समस्या का समाधान बन सकता है।

जैसलमेर निवासी बीबीए कर चुके छात्र करण भाटिया इन दिनों अपने अनोखे इनोवेशन ‘ई-कूली सिस्टम’ के कारण चर्चा में हैं। करण ने ऐसा डिजिटल मैकेनिज्म विकसित किया है, जिसके माध्यम से रेलवे स्टेशन पर कुली को पहले से ऑनलाइन बुक किया जा सकता है। यदि यह सिस्टम भारतीय रेलवे में लागू होता है तो बुजुर्ग, दिव्यांग और बीमार यात्रियों के लिए यात्रा बेहद आसान हो सकती है।करण भाटिया ने अपने इस नवाचार का प्रैक्टिकल प्रदर्शन मीडिया मंच राइजिंग भास्कर के सामने किया। राइजिंग भास्कर के ग्रुप एडिटर दिलीप कुमार पुरोहित ने खुद इस सिस्टम को फॉलो करके देखा और इसे वैज्ञानिक, व्यावहारिक और उपयोगी बताया।

ट्रेन रुकती है दो मिनट, यात्री रह जाते हैं असहाय

भारतीय रेल नेटवर्क दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्कों में से एक है। देश के करोड़ों लोग रोजाना ट्रेन से सफर करते हैं। लेकिन रेलवे यात्रियों के सामने एक आम समस्या हमेशा बनी रहती है—स्टेशन पर ट्रेन का बहुत कम समय तक रुकना। अक्सर बड़े स्टेशनों पर ट्रेन महज दो या तीन मिनट के लिए ही रुकती है। ऐसे में अगर यात्री के पास ज्यादा सामान हो तो उसे उतरने में काफी परेशानी होती है। यह समस्या बुजुर्गों, बीमार लोगों और दिव्यांग यात्रियों के लिए और भी बड़ी हो जाती है।

ऐसे हालात में यात्री अक्सर कुली को खोजते हैं। कई बार कुली समय पर नहीं मिलता या फिर किराए को लेकर बहस हो जाती है। कई बार यात्री मजबूरी में अधिक पैसे देकर सामान उठवाते हैं। करण भाटिया ने इसी समस्या का समाधान खोजने की कोशिश की और ‘ई-कूली’ नाम से एक डिजिटल मैकेनिज्म तैयार किया।

क्या है ‘ई-कूली’ सिस्टम

करण भाटिया का ‘ई-कूली’ सिस्टम एक ऑनलाइन पोर्टल या एप आधारित व्यवस्था है, जिसके जरिए यात्री अपने स्टेशन पर कुली को पहले से बुक कर सकते हैं। इस सिस्टम का उद्देश्य है कि यात्री के स्टेशन पहुंचने से पहले ही कुली निर्धारित स्थान पर मौजूद हो, ताकि सामान के साथ उतरने या चढ़ने में कोई परेशानी न हो। यह सिस्टम ठीक उसी तरह काम करता है जैसे टैक्सी या फूड डिलीवरी ऐप काम करते हैं। नीचे करण भाटिया के काल्पनिक एप का लिंक डाला जा रहा है। और इसका क्यूआर कोड भी डाला जा रहा है। इसे आम पाठक भी प्रैक्टिकल करके देख सकते हैं। करण का कहना है कि पाठकों के डाटा सुरक्षित रहेंगे और ओटीपी में उन्हें काल्पनिक नंबर भरने हैं। पहली बात तो ओटीपी आएगा ही नहीं और सिस्टम को प्रोसेस करने के लिए काल्पनिक ओटीपी भरने होंगे। यह एक तरह से प्रोसेस है जो दिखाने के लिए है कि सिस्टम कैसे काम करता है। नीचे दिए लिंक को ब्राउजर पर डालकर पाठक प्रैक्टिकल कर सकते हैं। यही नहीं क्यूआर कोड के माध्यम से भी पाठक प्रैक्टिकल कर सकते हैं। करण का कहना है कि उन्होंने यह सिस्टम केवल सांकेतिक रूप में बनाया है। रेलवे इसे अपनाता है तो कई यात्रियों का भला हो सकता है।

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राइजिंग भास्कर के मंच पर हुआ लाइव डेमो

करण भाटिया ने अपने इस सिस्टम का पूरा प्रेजेंटेशन राइजिंग भास्कर के ग्रुप एडिटर दिलीप कुमार पुरोहित के सामने किया। उन्होंने पोर्टल पर लॉगिन करके एक-एक स्टेप समझाया और बताया कि यात्री किस तरह आसानी से कुली बुक कर सकता है। इसके बाद दिलीप कुमार पुरोहित ने खुद इस प्रक्रिया को फॉलो करके देखा। उन्होंने पाया कि यह सिस्टम बेहद सरल और उपयोगी है और रेलवे यात्रियों की बड़ी समस्या का समाधान बन सकता है।

कैसे काम करता है यह पोर्टल

करण भाटिया द्वारा तैयार किए गए इस सिस्टम में यात्री को कुछ आसान स्टेप फॉलो करने होते हैं। सबसे पहले यात्री पोर्टल पर जाकर रेलवे स्टेशन चुनता है। उदाहरण के तौर पर स्टेशन चुना गया – Delhi Cantonment Railway Station। इसके बाद यात्री को पिकअप लोकेशन चुननी होती है, जैसे स्टेशन एंट्री गेट। फिर ड्रॉप लोकेशन यानी जिस प्लेटफॉर्म तक सामान ले जाना है, वह चुना जाता है। उदाहरण के तौर पर प्लेटफॉर्म नंबर 3। इसके बाद यात्री अपने लगेज का विवरण भरता है। जैसे –

  • ट्रॉली सूटकेस

  • डफेल बैग

  • बैकपैक

मान लीजिए कुल तीन सामान हैं।

इसके बाद सिस्टम किराया दिखाता है।

उदाहरण के लिए:

  • 1 ट्रॉली सूटकेस – 65 रुपये

  • 1 डफेल बैग – 40 रुपये

  • 1 बैकपैक – 50 रुपये

सब टोटल – 155 रुपये

इसके बाद जीएसटी जोड़कर कुल राशि लगभग 182.90 रुपये हो जाती है।

मोबाइल नंबर और पीएनआर से होगी पुष्टि

किराया देखने के बाद यात्री को अपना मोबाइल नंबर दर्ज करना होता है। फिर ओटीपी के जरिए वेरिफिकेशन होता है। इसके बाद यात्री को पीएनआर नंबर, नाम, मोबाइल नंबर, आयु, जेंडर और भाषा जैसी जानकारी भरनी होती है। जैसे ही यह प्रक्रिया पूरी होती है, सिस्टम यात्री को उस कुली की जानकारी देता है जो सेवा देने वाला है।

कुली की पूरी जानकारी भी मिलेगी

सिस्टम यात्री को कुली की पूरी जानकारी दिखाता है।

जैसे:

  • कुली का नाम

  • आईडी नंबर

  • स्टार रेटिंग

  • अनुमानित पहुंचने का समय

उदाहरण के तौर पर कुली का नाम रमेश कुमार, आईडी 4521 और अनुमानित आगमन समय 3 मिनट दिखाया जा सकता है। साथ ही यात्री को मीटिंग पॉइंट भी बताया जाता है, जैसे प्लेटफॉर्म नंबर 3 का प्रवेश द्वार।

डिजिटल पेमेंट की सुविधा

इस सिस्टम में भुगतान की भी डिजिटल व्यवस्था है। यात्री कुली की सेवा का भुगतान कई तरीकों से कर सकता है, जैसे:

  • यूपीआई

  • कार्ड

  • यूपीआई आईडी

इससे नकद लेनदेन की समस्या भी खत्म हो जाती है और किराए को लेकर विवाद की स्थिति भी नहीं बनती।

दिव्यांगों के लिए भी हो सकती है बड़ी मदद

करण भाटिया का कहना है कि इस सिस्टम के जरिए रेलवे दिव्यांग यात्रियों के लिए व्हीलचेयर सेवा को भी जोड़ सकता है। यदि यात्री व्हीलचेयर की जरूरत बताता है तो स्टेशन पर पहले से व्हीलचेयर उपलब्ध कराई जा सकती है। इससे दिव्यांग यात्रियों की यात्रा बेहद आसान हो सकती है।

एक घटना से आया यह विचार

करण भाटिया ने बताया कि इस सिस्टम का विचार उन्हें एक वास्तविक घटना से आया। एक बार वह जयपुर से ट्रेन में सफर कर रहे थे। ट्रेन अगले स्टेशन पर रुकने वाली थी और एक बुजुर्ग यात्री को उतरना था। उस बुजुर्ग के पास काफी सामान था। ट्रेन सिर्फ दो मिनट के लिए रुकने वाली थी। उन्होंने कुली को बुलाया लेकिन किराए को लेकर बहस होने लगी। आखिरकार उन्हें मजबूरी में ज्यादा पैसे देने पड़े। करण भाटिया उस बुजुर्ग की मदद करना चाहते थे, लेकिन उनके अपने सामान की निगरानी करने वाला कोई नहीं था।उसी समय उनके मन में विचार आया कि ऐसा सिस्टम होना चाहिए जिससे कुली पहले से बुक किया जा सके।

पिता पंकज भाटिया का मिला मार्गदर्शन

करण भाटिया ने बताया कि इस विचार को वास्तविक रूप देने में उनके पिता पंकज भाटिया का महत्वपूर्ण योगदान रहा। उनके मार्गदर्शन में ही इस डिजिटल सिस्टम का प्रारूप तैयार किया गया। करण ने बताया कि उन्होंने इस विचार को तकनीकी रूप में विकसित किया ताकि इसे आसानी से उपयोग किया जा सके।

केंद्र सरकार को भेजा सुझाव

करण भाटिया ने अपने इस इनोवेशन का प्रस्ताव देश के शीर्ष संस्थानों और अधिकारियों को भी भेजा है।

उन्होंने यह सुझाव भेजा है:

  • पीएमओ। 

  • नीति आयोग।

  • रेल मंत्रालय।

  • रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव।

करण का मानना है कि यदि रेलवे इस सिस्टम को अपनाता है तो देश के लाखों यात्रियों को सीधा लाभ मिल सकता है।

रेलवे के लिए भी फायदेमंद

यह सिस्टम केवल यात्रियों के लिए ही नहीं बल्कि रेलवे के लिए भी उपयोगी हो सकता है। इससे रेलवे स्टेशन पर कुलियों की सेवाओं को व्यवस्थित किया जा सकता है। डिजिटल भुगतान और बुकिंग से पारदर्शिता बढ़ेगी और यात्रियों का भरोसा भी मजबूत होगा।

एक विचार बदल सकता है व्यवस्था

करण भाटिया का यह इनोवेशन इस बात का उदाहरण है कि एक साधारण विचार भी बड़े बदलाव की शुरुआत बन सकता है। यदि रेलवे इस सिस्टम को अपनाता है तो यह व्यवस्था भारतीय रेल यात्रियों के लिए एक नई सुविधा का रूप ले सकती है।

युवाओं के लिए प्रेरणा

जैसलमेर जैसे ऐतिहासिक शहर से निकले इस युवा ने यह साबित कर दिया है कि यदि सोच सकारात्मक हो और समस्या का समाधान खोजने का जज्बा हो तो बड़े बदलाव संभव हैं। करण भाटिया का ‘ई-कूली’ सिस्टम न केवल एक तकनीकी सुझाव है बल्कि यह समाज के कमजोर वर्गों—बुजुर्गों, दिव्यांगों और बीमार लोगों—के लिए सहारा बनने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल भी है।जैसलमेर की धरती ने इतिहास में कई गौरवशाली कहानियां दी हैं। अब उसी धरती से एक युवा का ऐसा विचार सामने आया है जो भारतीय रेलवे की व्यवस्था को अधिक मानवीय और सुविधाजनक बना सकता है। अब देखना यह है कि क्या भारतीय रेलवे इस नवाचार को अपनाकर यात्रियों की इस बड़ी समस्या का समाधान करता है या नहीं। लेकिन इतना निश्चित है कि करण भाटिया का यह विचार आने वाले समय में एक महत्वपूर्ण बदलाव की शुरुआत बन सकता है।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor