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राइजिंग भास्कर 4th एनिवर्सरी काव्य धारा-2 : कवि : प्रमोद कुमार शर्मा

कवि : प्रमोद कुमार शर्मा

परिचय (प्रमोद कुमार शर्मा। बचपन से क्रांतिकारी विचारों के समर्थक। शब्दों के जादूगर। जन्म 1 मई 1965, शिक्षा एम. कॉम, नाटक में एक वर्षीय पाठ्यक्रम। रेडियो से कई नाटक-रूपक प्रसारित। प्रकाशित संग्रह : सच तो ये है- कथा संग्रह, सड़क पर उतरेगा ताजमहल-काव्य संग्रह, क्लॉड ईथरली-उपन्यास, सावळ-कावळ-राजस्थानी कथा संग्रह, बोली सूं सुरता-राजस्थानी काव्य संग्रह, आदमी पर आया- कथा संग्रह, छुपी हुई लड़की-कथा संग्रह, गुड नाईट इंडिया-कथा संग्रह, राम जाने-राजस्थानी कथा संग्रह, कारो-राजस्थानी काव्य संग्रह, खुद री जुबान से गीत-राजस्थानी लंबी कविता, गोटी-राजस्थानी उपन्यास, हरि दूब का विरोध-कहानी संग्रह, कोसों दूर-कविता संग्रह, काठ का एक घर-कविता संग्रह, प्रकाश और छाया-कविता संग्रह। हाल ही में लोकार्पित उपन्यास-सिजोफ्रेनिक। इसके अलावा हंस, कथादेश, वर्तमान साहित्य, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, आजकल, अन्यथा, मधुमति सहित अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचनाओं का प्रकाशन। पुरस्कार- राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी बीकानेर से मुरलीधर कथा पुरस्कार-2013। इसके अलावा भी विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं से कई पुरस्कार मिल चुके हैं। आकाशवाणी से वरिष्ठ उद्घोषक पद से सेवानिवृत्त।)

गजल-1

कर्ज बहुत है मुझ पर चुकाने के लिए,

मगर कोई शेर नहीं है सुनाने के लिए।

चाहता हूं तू कोई ऐसी गजल कहें,

मैं मजबूर हो जाऊं जिसे गुनगुनाने के लिए।

सूना सूना दिल का मैं दैय्यार लगता है,

दोस्त खड़े हैं मेरी मैयत उठाने के लिए।

चुप तो हो ही गया और क्या चाहिए आपको,

मुझे भी वक्त मिल गया रोने रुलाने के लिए ।

अभी अभी जलाया था चिराग अंधेरे में,

अभी-अभी आ गए लोग उसे बुझाने के लिए ।

इतना बोझ गुनाहों का सिर पर मेरे,

होंठ तरस गए हैं जैसे मुस्कुराने के लिए।

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गजल-2

इतना भी मत झुक की दस्तार गिर जाए,

ऊपर उठने का हर एक विचार गिर जाए।

कितना सूनापन है इस मारक तन्हाई में,

तू संभले भी नहीं कि तेरा किरदार गिर जाए।

ये भीड़ देखना तुझे रोंद कर निकल जाएगी‌,

बीच मझधार का हो और पतवार गिर जाए।।

ऐसा जीना भी किसी काम का है जिन बंधु,

इज्जत बची रहे और इज्जतदार गिर जाए।

सोच लेना इतना भर यूं उनसे लड़ने से पहले,

तू लड़ भी नहीं कि पाए कि हाथ‌ से तलवार गिर जाए।

गजल-3

हद है समंदर के ज़ुल्म हजार थे,

ऊपर से हम भी कश्ति में सवार थे।

डराते क्यों हो तुम उसूलों के नाम पर,

अरे हम तो उसूलों के तलबगार थे।

अच्छा किया तोड़ दिया आपने दिल मेरा,

हम भी उसको रखकर काफी शर्मसार थे।

सजदे में सिर को झुकाते तो झुकाते कैसे?

हम तो यहां पर किसी के गुनहगार थे।

भरोसा है मुझको अपनी नज़र की प्यास पर,

हम तो यूं ही हमेशा प्यास के तलब गार थे।

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गजल-4

कहां कहां भटकता रहा तेरी तलाश में,

अंधेरा ही अंधेरा था तुम्हारे प्रकाश में।

कंकर उछलकर क्यों तहजीब को छोड़ दूं,

है वैसे भी छेद बहुत अपने इस आकाश में।

अभी तो व्यस्त हूं महामारी के दिनों में,

मिलूंगा जरूर तुम्हें फिर किसी अवकाश में।

मूर्ति तो मूर्ति थी कैसे बोलती बेचारी वह,

हां हुनर बोलता था बहुत, पत्थर तलाश में।

क्यों मार मार के अधमरा कर दिया तुमने,

वैसे भी कुछ बाकी नहीं था इस जिंदा लाश में।

गजल-5

सब हर्फ तेरे नाम कर रहा हूं,

बस अब आखरी सलाम कर रहा हूं ।

मलमल के कौन नहलाएगा मुझे,

यह सोचकर अब गंगा स्नान कर रहा हूं ।

और कुछ नहीं बचा है पास में मेरे,

ये डेड पसली हड्डियां मैं दान कर रहा हूं ।

सोचता हूं कल और कोई आ जाएगा,

खाली अपना अब ये मकान कर रहा हूं ।

मरना शायद मुश्किल बहुत होता है,

सो इसलिए इसे थोड़ा आसान कर रहा हूं।

गजल-6

जिन पर दावे थे,

सब के सब छलावे थे।

हम तो यूं ही चले आए वरना,

कहां हमको आपके बुलावे थे।

यूं ही लड़ लड़ कर मरे,

जबकि कितने गहरे दिखावे थे।

सब का सब स्यापा निकला,

जिन्हें मैं समझा बधावे थे।

जरूर यह एआई का कमाल है,

वगरना अब कहां चकवा -चकवी गावे थे।।

 

Dilip Purohit
Author: Dilip Purohit

Group Editor