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Wednesday, April 29, 2026, 4:34 pm

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राइजिंग भास्कर इम्पैक्ट : विश्व प्रसिद्ध जैसलमेर के गड़ीसर की छतरियों की मरम्मत शुरू

अब बड़ाबाग की छतरियों की मरम्मत के लिए भी पहल हो; ये छतरियां हालांकि पूर्व राजपरिवार की निजी संपत्ति है, मगर यह भी ऐतिहासिक महत्व की है और विश्व की सांस्कृतिक और महत्वपूर्ण धरोहर है….

दिलीप कुमार पुरोहित. जैसलमेर

9783414079 diliprakhai@gmail.com

स्वर्णनगरी जैसलमेर, जो अपनी अद्भुत स्थापत्य कला, ऐतिहासिक धरोहरों और सांस्कृतिक वैभव के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है, अपनी ही विरासत को बचाने के लिए संघर्ष कर को अभिशप्त रहा है। शहर का ऐतिहासिक गड़ीसर तालाब और इसके आसपास स्थित रियासतकालीन छतरियां जर्जर अवस्था में पहुंच चुकी हैं। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए जैसलमेर के जागरूक नागरिक पंकज भाटिया ने केंद्र और राज्य के संबंधित विभागों को पत्र लिखकर ‘फास्ट रिस्पॉन्स मेंटेनेंस टीम’ के गठन की मांग की थी। इस मुद्दे को राइजिंग भास्कर ने 15 अप्रैल के अंक में तत्परता से उठाया था। पंकज भाटिया का कहना था कि अब समय आ गया है कि ऐतिहासिक धरोहरों को बचाने के लिए पारंपरिक और धीमी प्रशासनिक प्रक्रियाओं से आगे बढ़कर त्वरित कार्रवाई की व्यवस्था की जाए। खबर प्रकाशन के बाद प्रशासन हरकत में आया और जैसलमेर की विश्व प्रसिद्ध गड़ीसर की छतरियों का मरम्मत कार्य शुरू हो गया है। अब इसी तरह बड़ाबाग की छतरियों की मरम्मत का काम शुरू करने की पहल करनी होगी। बड़ाबाग की छतरियां पूर्व राजपरिवार की निजी संपत्ति है, मगर सरकार और विभागीय पहल भी जरूरी है ताकि विरासत का संरक्षण हो सकें।

जैसलमेर… गड़ीसर की पुकार : ध्वस्त होती विरासत को बचाने के लिए ‘फास्ट रिस्पॉन्स मेंटेनेंस टीम’ गठित हो – Rising Bhaskar

जैसलमेर… गड़ीसर की पुकार : ध्वस्त होती विरासत को बचाने के लिए ‘फास्ट रिस्पॉन्स मेंटेनेंस टीम’ गठित हो

 

ऐतिहासिक छतरियाें का अस्तित्व बचाना जरूरी : 

गड़ीसर तालाब के किनारे स्थित प्राचीन छतरियां केवल पत्थरों की संरचना नहीं हैं, बल्कि वे जैसलमेर की सांस्कृतिक पहचान और रियासतकालीन वैभव की जीवंत गवाही हैं। ये छतरियां स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण मानी जाती हैं और स्थानीय लोगों के साथ-साथ देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र रही हैं। लेकिन वर्तमान में इन छतरियों की हालत बेहद चिंताजनक हो चुकी है। कई संरचनाएं टूट चुकी हैं, जबकि कई गिरने की कगार पर हैं। बबूल और झाड़ियों से घिरी ये धरोहरें उपेक्षा की मार झेल रही हैं।

मरम्मत में देरी सबसे बड़ा खतरा बन रही थी

पंकज भाटिया ने अपने पत्र में प्रमुख रूप से इस बात को उठाया था कि इन ऐतिहासिक संरचनाओं की मरम्मत और संरक्षण के लिए अनुमति प्राप्त करने की प्रक्रिया अत्यधिक जटिल और समय लेने वाली है। अक्सर किसी भी मरम्मत कार्य को शुरू होने में तीन से छह महीने या उससे भी अधिक समय लग जाता है। इस दौरान यदि बारिश का मौसम आ जाए, तो पानी और नमी के कारण संरचनाओं को और अधिक नुकसान पहुंचता है। स्थिति कई बार इतनी गंभीर हो जाती है कि छतरियों के हिस्से टूटकर गिरने लगते हैं, जिससे उनकी मूल संरचना को स्थायी क्षति का खतरा बढ़ जाता है।

‘फास्ट रिस्पॉन्स मेंटेनेंस टीम’ की आवश्यकता

इसी समस्या के समाधान के रूप में पंकज भाटिया ने ‘फास्ट रिस्पॉन्स मेंटेनेंस टीम’ के गठन का सुझाव दिया था। उन्होंने केंद्रीय पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत, पुरातत्व विभाग और अन्य संबंधित अधिकारियों को भेजे पत्र में कहा था कि इस टीम में पर्यटन विभाग, पुरातत्व विभाग, स्थानीय प्रशासन और तकनीकी विशेषज्ञों को शामिल किया जाए। इस टीम का उद्देश्य यह हो कि जैसे ही किसी ऐतिहासिक संरचना के क्षतिग्रस्त होने की सूचना मिले, तुरंत निरीक्षण किया जाए और बिना देरी के मरम्मत कार्य शुरू किया जाए। यदि विभिन्न विभागों के बीच समन्वय स्थापित कर एक संयुक्त त्वरित टीम बनाई जाती है, तो यह ऐतिहासिक धरोहरों को बचाने की दिशा में एक प्रभावी और व्यावहारिक कदम साबित हो सकता है।

राइजिंग भास्कर के सवाल जो अब भी उत्तर मांग रहे :  

1-गड़ीसर तालाब: एक जीवंत धरोहर से ‘मृत’ जलाशय तक

राइजिंग भास्कर के कई सवाल आज भी कायम है जो आज भी उत्तर मांग रहे हैं। गड़ीसर तालाब कभी जैसलमेर शहर की जीवनरेखा हुआ करता था। यह न केवल शहर की प्यास बुझाता था, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का भी केंद्र था। मांगलिक कार्यों में इस तालाब के पानी का विशेष महत्व था। लेकिन समय के साथ इस तालाब की स्थिति लगातार बिगड़ती गई। तालाब की आगौर (कैचमेंट एरिया) में अतिक्रमण बढ़ता गया और धीरे-धीरे इसके चारों ओर कॉलोनियां बस गईं। इसका सीधा असर तालाब में पानी की आवक पर पड़ा, जिससे यह प्रदूषित होने लगा।

2-पर्यटन के नाम पर दोहन

प्रशासन ने गड़ीसर तालाब को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने के नाम पर यहां नौकायन की व्यवस्था शुरू की, लेकिन इसके दुष्परिणामों पर ध्यान नहीं दिया। नौकायन और अन्य व्यावसायिक गतिविधियों ने तालाब की स्वच्छता को प्रभावित किया। पानी गंदा और बदबूदार हो गया। आज स्थिति यह है कि इस तालाब का पानी न तो पीने योग्य है और न ही धार्मिक कार्यों में उपयोग के योग्य रह गया है।

3-अतिक्रमण और अव्यवस्था का जाल

गड़ीसर तालाब के चारों ओर अतिक्रमण की समस्या विकराल रूप ले चुकी है। जहां कभी प्राकृतिक जलागम क्षेत्र हुआ करता था, वहां आज कॉलोनियां, होटल, व्यावसायिक प्रतिष्ठान और सरकारी भवन खड़े हो चुके हैं। तालाब के किनारे विभिन्न समाजों की बगीचियां आज भी अपने प्राचीन वैभव की कहानी कहती हैं, लेकिन उनका संरक्षण भी सही तरीके से नहीं हो पा रहा है।

4-प्रशासनिक उदासीनता और विफल योजनाएं

जैसलमेर में वर्षों से कई प्रशासनिक अधिकारी आए और गए। हर किसी ने गड़ीसर तालाब को लेकर योजनाएं बनाई, लेकिन अधिकांश योजनाएं कागजों तक ही सीमित रह गईं। नहरी पानी लाने की योजना भी बनाई गई, लेकिन वह भी कभी साकार नहीं हो पाई। नतीजतन तालाब की स्थिति और खराब होती गई। आरोप यह भी हैं कि योजनाओं के नाम पर धन का दुरुपयोग हुआ, लेकिन स्थायी समाधान नहीं निकाला गया।

5-जनता की भी जिम्मेदारी

इस पूरे परिदृश्य में केवल प्रशासन ही नहीं, बल्कि स्थानीय जनता की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। समय रहते अतिक्रमण और दोहन के खिलाफ आवाज नहीं उठाई गई। आज स्थिति यह है कि जिस तालाब को बचाने के लिए सामूहिक प्रयास की जरूरत थी, उसे नजरअंदाज कर दिया गया।

6-संस्कृति और विरासत पर संकट

गड़ीसर तालाब और इसकी छतरियां केवल ऐतिहासिक धरोहर नहीं हैं, बल्कि वे जैसलमेर की संस्कृति और परंपरा का अभिन्न हिस्सा हैं। इनका क्षरण केवल भौतिक नुकसान नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत का भी ह्रास है। यदि समय रहते इनका संरक्षण नहीं किया गया, तो आने वाली पीढ़ियां इस अमूल्य धरोहर से वंचित रह जाएंगी।

7-गड़ीसर ही नहीं बड़ाबाग की छतरियों के लिए भी पहल हो : 

‘फास्ट रिस्पॉन्स मेंटेनेंस टीम’ इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। इसके साथ ही अतिक्रमण हटाने, जलागम क्षेत्र को पुनर्स्थापित करने और तालाब की सफाई के लिए व्यापक अभियान चलाने की आवश्यकता है। साथ ही, पर्यटन गतिविधियों को नियंत्रित और पर्यावरण के अनुकूल बनाने की जरूरत है, ताकि विकास और संरक्षण के बीच संतुलन बनाया जा सके। यह तो हुई गड़ीसर की बात। अब बड़ाबाग की छतरियों की मरम्मत के लिए भी पहल होनी चाहिए। हालांकि बड़ाबाग की छतरियां पूर्व राजपरिवार की निजी संपत्ति है, लेकिन इस ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण के लिए भी पुरातत्व विभाग, सरकार और प्रशासन को पहल करनी होगी।

9-अब भी नहीं चेतते तो देर हो जाती 

गड़ीसर तालाब और उसकी छतरियां आज जिस स्थिति में हैं, वह केवल एक शहर की समस्या नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी रही है। यदि हम अपनी ऐतिहासिक विरासत को बचाने के लिए जागरूक नहीं होते तो देर हो जाती। यह हमारी सामूहिक विफलता होती। आज जरूरत है ठोस नीतियों, त्वरित कार्रवाई और जन-जागरूकता की। ‘फास्ट रिस्पॉन्स मेंटेनेंस टीम’ का गठन इस दिशा में एक प्रभावी शुरुआत हो सकता है। जैसलमेर की पहचान उसकी विरासत से है—यदि विरासत ही नहीं बचेगी, तो “सोने का शहर” केवल सोने का शहर यानी ऊंघता हुए शहर बनकर रह जाएगा। फास्ट रिस्पॉन्स मेंटेनेंस टीम का गठन हर उस विरासत के संरक्षण के लिए होना चाहिए जो पुरातत्व एवं ऐतिहासिक महत्व की है।

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor