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केन्द्रीय विश्वविद्यालय में राजस्थानी संकाय शीघ्र खोला जाए : कमल रंगा

दिलीप कुमार पुरोहित. बीकानेर 
राजस्थान के एक मात्र केन्द्रीय विश्वविद्यालय जो कि किशनगढ़ स्थित है, में राजस्थानी भाषा का संकाय शीघ्र खोला जाए, क्योंकि प्रदेश के करोड़ों लोगों की मातृभाषा राजस्थानी है। जैसा की ज्ञात हुआ है कि केन्द्रीय विश्वविद्यालय में मराठीभाषा का संकाय खोलने का प्रस्ताव रखा गया है। ऐसी स्थिति में प्रदेश की प्रमुख एवं समृद्ध राजस्थानी भाषा का संकाय न होना एक दु:खद पहलू है। जबकि केन्द्रीय विश्वविद्यालय में सर्वाधिक छात्र राजस्थान के ही है, मूलत: उनकी मातृभाषा राजस्थानी ही है।
राजस्थानी युवा लेखक संघ के प्रदेशाध्यक्ष एवं राजस्थानी मान्यता आंदोलन के प्रवर्तक कमल रंगा ने इस संदर्भ में बताया कि प्रदेश के अन्य विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में राजस्थानी भाषा का संकाय है। राजस्थानी विषय में सैंकड़ों छात्र एम.ए कर रहे हैं, और पीएचडी भी अधिकाधिक हो रही है। राजस्थानी भाषा देश की प्रमुख भाषा है जो कि भाषा के सभी वैज्ञानिक मानदण्डों पर खरी उतरती है। जिसका प्राचीन एवं आधुनिक समृद्ध साहित्य है। इसका विशाल शब्दकोश एवं व्याकरण तो है ही साथ ही इसकी देवनागरी लिपि है। ऐसे में राजस्थानी के छात्र-छात्राओं एवं भाषा के साथ न्याय होना चाहिए।
रंगा ने कहा कि प्रदेश में  राजस्थानी भाषा की बजाय मराठी भाषा को महत्व देना उचित नहीं है। मराठी भाषा को तो प्रदेश में महत्व मिल रहा है, परन्तु राजस्थानी को नहीं। यह एक विचारणीय विषय है। उन्होने कहा कि इस विश्वविद्यालय में राजस्थानी के अलावा अन्य भारतीय भाषाओं के संकाय भी आवश्यकतानुसार खोले जाएं, तो किसी भी राजस्थानी समर्थक को कोई एतराज नहीं है। परन्तु राजस्थानी को  प्राथमिकता मिलनी चाहिए। इस संवेदनशील विषय को लेकर प्रदेश के राजस्थानी भाषा समर्थक, साहित्यकार एवं राजस्थानी के छात्र-छात्राओं में राजस्थानी भाषा की अनदेखी करने पर रोष व्याप्त है।
राजस्थानी युवा लेखक संघ के प्रदेशाध्यक्ष एवं राजस्थानी मान्यता आंदोलन के प्रवर्तक कमल रंगा ने इस बाबत राज्य के मुख्यमंत्री एवं केन्द्रीय मंत्री तथा संबंधित मंत्रालय आदि को पत्र लिखकर मांग की है कि वे अपने स्तर पर शीघ्र उचित एवं ठोस कार्रवाई करवाकर राजस्थानी भाषा को उसका मान-सम्मान दिलवाते हुए, केन्द्रीय विश्वविद्यालय में राजस्थानी भाषा संकाय शीघ्र खुलवाने की कार्यवाही करवावें।
Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor