डॉ. रतना ने 32 साल पहले बनाड़ में असहाय पशु-पक्षी केंद्र की स्थापना की थी… यह सेवा, संवेदना और समर्पण का ऐसा संसार है, जहां मूक प्राणियों को मिलता है नया जीवन…अनंत अंबानी ने हाथियों के लिए वंतारा बनाया तो डॉ. रतना ने असहाय पशु-पक्षियों के लिए…एक महिला के प्रयास से इतना महान कार्य उनके समर्पण के बिना संभव नहीं था…पशु-पक्षियों के प्रति उनकी करूणा और प्रेम उन्हें मानव से महामानव की श्रेणी में खड़ा कर देता है…।
दिलीप कुमार पुरोहित. जोधपुर
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जब भी पशु-पक्षियों की सेवा की बात होती है, तो आज देशभर में अनंत अंबानी के “वंतारा” की चर्चा होती है, जहां घायल और असहाय हाथियों को संरक्षण, उपचार और नया जीवन दिया जा रहा है। लेकिन राजस्थान के जोधपुर में पिछले तीन दशकों से एक ऐसा केंद्र भी निरंतर सेवा की मिसाल बना हुआ है, जिसे स्थानीय लोग प्रेम से “जोधपुर का वंतारा” कहते हैं। यह स्थान है—डॉ. रतना का असहाय पशु-पक्षी केंद्र।
यह केंद्र केवल एक पशु चिकित्सालय नहीं, बल्कि उन हजारों मूक प्राणियों का घर है, जिन्हें समाज अक्सर बेसहारा छोड़ देता है। यहां घायल, अंधे, लूले-लंगड़े, दुर्घटनाग्रस्त और असहाय पशु-पक्षियों को न केवल चिकित्सा मिलती है, बल्कि स्नेह, सुरक्षा और परिवार जैसा अपनापन भी मिलता है। यही कारण है कि यह केंद्र आज जोधपुर ही नहीं, बल्कि पूरे राजस्थान में सेवा और करुणा का प्रतीक बन चुका है।
बचपन का प्रेम बना जीवन का मिशन
डॉ. रतना बचपन से ही पशु-पक्षियों के प्रति अत्यंत संवेदनशील रही हैं। किसी घायल पक्षी को देखकर उनका मन बेचैन हो उठता था और किसी असहाय जीव की सहायता करना उनके स्वभाव का हिस्सा बन गया था। धीरे-धीरे यही संवेदना उनके जीवन का उद्देश्य बन गई।
उन्होंने अपने इस लगाव को केवल भावना तक सीमित नहीं रखा, बल्कि जीव-जंतु विज्ञान में एमएससी और बाद में पीएचडी की उपाधि प्राप्त कर इसे वैज्ञानिक आधार भी दिया। पशु-पक्षियों के व्यवहार, उनकी शारीरिक समस्याओं और उनकी मानसिक संवेदनाओं को समझने में उनकी यह शिक्षा आज अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो रही है।
पिता से मिली सेवा और साहस की प्रेरणा
डॉ. रतना के व्यक्तित्व में सेवा, अनुशासन और साहस के संस्कार उन्हें अपने पिता से विरासत में मिले। उनके पिता प्रथम विश्व युद्ध के साक्षी रहे थे। संघर्षों से भरे जीवन और मानवता के प्रति समर्पण ने डॉ. रतना को भीतर से मजबूत बनाया। उन्होंने सीखा कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल स्वयं के लिए जीना नहीं, बल्कि उन लोगों और प्राणियों के लिए भी जीना है, जो असहाय हैं और जिन्हें सहारे की आवश्यकता है। यही विचार आगे चलकर उनके जीवन की दिशा बना।
32 वर्ष पहले शुरू हुआ “जोधपुर का वंतारा”
आज से लगभग 32 वर्ष पूर्व जोधपुर के बनाड़ रोड स्थित कैंट स्टेशन के सामने यह सेवा यात्रा शुरू हुई थी। उस समय न संसाधन थे, न बड़ा ढांचा और न ही कोई विशेष आर्थिक सहयोग। लेकिन डॉ. रतना के भीतर सेवा का जो संकल्प था, उसने धीरे-धीरे लोगों को उनसे जोड़ना शुरू कर दिया। समाजसेवियों, दानदाताओं और भामाशाहों के सहयोग से यह एक बड़े केंद्र में बदल गया। आज यह असहाय पशु-पक्षी केंद्र हजारों घायल और बेसहारा जीवों के लिए आश्रय स्थल बन चुका है।
यदि अनंत अंबानी का वंतारा वन्यजीवों के लिए आधुनिक संरक्षण केंद्र माना जाता है, तो डॉ. रतना का यह केंद्र मानवीय संवेदना और समर्पण से निर्मित ऐसा “वंतारा” है, जहाँ हर जीव को परिवार का सदस्य समझा जाता है।
क्यों कहा जाता है इसे “जोधपुर का वंतारा” ?
इस केंद्र की प्रमुख विशेषताएँ
- घायल और दुर्घटनाग्रस्त पशु-पक्षियों का निःशुल्क उपचार
- अंधे, लूले-लंगड़े और असहाय जीवों की स्थायी देखभाल
- ऑपरेशन और रिकवरी की संपूर्ण सुविधा
- पक्षियों के लिए विशेष संरक्षण व्यवस्था
- गाय, कुत्ता, बिल्ली, मोर, कबूतर, खरगोश, तोता, चिड़िया, चील, मुर्गा, झाऊ चूहा, कछुआ सहित अनेक जीवों की सेवा
- अनुभवी चिकित्सकीय निगरानी
- पशु-पक्षियों के लिए सुरक्षित और पारिवारिक वातावरण
- चाइनीज मांझे और पटाखों से घायल पक्षियों के लिए विशेष अभियान
हर जीव को मिलता है परिवार जैसा स्नेह
डॉ. रतना के केंद्र में आने वाला हर जीव केवल “मरीज” नहीं होता, बल्कि परिवार का हिस्सा बन जाता है। यहाँ घायल मोर के पंखों का उपचार भी उसी ममता से होता है, जैसे किसी घायल कुत्ते की सर्जरी। दुर्घटना में घायल गायों की सेवा से लेकर टूटे पंखों वाले पक्षियों की देखभाल तक हर कार्य अत्यंत संवेदनशीलता से किया जाता है।
कई बार सड़क दुर्घटनाओं में घायल पशु इतने गंभीर रूप से जख्मी होते हैं कि उनके बचने की उम्मीद कम होती है, लेकिन डॉ. रतना और उनकी टीम दिन-रात प्रयास कर उन्हें नया जीवन देती है। यहां ऑपरेशन के बाद भी पशु-पक्षियों को तब तक रखा जाता है, जब तक वे पूरी तरह स्वस्थ नहीं हो जाते। यही कारण है कि यह केंद्र केवल अस्पताल नहीं, बल्कि पुनर्वास केंद्र के रूप में भी कार्य करता है।
बिना शब्दों के समझती हैं उनका दर्द
डॉ. रतना की सबसे बड़ी विशेषता उनकी संवेदनशीलता है। वर्षों तक पशु-पक्षियों के बीच रहने के कारण वे उनके व्यवहार और भावनाओं को गहराई से समझने लगी हैं। वे बताती हैं कि पशु-पक्षी बोल नहीं सकते, लेकिन उनकी आंखें, उनका व्यवहार और उनकी गतिविधियां बहुत कुछ कह देती हैं। यही कारण है कि वे बिना शब्दों के भी उनके दर्द और परेशानी को पहचान लेती हैं।
जब शाम को वे केंद्र से घर लौटती हैं, तो कई पशु-पक्षी उन्हें जाते हुए देखते रहते हैं। यह दृश्य उनके और इन मूक प्राणियों के बीच बने आत्मिक रिश्ते को दर्शाता है।
यहां किन-किन पशु-पक्षियों का होता है उपचार ?
केंद्र में आने वाले प्रमुख जीव
- कुत्ते
- बिल्लियाँ
- गाय और बैल
- मोर
- कबूतर
- गौरेया
- तोते
- खरगोश
- कछुए
- मुर्गे
- चूहे और झाऊ चूहे
- अन्य घायल वन्य और पालतू जीव
विदेशी महिला का कुत्ता भी हो गया भावुक
डॉ. रतना के प्रति पशु-पक्षियों का लगाव केवल भारत तक सीमित नहीं है। एक विदेशी महिला अपने घायल कुत्ते का उपचार कराने उनके केंद्र पहुंची। कई दिनों की सेवा और देखभाल के बाद जब वह कुत्ता स्वस्थ हुआ और उसे वापस अपने देश ले जाया जाने लगा, तो वह डॉ. रतना से अलग होने को तैयार नहीं था। यह घटना दर्शाती है कि प्रेम और संवेदना की भाषा हर जीव समझता है।
पशु क्रूरता के खिलाफ बनी मजबूत आवाज
डॉ. रतना केवल उपचार तक सीमित नहीं रहीं। उन्होंने पशु-पक्षियों के अधिकारों और सुरक्षा के लिए समाज में व्यापक जागरूकता भी फैलाई। दीपावली पर पटाखों से होने वाले ध्वनि और वायु प्रदूषण का पक्षियों पर क्या प्रभाव पड़ता है, इस विषय पर उन्होंने लगातार लेख लिखे और अभियान चलाए। मकर संक्रांति, रक्षा बंधन और अक्षय तृतीया पर चाइनीज मांझे से कटकर मरने वाले पक्षियों को बचाने के लिए भी उन्होंने बड़े स्तर पर जनजागरण किया। उनके प्रयासों से हजारों पक्षियों की जान बचाई जा सकी।
डॉ. रतना के प्रमुख अभियान
पशु-पक्षियों की सुरक्षा के लिए चलाए गए अभियान
- चाइनीज मांझे के खिलाफ जागरूकता अभियान
- दीपावली पर पटाखों के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूकता
- घायल पक्षियों के लिए विशेष उपचार शिविर
- पशु क्रूरता के खिलाफ जनचेतना
- अंधे और विशेष जरूरत वाले पशु-पक्षियों की देखभाल
- स्कूलों और सामाजिक संस्थाओं में जागरूकता कार्यक्रम
प्रधानमंत्री तक पहुंचाए सुझाव
डॉ. रतना ने पशु संरक्षण और संवेदनशीलता को लेकर समय-समय पर देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सुझाव भेजे। उनके कई सुझावों पर सकारात्मक पहल भी हुई। प्रसिद्ध पशु-प्रेमी और समाजसेवी मेनका गांधी ने भी उनके कार्यों की सराहना की है। यह सम्मान इस बात का प्रमाण है कि उनका कार्य केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रभाव छोड़ रहा है।
अंधे और लाचार जीवों के लिए विशेष संवेदनशीलता
डॉ. रतना विशेष रूप से उन पशु-पक्षियों के लिए संवेदनशील हैं, जो जन्म से अंधे हैं या किसी दुर्घटना में अपनी दृष्टि खो चुके हैं। वे ऐसे जीवों को बोझ नहीं, बल्कि विशेष देखभाल के पात्र मानती हैं। उनका मानना है कि हर जीव को सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार है। यही सोच उनके केंद्र को केवल उपचार स्थल नहीं, बल्कि करुणा का मंदिर बनाती है।
लगभग 50 वर्षों से निरंतर सेवा
लगभग पाँच दशकों से डॉ. रतना लगातार सेवा कार्य में जुटी हुई हैं। उम्र बढ़ने के बावजूद उनका उत्साह और समर्पण आज भी वैसा ही है। वे प्रतिदिन सुबह केंद्र पहुँचती हैं और देर शाम तक पशु-पक्षियों की सेवा में लगी रहती हैं। उनका जीवन यह संदेश देता है कि सच्ची सेवा वही है, जिसमें न प्रसिद्धि की चाह हो और न किसी पुरस्कार की अपेक्षा।
वाकई “वंतारा” से कम नहीं यह केंद्र
आज जब लोग वंतारा को पशु संरक्षण का बड़ा उदाहरण मानते हैं, तब जोधपुर का यह असहाय पशु-पक्षी केंद्र भी किसी वंतारा से कम नहीं दिखाई देता। फर्क सिर्फ इतना है कि यहाँ आधुनिक भव्यता से अधिक मानवीय संवेदनाएँ दिखाई देती हैं। यह केंद्र उन मूक प्राणियों के लिए स्वर्ग बन चुका है, जिन्हें समाज अक्सर अनदेखा कर देता है। यहा उन्हें केवल उपचार नहीं, बल्कि जीवन जीने का अधिकार और प्रेम मिलता है।
Author: Dilip Purohit
Group Editor












