आलेख : अंतरजातीय विवाह
लेखक : राजन वैष्णव
…पहले यह विवाह घर वालों की मर्जी के खिलाफ उन्हें बिना बताए कोर्ट में जाकर किये जाते थे, जिन्हें परिवार या समाज की मंजूरी मिलती थी या नहीं इस पर प्रश्न चिन्ह लगा रहता था, लेकिन अब तो अंतरजातीय विवाह वर एवं वधू पक्ष की सहमति से बाकायदा पूर्ण वैवाहिक समारोह के आयोजन निमंत्रण पत्र छपवाकर एवं पूरे समाज, परिवारजनों, मित्रगणों को आमंत्रित करके आयोजित किए जाते हैं।…इसी आलेख से…
समाज में अभी अंतरजाीय विवाहों की काफी बढ़ोतरी हुई है। हालांकि अंतरजातीय विवाह पहले भी होते थे, लेकिन अब इन विवाहों में काफी अंतर आ गया है। पहले यह विवाह घर वालों की मर्जी के खिलाफ उन्हें बिना बताए कोर्ट में जाकर किये जाते थे, जिन्हें परिवार या समाज की मंजूरी मिलती थी या नहीं इस पर प्रश्न चिन्ह लगा रहता था, लेकिन अब तो अंतरजातीय विवाह वर एवं वधू पक्ष की सहमति से बाकायदा पूर्ण वैवाहिक समारोह के आयोजन निमंत्रण पत्र छपवाकर एवं पूरे समाज, परिवारजनों, मित्रगणों को आमंत्रित करके आयोजित किए जाते हैं।
इस तरह के आयोजनों से समाज में क्या मैसेज जाता है? कृपया इस पर विचार करें। क्या आयोजनकर्ता अपने आपको उदारवादी, समाजवादी साबित करना चाहता है कि हमें जात पात से कोई फर्क नहीं पड़ता और जो इन समारोहों में शामिल होते हैं, उन परिवार के लड़के -लड़कियों को भी यह मैसेज जाता है कि अब हमारे लिए भी जाति-पाति का कोई बंधन नहीं है, जहां हम चाहे वहां हमारा रिश्ता भी हमारे घर वाले शानशौकत से विवाह कर देंगे।
आज के 20-30 वर्ष पहले की स्थिति अलग थी। उस समय एक परिवार में 4-5 संतानें होती थी, अगर एक संतान अंतरजातीय विवाह कर लेती तो अधिकांशतः परिवार उससे रिश्ता समाप्त यह कहकर कर लेते कि इस प्रक्रिया का प्रभाव हमारी बाकी की संतानें या कुल के अन्य बच्चों पर नहीं पड़े।
आज की स्थिति यह है कि एक परिवार में 1 या 2 ही संतान होती है और ऐसी स्थिति में वह भी अंतरजातीय विवाह के लिए जिद कर बैठे तो मां – बाप को मजबूरन उन्हें अपनी सहमति देनी होती है। लेकिन विचार कीजिए ऐसी स्थिति आती क्यों है – 1. आपके कमजोर संस्कार 2. विवाह में विलम्ब (28-30 वर्ष या इससे अधिक की उम्र) 3. परिवार में पहले कोई अंतरजातीय विवाह हो रखा हो तो विरोध की स्थिति क्षीण हो जाती है।
हम सभी जानते हैं कि अंतरजातीय विवाहों से वर्ण संकरता बढ़ती है। वर्णसंकरता के नमूने हमें जानवरों में देखने को मिलते हैं तो फिर इंसानों में होंगे ही। सीधा सा उदाहरण है कि यदि बासमती चावल व शरबती चावल दोनों को बराबर मात्रा में मिलाकर बनाया जाए तो या तो आधे चावल कच्चे रहेंगे या फिर आधे चावल गल जाएंगे। वर्णसंकरता और गौत्रों का महत्व तो विज्ञान भी मानता है। बुद्धिजीवियों को इस विषय पर अधिक बताने की आवश्यकता भी नहीं है। हमारे गुरुजनों ने भी वर्णसंकरता का विरोध किया था।
अतः जहां तक हो सके अंतरजातीय विवाहों से बचना चाहिए लेकिन फिर यदि परिवार के सामने मजबूरी आ जाए कि अब तो अंतरजातीचय विवाह करना ही होगा तो फिर सिर्फ पारिवारिक स्तर पर ही ऐसे कार्यक्रमों को आयोजित करना चाहिए। जिससे अन्य परिवार या व्यक्ति प्रेरित ना हो।
(नोट : यह लेखक के अपने विचार हैं।)



