समीक्षक : मनशाह “नायक”
नाइटिंगल ऑफ इंडिया ( सरोजनी नायडू) हो या मलयालम कवयित्री कमला सुरैया हो या कि मनु भंडारी, अक्सर महिला रचनाकारों की रचनाओं में पितृसत्ता के विरोध के नाम पर पुरुष के हर रूप की खिलाफत करना ही उनके लेखन का मूल स्वर रहा है। लेकिन पूजा अग्रवाल की कविताओं में स्त्री – पुरुष के “दाम्पत्य जीवन” में परस्पर संतुलन का अनूठा सौंदर्य है। इनकी कविता में नारी समाज में एक संतुलित भूमिका निभाती है। वह न तो पुरुष से आगे निकलना चाहती है और न ही पुरुष से पीछे रहना चाहती है। वह एक दूसरे के पूरक और एक दूसरे के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना चाहती है।…
कविता मानव सभ्यता की सबसे प्राचीन अभिव्यक्तियों में से एक है। मनुष्य के साथ कविता का और कविता के साथ मनुष्य का बहुत ही गहरा रिश्ता है। जब शिशु अपनी माता के गर्भ से सिर के बल धरती पर उतरता है, तभी जीवन की पहली कविता किलकारी बनकर उसके साथ उतरती है।
“यादों का मौसम” उदित कवयित्री पूजा अग्रवाल का सद्य प्रकाशित प्रथम काव्य संग्रह है। इस काव्य संग्रह के बारे में लोकार्पण के दौरान प्रसिद्ध शब्दचित्र लेखिका डॉ.पद्मजा शर्मा ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा था कि “लगता नहीं है कि यह इनका प्रथम काव्य संग्रह है।” डॉ. शर्मा की ये टिप्पणी बहुत मायने रखती है।
पूजा अग्रवाल के इस काव्य संग्रह की कविताओं में जीवन का अतीत अंगड़ाइयां लेता दिखता है जिसमें प्रेम की पीड़ा, विरह की वेदना, इंतज़ार की घड़ियां, टूटे सपनों को जोड़ने की कवायद, और भविष्य के सुंदर सपनों की कश्मकश , छटपटाहट और अकुलाहट है।
नाइटिंगल ऑफ इंडिया ( सरोजनी नायडू) हो या मलयालम कवयित्री कमला सुरैया हो या कि मनु भंडारी, अक्सर महिला रचनाकारों की रचनाओं में पितृसत्ता के विरोध के नाम पर पुरुष के हर रूप की खिलाफत करना ही उनके लेखन का मूल स्वर रहा है। लेकिन पूजा अग्रवाल की कविताओं में स्त्री – पुरुष के “दाम्पत्य जीवन” में परस्पर संतुलन का अनूठा सौंदर्य है। इनकी कविता में नारी समाज में एक संतुलित भूमिका निभाती है। वह न तो पुरुष से आगे निकलना चाहती है और न ही पुरुष से पीछे रहना चाहती है। वह एक दूसरे के पूरक और एक दूसरे के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलना चाहती है।
वे “कुछ क़दम” कविता में कहती हैं:
“तुम्हारे काँधे पर सर रखकर/ तुम्हारे साथ/ कुछ क़दम /चलना चाहती हूं…।
इनकी कविताओं में सामाजिक जीवन की गहरी भावनाओं की पराकाष्ठा और मानवीय संवेदनाओं की चरम ऊंचाई है। कविता संग्रह के केंद्र में एक संस्कारित ग्रहणी है जो एक शांत नदी की तरह सदैव सहजता और सजगता के साथ मर्यादा का पालन करते हुए अपने कर्तव्य पथ पर चलती हुई सुन्दर समाज के निर्माण की बात करती है।
देखिए “नदी” शीर्षक वाली कविता का एक सुंदर बिम्ब – नदी बहती है/ऊंचाइयों से/उतरकर जमी पर/ कर देती है हरा भरा/ बहा ले जाती है सूनापन रेगिस्तान का भी/ बहती रहती है बिना किनारों के भी/ चंचल है, पर नहीं तोड़ती अपनी मर्यादा।”
इनकी कविताएं पारिवारिक संदर्भों को छूते हुए पाठक को विराट संसार में ले जाती हैं। जैसे कि :- मैं वही चिड़िया हूं/ जो तेरे आंगन में चहकती थी/ फुदकती थी/ जबसे तुमने रखना दाना छोड़ दिया/ मैंने भी आना जाना छोड़ दिया ( चिड़िया की गुहार) तथा अपने मुंह का निवाला मुझे खिलाने लगी/ माँ बनने के बाद माँ समझ आने लगी।”( माँ बनी तो माँ समझ आने लगी)। कालजयी कविता की एक विशेषता यह भी होती है कि उसमें प्रयुक्त “उपमान” कहीं न कहीं “उपमेय” से श्रेष्ठ होते हैं। यही खूबी पूजा अग्रवाल की कविताओं में यत्र – तत्र दिखाई देती है।
जैसे :- वक़्त फिसलता गया/ मेरे हाथ से/ बंद मुट्ठी की रेत सा / हथेली में चिपकी रह गई/ महज चंद यादें..।
पेड़ों को काट कर उसकी लकड़ी से बनाए गए कागज़ पर किसी वृक्ष की स्तुति लिखनी हो, तो इस संग्रह की पहली कविता “पलाश का पेड़” उसके लिए सर्वाधिक उपयुक्त होगी। वे लिखती हैं :- बरसों से अकेला खड़ा है पलाश का पेड़/ सुर्ख फूलों सी पंखुड़ियाँ थक गई हैं/ निहारते हुए किसी की राह।” यह उनके भीतर के मौन की मुखर अभिव्यक्ति है। कवयित्री पूजा अग्रवाल कविता की “कहन कला” की ऐसी कुशल कारीगर हैं जो अपने शब्दों के रचाव में श्रोताओं के मन को गहरा बांध लेती हैं, पर जकड़ती बिल्कुल भी नहीं। इनकी कविताएं पाठक को बौद्धिक भुलभुलैया में ले जाकर गुम कर देती हैं । इनकी कविता में उभरा प्रत्येक विचार एक नए प्रश्न को जन्म देता है। विचारों में कविता हो न हो, पर कविता में विचार होते ही हैं।
“मुझे पंख कमाने हैं” कविता में वे कहती हैं – “रास्ते मुश्क़िल हैं अनजाने हैं/ पर मुझे पंख कमाने हैं। हालांकि पंख पक्षियों को ही शोभा देते हैं। मनुष्य के पंख आना शुभता का सूचक नहीं है। परन्तु मैं स्पष्ट कर दूं कि कवयित्री यहां पंख कमाने की बात कर रही है जिसमें उनके कुछ कर गुज़रने का जूनून सपनों के डेने फैला कर बोलता है। इस काव्य संग्रह में चिड़िया, नदी, सब जायज़ है, हमसफ़र, जीवन एक मंच, एकांतवास, यादों का मौसम, बचपन लौटा दो, नदी सी औरत, सौगात, स्त्री, क्योंकि मैं लड़की हूं, माँ बनी तो माँ समझ आने लगी और सीप शीर्षक वाली कविताएं इस काव्य संग्रह की प्रतिनिधि कविताएं हैं । इस संग्रह में किसी एक विषय की निरपेक्ष प्रधानता नहीं है । इसमें बहुकेंद्रीय कविताएं हैं। विषय वैविध्य और तत्त्व की गहराई इस संग्रह की विशेषता है। जिन्हें पढ़कर पाठक भीतर से रूपांतरित होने लगता है। कवयित्री ने इस काव्य संग्रह में अपने अतीत की वेदना, वर्तमान की उठापटक और भविष्य के सुनहरे सपनों को लेकर अपने भीतर के मौन को मुखरित किया है। वे अपने समय को अपनी स्वयं की पूरी चेतना के साथ व्यक्त करती हैं जो कि उनके अपने भीतर उठने वाले शाश्वत द्वंद का प्रतीक है।
बेशक किसी के लिए कविता अभिरुचि है तो किसी के लिए कविता एक मिशन। परन्तु पूजा अग्रवाल के लिए कविता उनकी जिंदगी है। वे औसत कवयित्रियों से काफी ऊंचाई पर जीती हैं। उनकी कविताओं में उनका अपना जीवन झलकता है। वे अपनी कविताओं में भी उतनी ही गंभीर और अनुशासित हैं, जितनी कि वे अपने निजी जीवन में। उनकी साहित्यिक यात्रा का प्रमुख उद्देश्य है मनुष्य की चेतना का उन्नयन। यही वजह है कि इनकी कविताएं पाठकों के हृदय में आसानी से जगह बना लेती हैं।
इनकी कविताएं वामपंथी कविताओं से अलग समकालीन कविता का नया वर्जन है। जिसमें व्यापक दृष्टिकोण और शक्तिशाली कथ्य विद्यमान है। उनकी कविताओं में उनका अपना शिल्प, अपना अलंकार, अपनी ज़मीन, अपना रूपक और अपना मुहावरा है। मिसाल के तौर पर :- लौटता हुआ पंछियों का कारवां/सूरज की ढलती रोशनी में नहाई सी/ तारों की चूनर ओढ़े/ माथे पर चांद की बिंदिया लगाए/ सपनों की डोर हाथों में लिए/ अपने पंख फैलाए/ रात के नगर में/ तुम्हारे साए में ख़ुद को समेटे/ तुम्हारे साथ कुछ क़दम/ चलना चाहती हूँ..।
उनके पास साहित्यिक शब्दावली का विशाल भण्डार है और भाषा ज्ञान बहुत पुष्ट है। उन्होंने हिंदी के साथ उर्दू, अरबी और फारसी भाषा के आमफहम लफ़्ज़ों का उनके मिजाज़ के मुताबिक़ खुलकर प्रयोग किया है।
पूजा अग्रवाल की कविताओं की एक विशेषता यह भी है कि इनकी कविताएं छंद मुक्त तो हैं परन्तु मुक्त छंद नहीं हैं। यही वजह है कि इनकी कविताओं में एक सम्मोहक लय और संप्रेषणीयता का तीव्र प्रवाह मौजूद है जिससे पाठक अनायास ही मौन सहभागी बन जाता है।
उनकी उत्कृष्ट कविताओं की कुछ मिसालें:- खामोश दीवारों पर/कुछ कहे अनकहे कितने ही चेहरे/बेताब हैं/ उस एक नज़र के लिए/ जो पढ़ सके/ मन की किताब( खामोश दीवारों पर) जीवन एक मंच है/ रंगों का उमंगों का/ प्रेम प्रीत का/ स्नेह का अतरंगों का( जीवन एक मंच है) बह जाने दो/पलकों पर भार बने उन आंसुओं को/ जो व्यर्थ ही/ संजो रखे हैं तुमने/ गए वक़्त पर बहाने के लिए( बह जाने दो)।
शहरे आफ़ताब के अदबी ग़ज़ाने से समय समय पर कई नायब हीरे निकले हैं। पूजा अग्रवाल भी उन्हीं में से एक हैं। इनकी कविताओं के तेवर देख कर लगता है कि यह कविता के नए युग की शुरुआत है। वे “स्त्री” कविता में कहती हैं – स्त्री बाहर पैसे कमाने नहीं जाती/ जाती है कमाने/ नाम और पहचान/ इज़्ज़त और रुतबा/ कमाने जाती है हौसला अपने पैरों पर खड़े होने का/ लड़ने का अपने भीतर चल रहे तूफानों से…।
किसी भी रचना के अधिकतम दो अंतिम ठिकाने होते हैं। या तो वह एक दिन कचरे के ढेर में चली जाती है, या फिर वह एक दिन इतिहास में दर्ज़ होती है। यक़ीनन पूजा अग्रवाल जी की कविताएं भी इतिहास में दर्ज़ होने योग्य हैं।
और अंत में मेरा एक दोहा जो कि इस काव्य संग्रह के समग्र रूप को बयान करता है :-
ग़म, खुशियां, मजबूरियां, काँटे और गुलाब
यादों का मौसम खिला, बनकर एक किताब
…………….
यादों का मौसम – काव्य संग्रह
कवयित्री – पूजा अग्रवाल
विधा – कविता
मूल्य – 250 रुपए
प्रकाशक – हिंदी शिक्षण संस्थान, जोधपुर ।
– मनशाह “नायक
पता : – हर्मिटेज़ , सूरसागर, जोधपुर(राजस्थान)
मो. 8890162146









